Saturday, August 8, 2026
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Compromise In POCSO: मासूम बच्ची के यौन उत्पीड़न का मामला माता-पिता के समझौते से खत्म नहीं हो सकता…पॉक्सो केस में ऐतिहासिक निर्णय पढ़ें

केस मैट्रिक्स एवं विधिक सारांश (Case Matrix Overview)

विधिक/प्रशासनिक बिंदुविवरण (अगस्त 2026)
मामलाShiju v. State of Kerala & Ors.
माननीय पीठन्यायमूर्ति कौसर एडप्पागथ (केरल उच्च न्यायालय)
संबंधित कानूनपॉक्सो अधिनियम, 2012 (POCSO Act, 2012)
मुख्य कानूनी सिद्धांतनाबालिग के खिलाफ यौन अपराधों (Incestuous Sexual Assault) में माता-पिता का समझौता या NOC कानूनी रूप से अमान्य है; राज्य की अभियोजन जिम्मेदारी बनी रहेगी।
अदालत का निर्णयसमझौते की दलील खारिज; आरोपी पिता की जमानत याचिका निरस्त।

Compromise In POCSO: केरल हाईकोर्ट ने पॉक्सो अधिनियम (POCSO Act) के तहत दर्ज एक गंभीर मामले में बड़ा विधिक सिद्धांत प्रतिपादित किया।

न्यायमूर्ति कौसर एडप्पागथ की एकल पीठ ने [शिजू बनाम केरल राज्य व अन्य] मामले में आरोपी पिता की जमानत याचिका (Bail Application) को खारिज करते हुए यह आदेश पारित किया। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई पिता अपनी ही नाबालिग बेटी के यौन उत्पीड़न का आरोपी है, तो आरोपी पिता और पीड़िता की मां के बीच हुआ कोई भी समझौता (Compromise) कानूनी रूप से अमान्य होगा। कोर्ट ने कहा कि माता-पिता के समझौते से बच्चों के खिलाफ हुए यौन अपराधों की आपराधिक कार्यवाही को समाप्त नहीं किया जा सकता।

हाई कोर्ट के मुख्य विधिक सिद्धांत एवं सख्त टिप्पणियां

  1. ‘बाड़ ही खेत को खाने लगी’ (The fence devouring the crop): अदालत ने बेटी के हितों की अनदेखी कर पति से समझौता करने वाली मां के रवैये पर सख्त नाराजगी व्यक्त की। हाई कोर्ट की टिप्पणी: “पीड़िता की मां, जिसने शुरू में यौन उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई थी, ने अपनी बेटी के हितों और कल्याण की पूरी तरह अनदेखी करते हुए मामले को सुलझाने का विकल्प चुना है , यह स्थिति बिल्कुल वैसी ही है जैसे ‘बाड़ ही खेत को खाने लगे’।”
  2. अदालत का ‘पेरेंस पेट्रिए’ (Parens Patriae) क्षेत्राधिकार: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब माता-पिता अपने बच्चों के अधिकारों की रक्षा करने में विफल हो जाते हैं, तो अदालतें ‘पेरेंस पेट्रिए’ (राज्य/अदालत का अभिभावक के रूप में कर्तव्य) क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते हुए नाबालिग पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए बाध्य हैं।
  3. अपराध शमनीय (Compoundable) नहीं हैं: पॉक्सो कानून के तहत यौन उत्पीड़न के अपराध गैर-शमनीय (Non-Compoundable) हैं। माता-पिता या अभिभावक के पास यह कानूनी अधिकार नहीं है कि वे अपनी ही नाबालिग संतान पर हुए लैंगिक हमले के मामले में समझौता करें, केस वापस लें या आरोपी की जमानत पर ‘कोई आपत्ति नहीं’ (No Objection) का अनापत्ति पत्र प्रस्तुत करें।

मामले की पृष्ठभूमि (Background of the Case)

  • गंभीर आरोप: आरोपी पिता पर अपनी 17 वर्षीय नाबालिग बेटी पर यौन टिप्पणियां करने और यौन हमले की नीयत से उसे गलत तरीके से छूने का आरोप है। उसके खिलाफ पॉक्सो एक्ट की धारा 9(l), 9(n), 10, 11(i) और 12 के तहत प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई थी।
  • हिरासत और जमानत की मांग: आरोपी 17 अप्रैल से हिरासत में था। पहली जमानत याचिका खारिज होने के बाद, उसने यह दलील देते हुए दोबारा याचिका दायर की कि उसकी पत्नी (पीड़िता की मां) के साथ समझौता हो चुका है और मां को उसकी जमानत पर कोई आपत्ति नहीं है।
  • जमानत खारिज: कोर्ट ने पाया कि मां ने घटना के घटने से इनकार नहीं किया है, केवल जमानत पर अनापत्ति दी है। अपराध की गंभीरता और बच्ची के साथ हुए क्रूर व्यवहार को देखते हुए हाई कोर्ट ने समझौता स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया और जमानत याचिका खारिज कर दी।

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