एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | कर्नाटका उच्च न्यायालय (Karnataka High Court) |
| पीठासीन पीठ | न्यायमूर्ति मोहम्मद नवाज एवं न्यायमूर्ति जी बासवराज |
| मामला/कानून | धारा 164 CrPC / धारा 183 BNSS (मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान) एवं POCSO Act |
| मुख्य कानूनी बिंदु | धारा 164 के तहत दर्ज बयान की कॉपी धारा 207 CrPC के तहत आरोपी को न देना अनुच्छेद 21 (Fair Trial) का उल्लंघन है। |
| अदालत का फैसला | POCSO आरोपी बरी; पुलिस और जजों के लिए अनिवार्य गाइडलाइन्स जारी। |
बेंगलुरु: कर्नाटक हाईकोर्ट ने निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial) के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार बताते हुए POCSO मामले में उम्रकैद की सजा पाए एक आरोपी को बरी कर दिया है।
न्यायमूर्ति मोहम्मद नवाज और न्यायमूर्ति जी. बसवराजा की खंडपीठ ने कोलार की ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए दोषसिद्धि और आजीवन कारावास के फैसले को रद्द करते हुए यह व्यवस्था दी। इसके साथ ही अदालत ने आपराधिक मामलों में CrPC की धारा 164 [अब BNSS की धारा 183] के तहत दर्ज बयानों के परीक्षण, चार्जशीट से पहले जांच अधिकारियों की जिम्मेदारी और आरोपी को बयानों की अनिवार्य प्रतियां उपलब्ध कराने के संबंध में ट्रायल कोर्ट और पुलिस के लिए विस्तृत स्वतः संज्ञान दिशा-निर्देश (Guidelines) जारी किए हैं ।
उच्च न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियां
निष्पक्ष सुनवाई और गलत दोषसिद्धि पर खंडपीठ ने रेखांकित किया: “आरोप चाहे कितना भी गंभीर क्यों न हो, एक अभियुक्त निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial) का हकदार है। उसे यह जानने का अधिकार है कि उसके खिलाफ क्या विशिष्ट आरोप लगाए गए हैं, उस आरोप की कानूनी रूप से स्वीकार्य और विश्वसनीय साक्ष्यों पर जांच हो, तथा रिकॉर्ड से उठने वाले हर उचित संदेह का लाभ उसे मिले। अपराध जितना गंभीर होगा, दोषसिद्धि से पहले साक्ष्यों की अदालती जांच उतनी ही सूक्ष्म होनी चाहिए, क्योंकि यह भी उतना ही सच है कि किसी निर्दोष की गलत दोषसिद्धि (Wrongful Conviction) न्याय की विफलता (Miscarriage of Justice) से कम नहीं है।”
आरोपी को दस्तावेज न देने पर अदालत ने कहा: “CrPC की धारा 164(5) के तहत दर्ज बयान की प्रति आरोपी को न देना (धारा 207(iv) CrPC का उल्लंघन), संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आरोपी को मिले निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का सीधा हनन है। विशेष न्यायाधीश के पास धारा 173(5) के तहत दस्तावेजों को रोकने का कोई विवेकाधिकार नहीं है।”
जांच अधिकारियों (Investigating Officers) के लिए दिशा-निर्देश
- चार्जशीट से पहले 164 के बयान का अनिवार्य अवलोकन: चार्जशीट या अंतिम रिपोर्ट दाखिल करने से पहले आईओ का कर्तव्य होगा कि वह धारा 164(5) CrPC [धारा 183(5) BNSS] के तहत दर्ज बयानों का गहन अध्ययन करे।
- विवेक का इस्तेमाल (Application of Mind): प्रमाणित प्रति प्राप्त करने के बाद आईओ यह परखेगा कि बयान अभियोजन के मामले का समर्थन करता है या उसके विपरीत है।
- गवाह द्वारा आरोप न लगाने पर स्वतंत्र साक्ष्य की आवश्यकता: यदि गवाह 164 के बयान में आरोपी के खिलाफ कुछ नहीं कहता है, तो आईओ को चार्जशीट दाखिल करने से पहले स्वयं संतुष्ट होना होगा कि आरोपी के खिलाफ स्वतंत्र रूप से पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं। बयान को नजरअंदाज करने के कारणों को केस डायरी में दर्ज करना अनिवार्य होगा।
- आईओ ‘प्री-ट्रायल जज’ की भूमिका में: अदालत ने रेखांकित किया कि आईओ वास्तव में एक ‘प्री-ट्रायल जज’ की तरह काम करता है और उस पर यह सुनिश्चित करने का विधिक दायित्व है कि केवल पर्याप्त आधार होने पर ही चार्जशीट दाखिल की जाए।
ट्रायल कोर्ट जजों (Trial Court Judges) के लिए दिशा-निर्देश
- सुरक्षित अभिरक्षा (Safe Custody): धारा 164 का बयान दर्ज होते ही मजिस्ट्रेट का कर्तव्य होगा कि वह उसे सुरक्षित अभिरक्षा में रखे।
- दस्तावेजों का अनिवार्य वितरण: आरोपी के कोर्ट में पेश होते ही धारा 207(iv) CrPC के तहत उसे धारा 164 के बयान सहित सभी जरूरी दस्तावेजों की प्रतियां बिना किसी देरी के उपलब्ध कराई जाएं।
- प्रमाणित प्रतियां तुरंत जारी करना: आईओ द्वारा आवेदन किए जाने पर संबंधित अदालत बिना किसी देरी के बयान की सर्टिफाइड कॉपी जारी करेगी।
- धारा 313 के तहत स्पष्टीकरण का अवसर: कई मामलों में जज धारा 313 CrPC के तहत बयान दर्ज करते समय 164 के बयानों से जुड़े सवाल आरोपी से नहीं पूछते। हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि धारा 164 के बयानों और कोर्ट में दी गई गवाही के अंतर्विरोधों पर आरोपी से सवाल पूछे जाएं ताकि उसे स्पष्टीकरण का अवसर मिले।
- प्रतिकूल निष्कर्ष (Adverse Inference): यदि आईओ धारा 164 का बयान पेश करने में विफल रहता है, तो ट्रायल कोर्ट साक्ष्य अधिनियम की धारा 114 (चित्रण g) के तहत अभियोजन के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकाल सकती है।
आरोपी को बरी करने के मुख्य आधार
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आजीवन कारावास के फैसले को पलटते हुए आरोपी को निम्नलिखित आधारों पर बरी किया:
- पीड़िता की उम्र नाबालिग होने का कोई वैध और ठोस प्रमाण पेश नहीं किया गया।
- धारा 164 CrPC का बयान आरोपी को नहीं दिया गया, जो अनुच्छेद 21 का उल्लंघन था।
- पीड़िता का 164 का बयान और ट्रायल के दौरान दी गई गवाही में भारी विरोधाभास था।
- मेडिकल साक्ष्यों ने दुष्कर्म की पुष्टि नहीं की।
- बिना औपचारिक आरोप (Charge Frame) तय किए ही आरोपी को सीधे आईपीसी की धारा 376(2)(n) के तहत दोषी ठहरा दिया गया था, जो प्रक्रियात्मक रूप से अवैध था।
अनुपालन के लिए प्रशासनिक निर्देश
कर्नाटक उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि:
- इस निर्णय और दिशा-निर्देशों की प्रति कर्नाटक के गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव और डीजीपी को भेजी जाए, ताकि राज्य के सभी जांच अधिकारियों को इसका कड़ाई से पालन करने हेतु सर्कुलर जारी किया जा सके।
- राज्य की सभी आपराधिक अदालतों के न्यायिक अधिकारियों और कर्नाटक न्यायिक अकादमी के अध्यक्ष को भी यह आदेश भेजा जाए ताकि प्रशिक्षु जजों को इसका प्रशिक्षण दिया जा सके।
- न्यायालय ने प्रतिवादी संख्या 2 की ओर से न्यायमित्र (Amicus Curiae) नियुक्त अधिवक्ता एन. एस. संपंगी रमैया को ₹10,000 मानदेय देने का निर्देश दिया।
कर्नाटका हाईकोर्ट की टिप्पणी
न्यायमूर्ति मोहम्मद नवाज और न्यायमूर्ति जी बासवराज ने कहा: “आरोप कितना भी गंभीर क्यों न हो, एक आरोपी निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial) का हकदार है। अपराध जितना गंभीर होगा और सजा जितनी बड़ी होगी, सजा सुनाने से पहले सबूतों की न्यायिक जांच उतनी ही सूक्ष्म होनी चाहिए। एक गलत सजा किसी गलत बरी किए जाने से कम न्याय का हनन नहीं है।”

