मुख्य बिंदु (Key Indicators)
- विवाद की पृष्ठभूमि: एक वाहन (12-व्हीलर) के फाइनेंस और जब्ती को लेकर विवाद हुआ था। शिकायतकर्ता का आरोप था कि फाइनेंस कंपनी के कर्मचारियों और शाखा प्रबंधक ने 2 मार्च 2015 को कोयले से लदे उसके वाहन को रोका, ड्राइवर के साथ मारपीट की, ₹50,000 छीने और गाड़ियां छीन लीं।
- निचली अदालत की प्रक्रियात्मक चूक: रांची के प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट (JMFC) ने IPC की धारा 323, 379, 504 और 506 के तहत मामला मानते हुए निदेशक और शाखा प्रबंधक के पदों पर बिना उनके व्यक्तिगत नाम दर्ज किए समन जारी कर दिए थे।
- पद कोई विधिक व्यक्ति (Juristic Person) नहीं: हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की इस दलील को स्वीकार किया कि कोई ‘पद’ अपने आप में विधिक व्यक्ति नहीं होता। इसलिए बिना व्यक्ति के नाम के पद के नाम पर आपराधिक समन भेजना कानूनन एक गंभीर अवैधता (Grave Illegality) है।
- प्रतिनिधिक दायित्व (Vicarious Liability) का सिद्धांत: याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के संजय दत्त बनाम हरियाणा राज्य और सुनील भारती मित्तल बनाम सीबीआई के ऐतिहासिक फैसलों का हवाला दिया। कोर्ट ने माना कि IPC के तहत कंपनी के अपराधों के लिए अधिकारियों पर स्वतः प्रतिनिधिक दायित्व लागू नहीं होता, जब तक कि संबंधित कानून में इसका स्पष्ट प्रावधान न हो या व्यक्तिगत आपराधिक संलिप्तता के ठोस सबूत न हों।
रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण विधिक व्यवस्था में स्पष्ट किया है कि किसी भी आपराधिक मामले में पद धारण करने वाले व्यक्ति का नाम दर्ज किए बिना केवल ‘पद’ (Post) के नाम पर समन जारी नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति अनिल कुमार चौधरी की एकल पीठ ने ‘हिंदुजा लेलैंड फाइनेंस लिमिटेड’ के निदेशक (Director) और शाखा प्रबंधक (Branch Manager) के खिलाफ संज्ञान आदेश, समन और संपूर्ण आपराधिक कार्यवाही को रद्द (Quash) कर दिया। अदालत ने कहा कि कोई पद स्वयं में विधिक व्यक्ति (Juristic Person) नहीं होता, इसलिए पद के नाम पर जारी किया गया समन कानूनन अवैध है।
उच्च न्यायालय का मुख्य कानूनी सिद्धांत
आपराधिक प्रक्रिया में समन जारी करने के स्थापित नियमों को रेखांकित करते हुए अदालत ने कहा: “यह कानून का एक सुस्थापित सिद्धांत है कि किसी आपराधिक मामले में उस पद को धारण करने वाले व्यक्ति के नाम का उल्लेख किए बिना केवल पद के नाम पर समन जारी नहीं किया जा सकता।”
पीठ ने पाया कि रांची के प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट (JMFC-XXVII) ने व्यक्तियों का नाम लिखे बिना केवल ‘निदेशक’ और ‘शाखा प्रबंधक’ के पदनाम पर समन जारी करके गंभीर अवैधता (Grave Illegality) की है, जिसे जारी रखना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
मामले की पृष्ठभूमि
- वाहन जब्ती का विवाद: मामला 2 मार्च 2015 का है, जो याचिकाकर्ता कंपनी द्वारा वित्तपोषित (Financed) एक 12-पहिया वाहन से जुड़ा था।
- शिकायतकर्ता के आरोप: शिकायत में आरोप लगाया गया था कि कंपनी के कर्मचारियों और शाखा प्रबंधक ने कोयले से लदे वाहन को रोका, चालक के साथ मारपीट की, उससे ₹50,000 नकद छीन लिए और वाहन को जबरन जब्त कर लिया।
- निचली अदालत का संज्ञान: शिकायत, शपथ पत्र पर बयान और गवाहों के बयानों के आधार पर मजिस्ट्रेट अदालत ने आईपीसी की धारा 323 (मारपीट), 379 (चोरी), 504 (शांति भंग करने के इरादे से अपमान) और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत संज्ञान लेते हुए समन जारी किया था।
- BNSS की धारा 528 के तहत चुनौती: याचिकाकर्ताओं ने समन और कार्यवाही को रद्द कराने के लिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याचिकाकर्ताओं की मुख्य दलीलें
याचिकाकर्ता कंपनी के अधिकारियों की ओर से सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसलों पर भरोसा जताया गया:
- प्रतिनिधिक दायित्व (Vicarious Liability) का अभाव: संजय दत्त बनाम हरियाणा राज्य और सुनील भारती मित्तल बनाम सीबीआई मामलों का हवाला देते हुए तर्क दिया गया कि जब तक कानून (Statute) में कंपनी के अधिकारियों पर प्रतिनिधिक दायित्व का स्पष्ट प्रावधान न हो, तब तक उन्हें सीधे आरोपी नहीं बनाया जा सकता।
- सक्रिय भूमिका और आपराधिक मंशा: कंपनी की ओर से किए गए कथित कृत्य के लिए किसी व्यक्ति को तभी आरोपी बनाया जा सकता है जब उसके खिलाफ आपराधिक मंशा (Mens Rea) और प्रत्यक्ष सक्रिय भूमिका के पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हों।
- आईपीसी में सामान्य प्रतिनिधिक दायित्व नहीं: याचिकाकर्ताओं की घटना में कोई सीधी संलिप्तता नहीं थी और आईपीसी के तहत प्रतिनिधिक दायित्व का कोई अंतर्निहित प्रावधान न होने के कारण यह समन आदेश टिकने योग्य नहीं था।
अंतिम आदेश
झारखंड उच्च न्यायालय ने सभी दलीलों और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्रियों पर विचार करने के बाद याचिका स्वीकार कर ली। अदालत ने निचली अदालत द्वारा लिए गए संज्ञान, जारी किए गए समन आदेश और हिंदुजा लेलैंड फाइनेंस के निदेशक व शाखा प्रबंधक के खिलाफ लंबित संपूर्ण आपराधिक कार्यवाही को पूरी तरह रद्द (Quash and Set Aside) कर दिया।
झारखंड हाईकोर्ट की टिप्पणी
न्यायमूर्ति अनिल कुमार चौधरी ने फैसला सुनाते हुए कहा: “कानून का यह स्थापित सिद्धांत है कि किसी आपराधिक मामले में उस व्यक्ति के नाम का उल्लेख किए बिना केवल पद के नाम पर समन जारी नहीं किया जा सकता जो उस पद को धारण कर रहा है। निदेशक और शाखा प्रबंधक के खिलाफ इस तरह से आपराधिक कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का स्पष्ट दुरुपयोग होगा।”
इन्होंने केस में की थी पैरवी
- याचिकाकर्ताओं की ओर से: अधिवक्ता भरत कुमार
- प्रतिवादियों की ओर से: अधिवक्ता राकेश रंजन
Issues of Summon: एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | झारखंड उच्च न्यायालय (Jharkhand High Court) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति अनिल कुमार चौधरी (Justice Anil Kumar Choudhary) |
| याचिकाकर्ता | हिंदूजा लेलैंड फाइनेंस लिमिटेड के निदेशक और शाखा प्रबंधक |
| संबंधित कानून | BNSS 2023 की धारा 528 (पुराना CrPC 482) और IPC की धारा 323, 379, 504, 506 |
| अदालत का निर्णय | संज्ञान आदेश, समन आदेश और पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द। |

