उत्तराखंड हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष
- सहमति की कोई कानूनी मान्यता नहीं: कोर्ट ने माना कि मेडिकल साक्ष्यों और स्कूल रिकॉर्ड्स से प्रथम दृष्टया (Prima Facie) यह साबित होता है कि घटना के वक्त पीड़िता नाबालिग थी। पॉक्सो कानून के तहत नाबालिग की सहमति का कोई कानूनी औचित्य नहीं होता।
- शादी का प्रस्ताव अप्रासंगिक: पीठ ने स्पष्ट किया कि आरोपी द्वारा शादी करने का प्रस्ताव देने या रोमांटिक रिश्ते की बात कहने से पॉक्सो कानून के तहत मिलने वाले कड़े संरक्षण को बेअसर नहीं किया जा सकता।
- धार्मिक पहचान छिपाना गंभीर: अदालत ने आरोपी द्वारा अपनी धार्मिक पहचान छिपाकर नाबालिग का विश्वास हासिल करने के आरोप को गंभीर माना और इसे भी जमानत न देने का एक आधार बनाया।
नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने नाबालिग के साथ यौन उत्पीड़न से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि प्रेम संबंध (Romantic Relationship) की दलील और बाद में शादी करने का प्रस्ताव (Proposal to Marry) किसी भी स्थिति में POCSO अधिनियम के तहत नाबालिग बच्चे को दिए गए वैधानिक संरक्षण को कमजोर नहीं कर सकता। अदालत ने दोहराया कि कानून की नजर में नाबालिग की सहमति (Consent) पूरी तरह से अप्रासंगिक और प्रभावहीन है।
न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की एकल पीठ ने आरोपी द्वारा धार्मिक पहचान छिपाकर नाबालिग को झांसे में लेने, पीड़िता की उम्र, उसके गर्भवती होने और संतान को जन्म देने के मेडिकल साक्ष्यों के मद्देनजर आरोपी की पहली नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी।
उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां
नाबालिग की सहमति और विवाह के प्रस्ताव पर अदालत ने रेखांकित किया: “मेडिकल साक्ष्य और स्कूल रिकॉर्ड प्रथम दृष्टया स्थापित करते हैं कि कथित घटना के समय पीड़िता नाबालिग थी। चूंकि आवेदक के खिलाफ POCSO अधिनियम के तहत चार्जशीट दाखिल की गई है, इसलिए कानून की नजर में नाबालिग की सहमति पूरी तरह से अप्रासंगिक (Irrelevant) है। रोमांटिक संबंध की दलील और शादी का बाद का प्रस्ताव POCSO अधिनियम के तहत नाबालिग बच्चे को दिए गए वैधानिक संरक्षण को कमजोर (Dilute) नहीं कर सकता।”
धार्मिक पहचान छिपाने और जमानत खारिज करने पर पीठ ने कहा: “अभियोजन पक्ष ने नाबालिग का विश्वास जीतने के लिए आरोपी द्वारा अपनी धार्मिक पहचान छिपाने का गंभीर आरोप सामने रखा है। पीड़िता की उम्र, उसके गर्भवती होने के चिकित्सीय तथ्य और POCSO एक्ट के तहत सहमति पर वैधानिक रोक को देखते हुए, यह अदालत आवेदक को जमानत पर रिहा करने के लिए उपयुक्त मामला नहीं पाती है।”
मामले की पृष्ठभूमि और अभियोजन पक्ष के आरोप
- गुमशुदगी से एफआईआर तक: 28 जून 2025 को पीड़िता के परिजनों ने उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई थी। जांच के दौरान आवेदक का नाम सामने आने पर इसे नियमित एफआईआर में तब्दील किया गया। बाद में पुलिस ने पीड़िता को आरोपी के साथ ऋषिकेश रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म से बरामद किया।
- इंस्टाग्राम से दोस्ती और शोषण: पीड़िता ने अपने बयान में बताया कि वह 2024 से इंस्टाग्राम के जरिए आरोपी के संपर्क में थी। मार्च 2024 में आरोपी उसे घुमाने के बहाने जंगल में ले गया और जबरन शारीरिक संबंध बनाए व किसी को बताने पर जान से मारने की धमकी दी। इसके बाद वह उसे होटलों सहित विभिन्न स्थानों पर ले गया।
- यौन उत्पीड़न और गर्भावस्था: पीड़िता ने अपने बयान में बताया कि वह आरोपी को 2024 से इंस्टाग्राम के जरिए जानती थी। आरोप है कि मार्च 2024 में आरोपी उसे जंगल ले गया और जबरन शारीरिक संबंध बनाए। इसके बाद वह कई होटलों में भी उसे ले गया। पीड़िता गर्भवती हो गई और उसने 15 अक्टूबर 2025 को एक बच्चे को जन्म दिया।
- गर्भावस्था और संतान का जन्म: शारीरिक शोषण के चलते पीड़िता गर्भवती हो गई और उसने 15 अक्टूबर 2025 को एक बच्चे को जन्म दिया। डीएनए मिलान के लिए रक्त के नमूने विधि विज्ञान प्रयोगशाला (FSL) भेजे गए।
- धार्मिक पहचान छिपाने का आरोप: अभियोजन पक्ष के अनुसार, पीड़िता को आरोपी की वास्तविक धार्मिक पहचान (मुस्लिम समुदाय का सदस्य होना) के बारे में जानकारी नहीं थी और आरोपी ने पहचान छिपाकर उसे झांसे में लिया था।
- आरोपी की दलीलें (शादी का प्रस्ताव): आरोपी के वकील ने दलील दी कि वह पेशा से पेंटर है और पीड़िता से गहरा लगाव रखता है। उसने कहा कि वह रिश्ते को वैधता देने और बच्चे के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए पीड़िता से शादी करने को तैयार है। इसके अलावा, स्कूल सर्टिफिकेट के आधार पर घटना के वक्त पीड़िता की उम्र को लेकर भी बहस की गई।
- राज्य सरकार का विरोध: राज्य सरकार ने जमानत का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि पीड़िता स्कूल जाने वाली नाबालिग है, जिसकी सहमति का कानून में कोई मूल्य नहीं है। पीड़िता और उसके माता-पिता शादी के किसी भी प्रस्ताव के सख्त खिलाफ हैं और कड़ी कार्रवाई चाहते हैं।
आरोपी की दलीलें
आरोपी के वकील ने जमानत की मांग करते हुए तर्क दिया कि:
- आवेदक बेकसूर है और प्राथमिक एफआईआर में उसका नाम दर्ज नहीं था; उसे केवल संदेह के आधार पर फंसाया गया है।
- कथित घटना की तारीख पर पीड़िता बालिग थी, और यदि स्कूल रिकॉर्ड भी देखें तो घटना के समय उसकी उम्र करीब 17 वर्ष 9 महीने थी, जो उम्र पर गंभीर संदेह पैदा करता है।
- आवेदक पेशे से पेंटर है, पीड़िता से गहरा लगाव रखता है और रिश्ते को कानूनी मान्यता देने व बच्चे का भविष्य सुरक्षित करने के लिए उससे शादी करने को तैयार है।
राज्य सरकार का कड़ा विरोध
राज्य सरकार ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि:
- पीड़िता स्कूल जाने वाली नाबालिग छात्रा थी, जिसकी सहमति का कानून में कोई अर्थ नहीं है।
- आरोपी ने जानबूझकर अपनी पहचान छिपाई, नाबालिग को जाल में फंसाया और उसका यौन शोषण किया।
- पीड़िता और उसके माता-पिता शादी के किसी भी प्रस्ताव को सिरे से खारिज करते हैं और आरोपी के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई चाहते हैं।
उत्तराखंड हाईकोर्ट की टिप्पणी
न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल ने आदेश सुनाते हुए कहा: “चिकित्सकीय साक्ष्य और स्कूल के रिकॉर्ड प्रथम दृष्टया यह स्थापित करते हैं कि कथित घटना के समय पीड़िता नाबालिग थी। चूंकि आवेदक पर पॉक्सो अधिनियम के तहत आरोप पत्र दाखिल किया गया है, इसलिए कानून की नजर में नाबालिग की सहमति पूरी तरह से अप्रासंगिक है। रोमांटिक संबंध का दावा और बाद में शादी करने का प्रस्ताव पॉक्सो अधिनियम के तहत नाबालिग बच्चे को दिए गए वैधानिक संरक्षण को कम नहीं कर सकता। पीड़िता की उम्र, उसकी गर्भावस्था के मेडिकल तथ्य और पॉक्सो के तहत सहमति पर वैधानिक रोक को देखते हुए आरोपी को जमानत पर रिहा करना उचित नहीं है।”
अंतिम आदेश
उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने आरोपी की जमानत अर्जी को पूरी तरह खारिज कर दिया। इसके साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि इस आदेश में की गई टिप्पणियां केवल जमानत के निस्तारण तक सीमित हैं और ट्रायल कोर्ट मामले के गुण-दोष (Merits) पर स्वतंत्र रूप से सुनवाई करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र रहेगा।
POCSO & Romance: एट ए ग्लान्स (At a Glance of Order)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | उत्तराखंड उच्च न्यायालय (Uttarakhand High Court) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल (Justice Rakesh Thapliyal) |
| दर्ज कानून/धाराएं | बीएनएसएस (BNSS 2023) की धारा 137(2), 64 एवं POCSO Act की धारा 5(l) व 6 |
| मुख्य कानूनी सिद्धांत | पॉक्सो मामले में नाबालिग की सहमति अप्रासंगिक है; शादी का प्रस्ताव या प्रेम संबंध जमानत का आधार नहीं बन सकता। |
| अदालत का फैसला | आरोपी की जमानत याचिका खारिज (Bail Rejected)। |

