Friday, October 16, 2026
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Sedition Matter: डेरा सच्चा सौदा हिंसा…सरकार के खिलाफ नारेबाजी को क्या देशद्रोह समझना चाहिए या नहीं, पंजाब हाईकोर्ट ने यह कहा

Sedition Matter: पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने अभिव्यक्ति की आजादी और लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर यह बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

सरकार के प्रति किसी नागरिक की निराशा, असंतोष या आक्रोश को ‘घृणा’ या ‘द्रोह’ नहीं

हाईकोर्ट के जस्टिस विनोद एस. भारद्वाज और जस्टिस सुखविंदर कौर की खंडपीठ ने साल 2017 में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को सजा सुनाए जाने के बाद भड़की हिंसा से जुड़े एक मामले में तीन आरोपियों को बरी करने के निचली अदालत के फैसले को पूरी तरह सही ठहराते हुए सरकार की अपील खारिज कर दी। कहा, एक लोकतांत्रिक देश में सरकार या शासन के किसी अंग के खिलाफ नारेबाजी करने मात्र से नागरिकों पर देशद्रोह (Sedition) का मुकदमा नहीं थोपा जा सकता। सरकार के प्रति किसी नागरिक की निराशा, असंतोष या आक्रोश को ‘घृणा’ या ‘द्रोह’ नहीं माना जा सकता। उग्र विरोध प्रदर्शन दंगों की श्रेणी में तो आ सकता है, लेकिन इसे देशद्रोह की नजर से नहीं देखा जाना चाहिए।

मामला क्या है?: 2017 की डेरा हिंसा और देशद्रोह की धाराएं

यह कानूनी विवाद डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम की दोषसिद्धि के बाद अगस्त 2017 में पंचकूला और हरियाणा के अन्य हिस्सों में भड़की हिंसक घटनाओं से जुड़ा है।

क्या था आरोप: अभियोजन पक्ष (हरियाणा सरकार) का आरोप था कि दंगों के दौरान तीन आरोपियों ने डेरा सच्चा सौदा के समर्थन में और तत्कालीन सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की थी। पुलिस ने उनके खिलाफ दंगों के साथ-साथ देशद्रोह (IPC की धारा 124A) की गंभीर धाराएं भी लगा दी थीं।

निचली अदालत का फैसला: साल 2019 में ट्रायल कोर्ट ने सबूतों की कमी और जांच में विसंगतियों को देखते हुए तीनों आरोपियों को बरी कर दिया था। हरियाणा सरकार ने इस फैसले को चुनौती देते हुए 2021 में हाई कोर्ट में अपील दायर की थी।

“नारेबाजी केवल असंतोष व्यक्त करने का जरिया है”: हाई कोर्ट की अहम टिप्पणियां

हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की अपील को पूरी तरह ‘योग्यताहीन’ (Devoid of merit) बताते हुए खारिज कर दिया और पुलिस जांच की खामियों के साथ-साथ देशद्रोह के कानून के दुरुपयोग पर कड़ी टिप्पणी की।

असंतोष घृणा नहीं है: खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड पर मौजूद सबूत केवल सरकार के खिलाफ नारेबाजी को दर्शाते हैं। लोकतांत्रिक ढांचे में यह केवल असंतोष (Dissent) व्यक्त करने का एक जरिया है, न कि सरकार के प्रति कोई घृणा, अवमानना या द्रोह पैदा करने की कोशिश।

दंगा और देशद्रोह में फर्क: कोर्ट ने बेहद सटीक शब्दों में रेखांकित किया कि यदि कोई विरोध प्रदर्शन हिंसक हो जाता है, तो कानूनन उसे ‘दंगा’ (Rioting) माना जाएगा और संबंधित धाराओं के तहत कार्रवाई होगी। लेकिन हिंसा के हर कृत्य को सीधे देशद्रोह मान लेना कानूनी तौर पर गलत है।

जांच में गंभीर विसंगतियां: हाई कोर्ट ने नोट किया कि पुलिस की इस पूरी जांच में भारी अंतर्विरोध (Contradictions), महत्वपूर्ण चूक (Omissions), संदिग्ध बरामदगी, पहचान का अभाव और फॉरेंसिक सबूतों की भारी कमी थी। ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई भी कानूनी अवैधता या विकृति नहीं थी, इसलिए अपील खारिज की जाती है।

विधिक केस शीट: पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट देशद्रोह कानून समीक्षा (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और वर्तमान निर्णय
संबंधित अदालतपंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय (Punjab & Haryana High Court)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस विनोद एस. भारद्वाज और जस्टिस सुखविंदर कौर
मामले की पृष्ठभूमिअगस्त 2017 डेरा सच्चा सौदा हिंसा (पंचकूला/हरियाणा)
सरकार की ओर से वकीलसीनियर डिप्टी एडवोकेट जनरल पारस तलवार
बचाव पक्ष के वकीलसीनियर एडवोकेट हेमंत बस्सी, एडवोकेट गुरसिमरन कौर, सलोनी छाबड़ा व अन्य
अदालत का अंतिम फैसलाआरोपियों को बरी करने का ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार; सरकार की अपील खारिज।

अदालत ने बहुत ही बारीक अंतर समझाया है-दंगा भड़काना एक अलग अपराध है और देश के खिलाफ जंग छेड़ना (देशद्रोह) बिल्कुल अलग। पुलिस द्वारा छोटी-मोटी नारेबाजी पर भी देशद्रोह की धाराएं चिपका देने की प्रवृत्ति पर यह फैसला एक बेहतरीन और जरूरी विधिक हस्तक्षेप है।

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