Thursday, October 22, 2026
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Investigation Report: गोपनीयता खंड की आड़ लेकर नियोक्ता पूर्व कर्मचारियों को प्रतिस्पर्धी कंपनियों में जाने या अपने सामान्य कौशल-ज्ञान का उपयोग करने से नहीं रोक सकते

मामले की पृष्ठभूमि और कंपनी के आरोप

  1. क्या था कंपनी का दावा?बैक-ऑफिस और केपीओ (KPO) सेवाएं देने वाली कंपनी ‘ईओएक्स एडवांटेज’ ने अपनी पूर्व सहायक प्रबंधक (ऑपरेशंस) श्रुति के खिलाफ स्थायी रोक (Permanent Injunction) की मांग करते हुए याचिका दायर की थी। कंपनी ने आरोप लगाया कि श्रुति ने इस्तीफा देने के बाद गोपनीय व्यावसायिक डेटा (कांट्रैक्ट और मूल्य निर्धारण जानकारी) अपने व्यक्तिगत ईमेल पर ट्रांसफर किया और प्रतिस्पर्धी कंपनियों को डेटा देकर ₹20 लाख से अधिक का नुकसान पहुँचाया।
  2. कर्मचारी (श्रुति) का पक्ष:श्रुति ने सभी आरोपों का खंडन करते हुए बताया कि उन्होंने अप्रैल 2022 में स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफा दिया था। कंपनी ने उनके सभी रिकॉर्ड्स की जांच करने के 8 महीने बाद उन्हें औपचारिक रिलीविंग लेटर (Relieving Letter) और अनापत्ति प्रमाणपत्र जारी किया था।

बेंगलुरु कोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी तर्क

1. धारा 27 के तहत अधिकारों की सुरक्षा:

न्यायाधीश जे.वी. कुलकर्णी ने माना कि हालांकि कंपनियां अपने ट्रेड सीक्रेट्स (Trade Secrets) और मूल्य निर्धारण डेटा की सुरक्षा कर सकती हैं, लेकिन: “भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 27 के तहत किसी व्यक्ति को वैध पेशे, व्यापार या व्यवसाय को करने से रोकने वाले प्रतिबंध अमान्य (Void) होंगे। इसलिए, एक नियोक्ता केवल गोपनीयता क्लॉज का हवाला देकर पूर्व कर्मचारी को प्रतिस्पर्धी कंपनी में शामिल होने या अपने सामान्य कौशल, अनुभव व ज्ञान का उपयोग करने से नहीं रोक सकता।”

2. कंपनी के सबूतों की नाकामी:

  • जांच रिपोर्ट में खामियां: कंपनी यह साबित करने में विफल रही कि श्रुति ने वास्तव में किसी प्रतिस्पर्धी कंपनी को ज्वाइन किया या ग्राहकों को तोड़ा। आंतरिक फॉरेंसिक जांच करने वाले अधिकारियों या सीईओ/सीओओ की गवाही अदालत में पेश नहीं की गई।
  • कोविड वर्क-फ्रॉम-होम का दौर: कोर्ट ने ध्यान दिया कि महामारी के दौरान कर्मचारियों को घर से काम करते हुए कंपनी डेटा तक पहुँच की अनुमति थी, और केवल डेटा एक्सेस होना चोरी का सबूत नहीं है।
  • रिलीविंग लेटर जारी करना: कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब कंपनी 8 महीने से जांच कर रही थी, तो उसने श्रुति को रिलीविंग लेटर क्यों जारी किया? कोर्ट ने कहा कि यह कंपनी के आचरण पर संदेह पैदा करता है और यह मुकदमा केवल अनुमानों और अटकलों पर आधारित था।

बेंगलुरु: भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 (Indian Contract Act, 1872) की धारा 27 (व्यापार, पेशा या कारोबार में रुकावट डालने वाले करार का पूर्णतः शून्य / Void ab initio होना), व्यापारिक रहस्य बनाम सामान्य व्यावसायिक कौशल (Trade Secrets vs General Skills, Knowledge & Experience), नौकरी समाप्ति के बाद गैर-प्रतिस्पर्धा की शर्तें (Post-Termination Non-Compete Restraints), इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य का विधिक प्रमाणीकरण (Electronic Evidence & Forensic Reports), तथा आंतरिक जांच के बाद विधिवत रिलीविंग लेटर जारी करने के उपरांत पूर्व कर्मचारी पर दुर्भावनापूर्ण मुकदमेबाजी पर बेंगलुरु की सिटी सिविल एवं सत्र अदालत ने कॉर्पोरेट जगत के लिए एक नजीरपरक निर्णय सुनाया है।

अतिरिक्त नगर दीवानी एवं सत्र न्यायाधीश जे.वी. कुलकर्णी की अदालत ने बैक-ऑफिस और नॉलेज प्रोसेस आउटसोर्सिंग (KPO) सेवा प्रदाता कंपनी EOX वैंटेज प्राइवेट लिमिटेड द्वारा अपनी पूर्व कर्मचारी श्रुति बी.एस. के खिलाफ दायर दीवानी मुकदमे (Original Suit) को सव्यय (With Costs) खारिज कर दिया। कंपनी ने अपनी पूर्व असिस्टेंट मैनेजर पर गोपनीय मूल्य निर्धारण व डेटा चोरी करने, पूर्व कर्मचारियों को भड़काने (Poaching) और ग्राहकों को तोड़ने (Soliciting Clients) का आरोप लगाते हुए ₹20 लाख से अधिक के नुकसान का हर्जाना और स्थायी निषेधाज्ञा (Permanent Injunction) मांगी थी।

अदालत ने 6 अक्टूबर 2026 के अपने आदेश में दो-टूक व्यवस्था दी कि नियोक्ता अपने वैध व्यापारिक रहस्यों, मालिकाना जानकारी और ग्राहक सूची की सुरक्षा अवश्य कर सकते हैं, किंतु वे गोपनीयता खंड की आड़ में किसी पूर्व कर्मचारी को उसकी आजीविका कमाने, प्रतिस्पर्धी फर्म से जुड़ने या सेवाकाल में अर्जित सामान्य अनुभव और ज्ञान का स्वतंत्र उपयोग करने से नहीं रोक सकते। ऐसा कोई भी प्रतिबंध संविदा कानून की धारा 27 के तहत अवैध और शून्य है।

बेंगलुरु अदालत के मुख्य न्यायिक निष्कर्ष एवं विधिक व्यवस्था

1. ‘गोपनीयता खंड की आड़ में नौकरी करने के अधिकार पर रोक नहीं लगाई जा सकती’

अतिरिक्त नगर दीवानी एवं सत्र न्यायाधीश जे.वी. कुलकर्णी ने धारा 27 के दायरे को स्पष्ट करते हुए दर्ज किया: “नियोक्ता व्यापारिक रहस्यों (Trade Secrets), मालिकाना जानकारी, गोपनीय मूल्य निर्धारण, ग्राहक डेटा और व्यावसायिक रूप से मूल्यवान जानकारी की वैध सुरक्षा कर सकते हैं। तथापि, किसी भी व्यक्ति को वैध पेशा, व्यापार या व्यवसाय करने से रोकने वाले प्रतिबंध भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 27 के तहत शून्य (Void under Section 27) होंगे। अतः, कोई भी नियोक्ता केवल प्रतिबंधात्मक गोपनीयता खंड (Restrictive Confidential Clause) का नाम लेकर किसी पूर्व कर्मचारी को किसी प्रतिस्पर्धी फर्म (Competitor) में शामिल होने से या अपने सामान्य कौशल, अनुभव और ज्ञान (General Skills, Experience and Knowledge) का उपयोग करने से सामान्यतः नहीं रोक सकता।”

2. आंतरिक जांच रिपोर्ट और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की विधिक विफलता:

  • अदालत ने पाया कि कंपनी ने अपनी आंतरिक जांच रिपोर्ट (Internal Investigation Report) के आधार पर गंभीर आरोप लगाए, किंतु मुकदमे के दौरान उस रिपोर्ट की सत्यता को विधिक रूप से साबित नहीं किया जा सका:
    • जिन कर्मचारियों के व्हाट्सएप चैट और ईमेल का हवाला दिया गया, उनमें से किसी भी गवाह की अदालत में गवाही नहीं कराई गई।
    • फॉरेंसिक जांच करने वाले विशेषज्ञों की पहचान तक उजागर नहीं की गई।
    • इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य अधिनियम के अनिवार्य प्रावधानों के अनुरूप प्रमाणित नहीं किए गए, जिससे डेटा चोरी या ग्राहकों को तोड़े जाने का कोई अकाट्य साक्ष्य स्थापित नहीं हो सका।
  • अदालत ने यह भी संज्ञान में लिया कि कोविड-19 महामारी के दौरान कंपनी ने स्वयं कर्मचारियों को ‘वर्क फ्रॉम होम’ (WFH) के तहत आधिकारिक डेटा को घर से एक्सेस करने की आधिकारिक अनुमति दी थी।

3. 8 महीने की जांच के बाद रिलीविंग लेटर जारी करना: ‘संदेहास्पद आचरण’:

  • अदालत ने कंपनी के आचरण पर गंभीर सवाल उठाए:“प्रतिवादी ने अप्रैल 2022 में स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफा दिया था। कंपनी ने उसके रिकॉर्ड की 8 महीने तक गहन जांच करने के बाद उसका इस्तीफा स्वीकार किया और औपचारिक रिलीविंग लेटर (Relieving Letter) जारी किया। इसके बाद मुकदमा दायर करना वादी-कंपनी के आचरण पर गहरा संदेह पैदा करता है।यह मुकदमा पूरी तरह अटकलबाजी (Speculative) पर आधारित है और कथित नुकसान को साबित नहीं किया गया है।”
  • कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) और मुख्य परिचालन अधिकारी (COO), जो कथित जांच में शामिल थे, अदालत के कटघरे में गवाही देने तक नहीं आए।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम

चरण / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों की दलीलें
वादी पक्षकारEOX वैंटेज प्राइवेट लिमिटेड — बैक-ऑफिस ऑपरेशंस और KPO सेवाएं देने वाली बहुराष्ट्रीय आईटी कंपनी।
प्रतिवादी पक्षकारश्रुति बी.एस. — पूर्व असिस्टेंट मैनेजर (ऑपरेशंस), जिन्होंने अप्रैल 2022 में स्वास्थ्य आधार पर त्यागपत्र दिया था।
कंपनी के आरोप1. प्रतिवादी ने संवेदनशील अनुबंध और मूल्य निर्धारण डेटा अपने निजी ईमेल पर ट्रांसफर किया।
2. नौकरी छोड़ने के बाद अन्य पूर्व कर्मचारियों के साथ सिंडिकेट बनाकर प्रतिस्पर्धी फर्म को डेटा लीक किया और ग्राहकों को डायवर्ट किया।
3. कंपनी को ₹20 लाख से अधिक का नुकसान हुआ।
प्रतिवादी का बचाव1. महामारी के दौरान वर्क फ्रॉम होम के तहत कंपनी की नीति के अनुसार काम किया गया था।
2. इस्तीफा विधिवत स्वीकार हुआ और कंपनी ने संपूर्ण जांच के बाद बिना किसी आपत्ति के रिलीविंग लेटर दिया।
3. किसी प्रतिस्पर्धी फर्म में क्लाइंट नहीं तोड़े गए; यह मुकदमा करियर बाधित करने की दुर्भावना से किया गया है।
अदालत का फैसलाकंपनी नुकसान साबित करने में पूर्णतः विफल रही; इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य अप्रमाणित रहे; मुकदमा सव्यय खारिज।

विधिक एवं सांविधिक विश्लेषण: संविदा अधिनियम की धारा 27 और गैर-प्रतिस्पर्धा की सीमा

  • भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 27 (Agreement in Restraint of Trade):
    • भारत में रोजगार-उपरांत गैर-प्रतिस्पर्धा खंड (Post-Employment Non-Compete Clauses) कानूनन अप्रवर्तनीय हैं।
    • धारा 27 स्पष्ट शब्दों में घोषणा करती है कि हर वह करार, जिसके द्वारा कोई व्यक्ति किसी वैध व्यापार, कारोबार या पेशे के अभ्यास से रोका जाता है, उस सीमा तक शून्य (Void) है। भारतीय कानून अंग्रेजी कॉमन लॉ की भांति ‘युक्तियुक्त प्रतिबंध’ (Reasonable Restraint) के सिद्धांत को रोजगार अनुबंधों में स्वीकार नहीं करता।
  • सर्वोच्च न्यायालय की सुस्थापित नजीरें:
    • निरंजन शंकर गोलिकरी बनाम सेंचुरी स्पिनिंग [(1967) 2 SCR 378]: सेवाकाल के दौरान अन्यत्र कार्य न करने का नकारात्मक अनुबंध वैध है, किंतु सेवा समाप्ति के बाद ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता।
    • सुपरसोनिक्स / परसेप्ट डी’मार्क बनाम जहीर खान [(2006) 4 SCC 227]: सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया था कि अनुबंध समाप्त होने के बाद किसी व्यक्ति की आजीविका कमाने की स्वतंत्रता पर कोई भी संविदात्मक रोक नहीं लगाई जा सकती; धारा 27 में कोई अपवाद नहीं है।
  • कौशल और ज्ञान की स्वतंत्रता:
    • कोई भी कर्मचारी वर्षों के सेवाकाल में जो बौद्धिक परिपक्वता, प्रबंधकीय क्षमता और सामान्य कौशल सीखता है, वह उस व्यक्ति का अभिन्न अंग बन जाता है।
    • अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक कोई ठोस प्रमाण न हो कि किसी विशिष्ट गुप्त डेटाबेस को भौतिक रूप से चुराकर इस्तेमाल किया गया है, तब तक केवल यह कहकर कि “वह हमारी प्रतिस्पर्धी कंपनी में जा रही है”, किसी पेशेवर का करियर नहीं रोका जा सकता।

विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता

  • केस संदर्भ: ईओएक्स वैंटेज प्राइवेट लिमिटेड बनाम श्रुति बी.एस. [मूल वाद / Original Suit – नगर दीवानी एवं सत्र न्यायालय, बेंगलुरु]
  • न्यायाधीश: जे.वी. कुलकर्णी (अतिरिक्त नगर दीवानी एवं सत्र न्यायाधीश)
  • निर्णय की तिथि: 6 अक्टूबर 2026
  • संबद्ध विषय: गोपनीयता अनुबंध की आड़ में प्रतिस्पर्धी कंपनी में जाने पर रोक, धारा 27 संविदा अधिनियम एवं ₹20 लाख हर्जाना वाद

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • वादी (EOX Vantage Pvt. Ltd.) की ओर से: अधिवक्ता एन.बी. नरसिम्हा मूर्ति (Advocate NB Narasimha Murthy)
  • प्रतिवादी (पूर्व कर्मचारी) की ओर से: प्रतिवादी अधिवक्ता
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 — धारा 27 (व्यापार में रुकावट डालने वाले करारों का शून्य होना) एवं धारा 73 (संविदा भंग के लिए हर्जाना)
    • विशिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 (Specific Relief Act) — धारा 38 एवं धारा 41 (स्थायी निषेधाज्ञा से इनकार के आधार)
    • भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 — धारा 65B (इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की ग्राह्यता व फॉरेंसिक रिपोर्ट का संधारण)
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 19(1)(g) (कोई भी वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारबार करने का मूल अधिकार)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • आजीविका की स्वतंत्रता और गैर-प्रतिस्पर्धा का निषेध: ‘रोजगार समाप्ति के बाद पूर्व कर्मचारी को प्रतिस्पर्धी फर्म में जाने से रोकना संविदा कानून की धारा 27 का उल्लंघन है; नियोक्ता आंतरिक जांच या सामान्य गोपनीयता खंड का दुरुपयोग कर कर्मचारियों के सामान्य अनुभव, कौशल और गतिशीलता पर अंकुश नहीं लगा सकते।’
  • अंतिम परिणाम: ईओएक्स वैंटेज का वाद पूरी तरह निराधार व अटकलबाजी करार; स्थायी निषेधाज्ञा और ₹20 लाख हर्जाने की मांग नामंजूर; मुकदमा वादी कंपनी पर हर्जाना (With Costs) लगाते हुए खारिज।

Investigation Report:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतअतिरिक्त नगर सिविल एवं सत्र न्यायालय, बेंगलुरु
न्यायाधीशजे.वी. कुलकर्णी (अतिरिक्त नगर सिविल एवं सत्र न्यायाधीश)
मामले का शीर्षकईओएक्स एडवांटेज प्राइवेट लिमिटेड बनाम श्रुति बी.एस. (EOX Vantage Vs Shruthi BS)
संबंधित कानूनभारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 27 (व्यापार/रोजगार में बाधा डालने वाले समझौते अमान्य हैं)
कंपनी का आरोपडेटा चोरी, गोपनीय जानकारी प्रतिद्वंद्वियों को लीक करना, क्लाइंट छीनना (Poaching)।
अदालत का अंतिम आदेशकंपनी का मुकदमा खारिज; कंपनी पर हर्जाना/लागत (Costs) लगाई गई और मुकदमे को काल्पनिक (Speculative) माना गया।
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