मुख्य बिंदु (Key Indicators)
- लिव-इन संबंधों पर समानता का सवाल: न्यायमूर्ति स्वरणा कांता शर्मा ने मौखिक टिप्पणी करते हुए पूछा— “जब कानून एक पुरुष और महिला के बीच लिव-इन संबंध को मान्यता देता है, तो यह दो पुरुषों या दो महिलाओं के बीच लिव-इन संबंध की अनुमति क्यों नहीं देगा?”
- चिकित्सकीय नियमों में भेदभाव: वर्तमान में चिकित्सा नियमों के तहत केवल पति/पत्नी, माता-पिता या कानूनी अभिभावक ही मरीज की ओर से मेडिकल कंसेंट (सहमति) दे सकते हैं, जिससे समलैंगिक साथी बाहर हो जाते हैं।
- केंद्र सरकार पर कोर्ट का रुख: कोर्ट ने कहा कि मामले को एक साल बीत चुका है। यदि सरकार ने लिव-इन रिलेशनशिप को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया है, तो उसी के अनुसार नियमों में सुधार भी करना होगा।
- पारिवारिक और सामाजिक उपेक्षा: कोर्ट ने माना कि समलैंगिक संबंधों को समाज और परिवारों का समर्थन आसानी से नहीं मिलता; ऐसे में आपातकालीन स्थिति में उनका पार्टनर ही उनका एकमात्र सहारा होता है।
Medical Consent: दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को एक समलैंगिक महिला (Queer Partner) द्वारा दायर याचिका पर जवाब देने के लिए एक सप्ताह का अंतिम अवसर दिया है। इस याचिका में एलजीबीटीक्यू (LGBTQ+) समुदायों के सहयोगियों को चिकित्सीय उपचार के दौरान ‘मेडिकल प्रतिनिधि’ (Medical Representative) के रूप में सहमति देने और अस्पताल में प्रवेश की अनुमति देने का निर्देश देने की मांग की गई है।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति स्वर्णा कांता शर्मा की एकल पीठ ने केंद्र सरकार से तीखे सवाल पूछे और कहा कि जब कानून पुरुष और महिला के बीच लिव-इन संबंधों को मान्यता देता है, तो दो पुरुषों या समलैंगिकों के बीच लिव-इन संबंधों को अनुमति क्यों नहीं दी जाएगी?
हाईकोर्ट की मुख्य टिप्पणियां और सुनवाई की बातें
- ‘कानून दो पुरुषों के लिव-इन पर रोक नहीं लगाता’
- पीठ ने केंद्र सरकार के वकील से सवाल किया: “कानून एक पुरुष और महिला के बीच लिव-इन संबंध को मान्यता देता है। तो यह दो पुरुषों (या समलैंगिक जोड़ों) के बीच लिव-इन संबंध की अनुमति क्यों नहीं देगा?”
- न्यायमूर्ति शर्मा ने मौखिक रूप से कहा कि जब समाज में लिव-इन संबंधों को स्वीकार किया गया है, तो उसी के अनुसार चिकित्सा नियमों में संशोधन होने चाहिए।
- केंद्र की देरी पर कोर्ट की नाराजगी
- अदालत ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि याचिका पर नोटिस जारी हुए एक साल से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी केंद्र सरकार ने अपना जवाब (Counter-Affidavit) दाखिल नहीं किया है।
- कोर्ट ने कहा: “अगर मैं इस संबंध में आदेश पारित करती हूं, तो आपको कुछ बहुत बड़ा बदलने की जरूरत नहीं है। आपको सिर्फ अधिकारों को सुरक्षित (Safeguards) करना है। यह बहुत छोटी सी चीज है।”
- सामाजिक पूर्वाग्रह और पारिवारिक बहिष्कार का जिक्र
- हाईकोर्ट ने माना कि जब कोई व्यक्ति मुख्यधारा से अलग रास्ता चुनता है, तो उसे समाज और कभी-कभी अपने परिवार के बहिष्कार का सामना करना पड़ता है।
- पीठ ने टिप्पणी की कि ऐसे कई मामले सामने आते हैं जहां परिवार अपने बच्चों के समलैंगिक संबंधों को स्वीकार नहीं करते और उनका त्याग कर देते हैं। ऐसे समय में साथी (Partner) ही एकमात्र सहारा होता है।
याचिकाकर्ता का पक्ष एवं कानूनी दलीलें
- मेडिकल काउंसिल नियमों की चुनौती
- याचिकाकर्ता अर्शिया टक्कर की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सौरभ कृपाल ने तर्क दिया कि इंडियन मेडिकल काउंसिल रूल्स, 2002 के तहत केवल पति, पत्नी, माता-पिता या अभिभावक को ही मरीज की तरफ से चिकित्सा सहमति (Medical Consent) देने का अधिकार है।
- यह नियम समलैंगिक जोड़ों को बाहर करता है, जो अनुच्छेद 15 (लिंग के आधार पर भेदभाव का निषेध) और अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण जीवन और निजता का अधिकार) का सीधा उल्लंघन है।
- एडवांस मेडिकल पावर ऑफ अटॉर्नी (Medical Power of Attorney) की मांग
- याचिका में मांग की गई है कि नॉन-हेटरोसेक्सुअल (Queer) जोड़ों के लिए गाइडलाइंस बनाई जाएं या अग्रिम ‘मेडिकल पावर ऑफ अटॉर्नी’ को कानूनी मान्यता दी जाए ताकि आपात स्थिति में पार्टनर को मेडिकल प्रतिनिधि के रूप में माना जा सके।
- सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का संदर्भ
- वरिष्ठ वकील सौरभ कृपाल ने नवतेज सिंह जोहर, के.एस. पुट्टास्वामी (निजता का अधिकार) और विवाह समानता (Same-Sex Marriage) मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का हवाला देते हुए कहा कि यद्यपि विवाह को धार्मिक/सामाजिक आधार पर अनुमति नहीं मिली, लेकिन अदालत ने लिव-इन संबंधों से मिलने वाले अधिकारों को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है।
मामले के मुख्य तथ्य और कानूनी विश्लेषण
यह याचिका LGBTQ समुदाय की सदस्य अर्शिया टक्कर द्वारा दायर की गई है। उन्होंने मांग की है कि गैर-विषमलैंगिक (Non-heterosexual) साझेदारों को मरीज का मेडिकल प्रतिनिधि बनने की अनुमति देने के लिए दिशानिर्देश बनाए जाएं। विकल्प के रूप में, यदि मरीज ने अग्रिम रूप से अपने साथी को ‘मेडिकल पावर ऑफ अटॉर्नी’ दी है, तो उसे कानूनी मान्यता दी जानी चाहिए।
संवैधानिक अधिकारों का हनन याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सौरभ कृपाल ने तर्क दिया।
“सर्वोच्च न्यायालय ने माना है कि शादी का अधिकार न सही, लेकिन साथ रहने और संबंध बनाने का अधिकार (Right to Relationship) संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त है। आप यह नहीं कह सकते कि आप साथ तो रह सकते हैं, लेकिन अस्पताल में आपात स्थिति में एक-दूसरे के लिए कोई फैसला नहीं ले सकते। यह गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का हनन है।”
हाईकोर्ट की मौखिक टिप्पणियां न्यायमूर्ति स्वरणा कांता शर्मा ने केंद्र सरकार के वकील को सलाह दी कि वे अपने संबंधित मंत्रालयों (स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, सामाजिक न्याय मंत्रालय और कानून मंत्रालय) को इस पर सकारात्मक फैसला लेने को कहें। अदालत ने कहा कि यह केवल एक चिकित्सा प्रक्रिया में सहमति देने जैसा छोटा और मानवीय सुरक्षा का मुद्दा है। इसके लिए नियमों में व्यापक बदलाव की भी जरूरत नहीं है, केवल एक स्पष्टीकरण या सुरक्षा उपाय (Safeguard) जोड़ने की आवश्यकता है। अदालत ने मामले की महत्ता को देखते हुए स्पष्ट किया कि वह सितंबर महीने के भीतर ही इस मुद्दे का निपटारा करना चाहती है और अगली सुनवाई 17 सितंबर 2026 को तय की है।
केस अवलोकन (Case Snapshot)
| पहलू | विवरण |
| अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति स्वर्णा कांता शर्मा (Justice Swarana Kanta Sharma) |
| याचिकाकर्ता | अर्शिया टक्कर (प्रतिनिधित्व: वरिष्ठ अधिवक्ता सौरभ कृपाल) |
| मुख्य विषय | समलैंगिक (Queer) पार्टनर्स को अस्पताल में मरीज के लिए ‘Medical Representative’ के रूप में सहमति देने का अधिकार |
| निर्देश | केंद्र सरकार को 1 सप्ताह में काउंटर-हलफनामा दाखिल करने का अंतिम आदेश |
| अगली सुनवाई | 17 सितंबर 2026 |

