Thursday, May 14, 2026
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Breathtaking Irony: हम खेजड़ी के पेड़ काटकर ग्रीन एनर्जी (सौर ऊर्जा) को बढ़ावा दे रहे हैं…यह कैसी विडंबना?; पढ़ें यह फैसला

Breathtaking Irony: राजस्थान हाई कोर्ट ने सौर ऊर्जा परियोजनाओं के लिए ‘खेजड़ी’ के पेड़ों की कटाई पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे “दिल दहला देने वाली विडंबना” (Breathtaking Irony) करार दिया है।

श्री जम्भेश्वर पर्यावरण एवं जीव रक्षा प्रदेश संस्था ने दायर की PIL

जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस संदीप शाह की पीठ ने ‘श्री जम्भेश्वर पर्यावरण एवं जीव रक्षा प्रदेश संस्था’ (NGO) द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) का निपटारा करते हुए राज्य सरकार को सख्त निर्देश दिए हैं। अदालत ने चिंता व्यक्त की कि तकनीक और प्रगति के नाम पर प्रकृति का विनाश किया जा रहा है। कोर्ट ने इस बात पर गहरा दुख व्यक्त किया कि एक तरफ हम ‘ग्रीन एनर्जी’ (सौर ऊर्जा) को बढ़ावा दे रहे हैं, लेकिन उसी प्रक्रिया में मरुस्थल के सबसे महत्वपूर्ण पारिस्थितिक रक्षक—खेजड़ी के पेड़ों—को काटा जा रहा है।

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खेजड़ी का ऐतिहासिक और पारिस्थितिक महत्व

  • अदालत ने अपने आदेश में खेजड़ी के महत्व को रेखांकित किया।
  • ऐतिहासिक बलिदान: कोर्ट ने 1730 के ऐतिहासिक खेजड़ली बलिदान का जिक्र किया, जहाँ बिश्नोई समुदाय के लोगों ने पेड़ों को बचाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी।
  • रेगिस्तान का जीवन: खेजड़ी (Prosopis cineraria) शुष्क क्षेत्रों में उगने वाला एक दुर्लभ पेड़ है जो कठोर जलवायु में भी जीवित रहता है। कोर्ट ने कहा कि आज के शासकों को भी उसी पुराने समय की तरह पेड़ों की रक्षा के लिए सख्त ‘फरमान’ जारी करने की जरूरत है।

“एक भी पेड़ न कटे”, कोर्ट के सख्त निर्देश

  • अदालत ने सौर ऊर्जा कंपनियों और सरकार के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
  • कानूनी मंजूरी अनिवार्य: बिना कानूनी प्रक्रिया और उचित मंजूरी के एक भी पेड़ नहीं काटा जाएगा।
  • कमेटी की भूमिका: राज्य सरकार द्वारा 9 मार्च, 2026 को गठित विशेष समिति को हर प्रस्तावित कटाई की सूचना देनी होगी। कोर्ट ने उम्मीद जताई कि यह कमेटी “एक भी पेड़” को खोने से बचाने के लिए हर संभव वैकल्पिक रास्ते तलाशेगी।
  • नया कानून: याचिकाकर्ता ने राजस्थान में अन्य राज्यों की तरह ‘वृक्ष संरक्षण अधिनियम’ (Tree Protection Act) बनाने की मांग की है, जिस पर कमेटी विचार कर रही है।

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“प्रगति बनाम विनाश” का सवाल

याचिकाकर्ता के वकील विजय बिश्नोई ने दलील दी कि सौर ऊर्जा नीति की आड़ में हरियाली को अंधाधुंध साफ किया जा रहा है। उन्होंने तर्क दिया कि ये पेड़ न केवल स्थानीय समुदाय की धार्मिक भावनाओं से जुड़े हैं, बल्कि बंजर जमीन पर पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने वाले एकमात्र सहारा हैं।

मामले का सारांश (Quick Highlights)

विवरणकोर्ट का स्टैंड / निर्देश
मुख्य मुद्दासौर ऊर्जा प्रोजेक्ट्स के लिए खेजड़ी के पेड़ों की कटाई।
कोर्ट की टिप्पणीपर्यावरण के नाम पर प्रकृति का विनाश एक बड़ी विडंबना है।
ऐतिहासिक संदर्भ1730 के बिश्नोई समुदाय के बलिदान की याद दिलाई।
सरकार का कदमवृक्ष संरक्षण कानूनों के अध्ययन के लिए विशेष कमेटी गठित।
वर्तमान स्थितिबिना अनुमति पेड़ काटने पर पूर्ण रोक।

संतुलित विकास की आवश्यकता

राजस्थान हाई कोर्ट का यह फैसला एक बड़े वैश्विक संकट की ओर इशारा करता है, क्या जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए हमें अपने मौजूदा जंगलों और पेड़ों की बलि देनी चाहिए? कोर्ट ने साफ कर दिया है कि “तकनीकी प्रगति” प्रकृति की कीमत पर नहीं होनी चाहिए। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह सौर पैनलों के लिए ऐसी जगह चुने जहां पेड़ों को नुकसान न पहुंचाना पड़े।

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