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मामले की पृष्ठभूमि और याचिकाकर्ता के मुख्य तर्क
- ‘डार्क पैटर्न्स’ और डोपामाइन लूप का जाल:वरिष्ठ अधिवक्ता गीता लूथरा के माध्यम से दायर याचिका में आरोप लगाया गया कि टेक कंपनियां उपयोगकर्ताओं (विशेषकर बच्चों) को प्लेटफॉर्म से चिपकाए रखने के लिए न्यूरोलॉजिकल स्तर पर प्रभाव डालने वाले फीचर्स लागू करती हैं। यह बच्चों की एकाग्रता और नींद के पैटर्न को नष्ट कर रहा है।
- आयु-सत्यापन में नाकामी और POCSO/IT अधिनियम का उल्लंघन:याचिका में कहा गया है कि प्लेटफॉर्म्स पर कमजोर आयु-सत्यापन (Age-Verification) प्रणालियों के कारण 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चे आसानी से फर्जी अकाउंट बना लेते हैं। इसके कारण बच्चे ऑनलाइन ग्रूमिंग (Online Grooming) और बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) के खतरे में आ रहे हैं, जो आईटी अधिनियम और पोक्सो अधिनियम (POCSO Act) का सीधा उल्लंघन है।
- दोहरे मापदंड का आरोप (Western vs Indian Protections):याचिकाकर्ता ने उजागर किया कि मेटा ने नियामक दबाव के तहत पश्चिमी देशों (अमेरिका/यूरोप) में ‘सेफ्टी-बाय-डिजाइन’ सुरक्षा उपायों को स्वीकार किया है, लेकिन भारत जैसे बड़े बाजार में उसने बच्चों की सुरक्षा के लिए ऐसे कड़े उपाय लागू नहीं किए हैं।
- पूर्व में जारी समान नोटिस:उल्लेखनीय है कि पिछले महीने (अक्टूबर 2026 में) सर्वोच्च न्यायालय ने इंदौर स्थित ‘एमराल्ड हाइट्स इंटरनेशनल स्कूल’ और उसके निदेशक सिद्धार्थ सिंह द्वारा दायर ऐसी ही एक याचिका पर भी केंद्र सरकार और NCPCR को नोटिस जारी किया था, जिसमें बच्चों को साइबर बुलिंग और डिजिटल निर्भरता से बचाने के लिए नियामक ढांचे की मांग की गई थी।
मुख्य विधिक व सामाजिक निष्कर्ष
1. डिजिटल अधिकार और बाल कल्याण (Child Rights in Digital Era):
सर्वोच्च न्यायालय का टेक कंपनियों के एल्गोरिदम और डेटा प्रोफाइलिंग पर संज्ञान लेना भारत में डिजिटल सुरक्षा (Data Protection & Children’s Digital Rights) की दिशा में एक नया अध्याय है। यह अधिकार क्षेत्र केवल विषय-सामग्री तक सीमित न रहकर इसके डिज़ाइन तंत्र को भी नियंत्रित करने की ओर कदम बढ़ाता है।
2. बहुराष्ट्रीय टेक कंपनियों की वैधानिक जवाबदेही:
यह कार्यवाही यह सुनिश्चित करेगी कि बहुराष्ट्रीय सोशल मीडिया दिग्गजों को भारत में पश्चिमी देशों के समान ही बाल-सुरक्षा और सुरक्षा मानकों को लागू करने के लिए विधिक रूप से बाध्य किया जा सके।
नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 21 (बच्चों के शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य और गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार), डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 (DPDP Act, 2023) की धारा 9 (बच्चों के व्यक्तिगत डेटा के प्रसंस्करण पर सख्त प्रतिबंध, व्यवहार ट्रैकिंग और लक्षित विज्ञापनों पर रोक), लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act, 2012), सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act, 2000) सहपठित आईटी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021, तथा सोशल मीडिया डिजाइनिंग में ‘डार्क पैटर्न्स’ (Dark Patterns) और एल्गोरिद्मिक लत के विधिक व नियामक मानकों के तहत सर्वोच्च न्यायालय ने बिग टेक कंपनियों के खिलाफ एक अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक जनहित याचिका पर संज्ञान लिया है।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत (Chief Justice of India Surya Kant), न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची (Justice Joymalya Bagchi) और न्यायमूर्ति वी. मोहना (Justice V. Mohana) की तीन-न्यायाधीशों की विशेष पीठ ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स—मेटा (फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप) आदि—द्वारा बच्चों को प्लेटफॉर्म से चिपकाए रखने हेतु इस्तेमाल किए जाने वाले आक्रामक एल्गोरिदम, अनिवार्य ऑटो-प्ले और डेटा प्रोफाइलिंग के नियमन की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) पर केंद्र सरकार (इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी मंत्रालय) और मेटा इंक (Meta) को औपचारिक नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
शीर्ष अदालत ने इस याचिका को पिछले माह इंदौर स्थित एमराल्ड हाइट्स इंटरनेशनल स्कूल द्वारा दायर समरूप याचिका के साथ जोड़ते हुए एक राष्ट्रीय नियामक ढांचे (National Regulatory Framework) के निर्माण की आवश्यकता पर परीक्षण करने का निर्णय लिया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि मेटा जैसी वैश्विक तकनीकी कंपनियां यूरोपीय संघ और अमेरिका जैसे पश्चिमी देशों में नियामक दबाव के चलते कड़े बाल-सुरक्षा उपाय (Safety-by-Design) लागू करती हैं, किंतु भारत में विशाल उपभोक्ता बाजार होने के बावजूद बच्चों को ‘डोपामीन लूप्स’ (Dopamine Loops) और प्रीडेटरी साइबर शोषण के साये में असुरक्षित छोड़ देती हैं।
जनहित याचिका के मुख्य कानूनी आधार एवं संवैधानिक आक्षेप
1. ‘डार्क पैटर्न्स’ और डोपामीन लूप्स के जरिए बच्चों में न्यूरोलॉजिकल लत:
वरिष्ठ अधिवक्ता गीता लूथरा (Senior Advocate Geeta Luthra) ने अदालत के समक्ष दलील दी:
- मेटा के प्लेटफॉर्म (फेसबुक, इंस्टाग्राम) जानबूझकर मनोवैज्ञानिक और व्यवहारिक शोषण करने वाले ‘कम्पल्सिव-यूज़ मैकेनिक्स’ (Compulsive-use mechanics)—जिन्हें विधिक भाषा में ‘डार्क पैटर्न्स’ (Dark Patterns) कहा जाता है—का उपयोग करते हैं।
- इन्फिनिट स्क्रॉलिंग (Infinite Scrolling), ऑटो-प्लेइंग वीडियो रील्स (Auto-playing Reels), अनपेक्षित पुश नोटिफिकेशन्स और वेरिएबल रिवॉर्ड सिस्टम (लाइक्स और कमेंट्स की अनिश्चितता) को विशेष रूप से इस तरह कोड किया गया है कि वे बच्चों के अपरिपक्व मस्तिष्क में निरंतर ‘डोपामीन लूप’ (Dopamine Loop) सक्रिय रखें।
- इस न्यूरोलॉजिकल हेरफेर के कारण किशोरों और बच्चों में गंभीर पीडियाट्रिक डिजिटल लत (Severe Paediatric Addiction), संज्ञानात्मक क्षीणता (Cognitive Impairment), नींद की भारी कमी (Sleep Deprivation), चिंता, अवसाद और यहाँ तक कि आत्महत्या/आत्म-नुकसान के विचार (Self-harm Ideation) खतरनाक स्तर तक बढ़ रहे हैं।
2. लचर आयु-सत्यापन तंत्र और पॉक्सो (POCSO) व CSAM के खतरे:
- याचिका में रेखांकित किया गया कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर उम्र सत्यापन (Age-Verification) की कोई प्रभावी और पुख्ता प्रणाली नहीं है।
- इसके चलते 13 वर्ष से कम उम्र के अबोध बच्चे बिना किसी सुरक्षा जांच के इन प्लेटफॉर्म्स पर सक्रिय हैं। इस अप्रतिबंधित पहुंच ने ऑनलाइन ग्रूमिंग (Online Grooming), साइबर बुलिंग और बाल यौन शोषण सामग्री (Child Sexual Abuse Material – CSAM) के प्रसार के लिए एक अत्यंत संवेदनशील और अनुकूल माहौल तैयार कर दिया है, जो सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और पॉक्सो अधिनियम, 2012 के सुरक्षा अधिदेशों का खुला उल्लंघन है।
3. दोहरा वैश्विक मापदंड: ‘पश्चिम में सुरक्षा, भारत में अनियंत्रित शोषण’:
याचिका में बिग टेक कंपनियों के भौगोलिक पक्षपात को उजागर किया गया:
- मेटा ने अमेरिकी सीनेट, अदालती मुकदमों और यूरोपीय संघ के डिजिटल सेवा अधिनियम (EU Digital Services Act – DSA) के कड़े नियामकीय दबाव के बाद पश्चिमी देशों में ‘सेफ्टी-बाय-डिजाइन’ (Safety-by-Design) सुरक्षा कवच और किशोरों हेतु डिफॉल्ट निजी सेटिंग्स लागू की हैं।
- इसके विपरीत, भारत—जो दुनिया में मेटा का सबसे बड़ा यूजर बेस है—में ऐसी सुरक्षा प्रणालियां जानबूझकर लागू नहीं की गईं, जो भारतीय बच्चों के साथ विधिक व सुरक्षात्मक भेदभाव है।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2026)
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| फोरम / न्यायालय | भारत का सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली (संवैधानिक जनहित याचिका क्षेत्राधिकार — अनुच्छेद 32) |
| पीठ | मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना |
| आदेश की तिथि | 4 नवंबर 2026 |
| केस संदर्भ | श्रीरूपा चौधरी बनाम भारत संघ व अन्य [Writ Petition (Civil) PIL No. … / 2026] |
| याचिकाकर्ता | श्रीरूपा चौधरी (Sreerupa Chowdhury) — सामाजिक कार्यकर्ता व याचिकाकर्ता। |
| प्रतिवादी पक्ष | 1. भारत संघ (इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय – MeitY) 2. मेटा प्लेटफॉर्म्स इंक (Meta Platforms Inc.) (फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप की मूल कंपनी) 3. राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) व अन्य। |
| संबद्ध पूर्ववर्ती याचिका (अक्टूबर 2026) | एमराल्ड हाइट्स इंटरनेशनल स्कूल, इंदौर एवं निदेशक सिद्धार्थ सिंह बनाम भारत संघ — सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले माह इस याचिका पर भी केंद्र और एनसीपीसीआर को नोटिस जारी किया था, जिसमें बच्चों को साइबर बुलिंग और डिजिटल निर्भरता से बचाने हेतु सोशल मीडिया पर आयु सीमा लागू करने की मांग की गई थी। |
| याचिका में मांगी गई मुख्य राहतें | 1. राष्ट्रीय विधिक ढांचा: बच्चों को ऑनलाइन शोषण और एल्गोरिद्मिक लत से बचाने हेतु एक व्यापक व बाध्यकारी राष्ट्रीय नीति तैयार की जाए। 2. एल्गोरिद्मिक ऑडिट (Algorithmic Audit): सरकारी नियामक संस्थाओं द्वारा स्वतंत्र तकनीकी विशेषज्ञों के जरिए मेटा के अनुशंसा एल्गोरिदम का ऑडिट कराया जाए। 3. आयु सत्यापन तंत्र (Robust Age Verification): 13 वर्ष से कम आयु के बच्चों के प्रवेश पर पूर्ण रोक और 18 वर्ष से कम के किशोरों के लिए माता-पिता की सहमति अनिवार्य की जाए। 4. डार्क पैटर्न्स पर रोक: इन्फिनिट स्क्रॉलिंग, ऑटो-प्ले रील्स और रात के समय पुश नोटिफिकेशन्स पर अनिवार्य प्रतिबंध लगाया जाए। |
| अदालत का अंतरिम आदेश | नोटिस जारी; केंद्र सरकार व मेटा को हलफनामा दाखिल करने का निर्देश; दोनों याचिकाओं को एक साथ सुनवाई हेतु टैग किया गया। |
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: ‘DPDP एक्ट धारा 9, अनुच्छेद 21 और एल्गोरिद्मिक जवाबदेही’
- डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 (DPDP Act) की धारा 9:
- धारा 9(1) के अनुसार, किसी भी डेटा फिड्यूशरी (Data Fiduciary – जैसे मेटा) को किसी बच्चे से संबंधित व्यक्तिगत डेटा को संसाधित करने से पूर्व उसके माता-पिता या कानूनी अभिभावक की सत्यापन योग्य सहमति (Verifiable Parental Consent) प्राप्त करनी होगी।
- धारा 9(2) और 9(3) का स्पष्ट निषेध: कानून स्पष्ट रूप से कहता है कि कोई भी डेटा फिड्यूशरी ऐसा कोई प्रसंस्करण नहीं करेगा जिसका “बच्चे के कल्याण पर कोई हानिकारक प्रभाव पड़ने की संभावना हो” और न ही वह बच्चों के व्यवहार की निगरानी (Behavioral Monitoring) या लक्षित विज्ञापन (Targeted Advertising) करेगा।
- याचिका में यह तथ्य मजबूती से उठाया गया है कि इंस्टाग्राम और फेसबुक का रील्स एल्गोरिदम पूरी तरह से किशोरों के व्यवहारिक डेटा को ट्रैक करके ही काम करता है, जो DPDP अधिनियम की धारा 9 का खुला उल्लंघन है।
- संविधान का अनुच्छेद 21 और ‘पैरेंस पैट्रिया’ (Parens Patriae) का दायित्व:
- सर्वोच्च न्यायालय ने के.एस. पुट्टास्वामी (निजता का अधिकार) और बंधुआ मुक्ति मोर्चा के ऐतिहासिक फैसलों में यह सिद्धांत प्रतिपादित किया है कि बच्चों के स्वास्थ्य, शारीरिक विकास और मानसिक सुरक्षा की रक्षा करना राज्य का संवैधानिक और अभिभावकीय दायित्व है।
- अनियंत्रित एल्गोरिदम के कारण बच्चों का अवसादग्रस्त होना और आत्महत्या की ओर अग्रसर होना सीधे तौर पर जीने के अधिकार (Right to Life and Mental Wellbeing) का हनन है।
- केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) और ‘डार्क पैटर्न्स’ विनियम:
- भारत सरकार ने नवंबर 2023 में ‘डार्क पैटर्न्स की रोकथाम और विनियमन हेतु दिशानिर्देश’ अधिसूचित किए थे, जिसमें ‘फाल्स अर्जेंसी’, ‘बास्केट स्नीकिंग’ और ‘कन्फर्म शेमिंग’ के साथ-साथ उपयोगकर्ताओं को स्क्रीन पर बांधे रखने वाले भ्रामक इंटरफेस को अनुचित व्यापार व्यवहार (Unfair Trade Practice) घोषित किया गया है।
- सोशल मीडिया कंपनियों द्वारा रील्स के माध्यम से बच्चों को स्क्रीन से चिपकाए रखने को उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत भी जवाबदेह ठहराया जा सकता है।
विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता
- न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली (संवैधानिक जनहित याचिका क्षेत्राधिकार — अनुच्छेद 32)
- केस संदर्भ: श्रीरूपा चौधरी बनाम भारत संघ व अन्य [Writ Petition (Civil) PIL No. … / 2026]
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
- आदेश की तिथि: 4 नवंबर 2026
- कार्यवाही का परिणाम: औपचारिक नोटिस जारी; केंद्र सरकार (MeitY) और मेटा (Meta) से जवाब तलब; इंदौर स्कूल की लंबित याचिका के साथ संबद्ध।
विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (श्रीरूपा चौधरी) की ओर से:
- वरिष्ठ अधिवक्ता गीता लूथरा (Senior Advocate Geeta Luthra)
- अधिवक्ता: शाम्बो नंदी, दक्ष शर्मा, शिवानी लूथरा, मानस अग्रवाल, आदर्श कोठारी, प्रांजल पांडे, ऋषभ दहिया, वर्णिका भारद्वाज, पार्थ तंवर, देवांश तिवारी एवं प्राची शर्मा।
- संबद्ध याचिकाकर्ता (एमराल्ड हाइट्स स्कूल) की ओर से: संबंधित वरिष्ठ अधिवक्तागण।
- भारत संघ (इलेक्ट्रॉनिक्स व आईटी मंत्रालय) की ओर से: केंद्र सरकार के स्थायी विधि अधिकारी / अटॉर्नी जनरल कार्यालय।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक उपबंध:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (प्राण, दैहिक स्वतंत्रता एवं बाल स्वास्थ्य की सुरक्षा), अनुच्छेद 14 (समानता व दोहरे वैश्विक मानकों पर रोक) एवं अनुच्छेद 32
- डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 (DPDP Act, 2023) — धारा 9 (बच्चों के डेटा के प्रसंस्करण पर विशेष प्रतिबंध)
- लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act, 2012) — ऑनलाइन ग्रूमिंग व बाल अश्लीलता निवारण
- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act, 2000) — धारा 67B एवं आईटी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश) नियम, 2021
- उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 — डार्क पैटर्न्स निवारण दिशानिर्देश, 2023
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- डिजिटल बाल कल्याण, एल्गोरिद्मिक शोषण और बहुराष्ट्रीय तकनीकी कंपनियों की जवाबदेही का विधिक मानक: ‘सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स द्वारा किशोरों और बच्चों के अपरिपक्व मनोविज्ञान का फायदा उठाने के उद्देश्य से ‘डार्क पैटर्न्स’ और डोपामीन लूप्स वाले आक्रामक एल्गोरिदम का प्रयोग करना बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और गरिमापूर्ण जीवन के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21) के प्रतिकूल है; बहुराष्ट्रीय तकनीकी कंपनियां भारत में पश्चिमी देशों की तुलना में लचर बाल-सुरक्षा मानक लागू कर नागरिकों के साथ दोहरा मापदंड नहीं अपना सकतीं; डीपीडीपी अधिनियम, 2023 की धारा 9 के तहत बच्चों के व्यवहार की निगरानी (Behavioral Monitoring) और लक्षित विज्ञापनों पर पूर्ण प्रतिबंध का कड़ाई से प्रवर्तन अनिवार्य है; तथा सरकार और नियामकों का यह वैधानिक कर्तव्य है कि वे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर सख्त आयु-सत्यापन प्रणाली, स्वतंत्र एल्गोरिद्मिक ऑडिट और स्क्रीन-टाइम नियंत्रण तंत्र को अनिवार्य रूप से लागू करने हेतु एक बाध्यकारी राष्ट्रीय विधिक ढांचा (National Regulatory Framework) स्थापित करें।’
- वर्तमान स्थिति व आगामी रूपरेखा: सर्वोच्च न्यायालय के नोटिस के बाद केंद्र सरकार (MeitY) को यह स्पष्ट करना होगा कि क्या वह DPDP नियमों के तहत बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग पर कड़े नियम अधिसूचित करने जा रही है; वहीं मेटा को अपना विस्तृत हलफनामा देकर यह स्पष्ट करना होगा कि भारत में बच्चों को एल्गोरिद्मिक लत और यौन शोषण से बचाने के लिए क्या तकनीकी सुरक्षा उपाय लागू किए गए हैं। इन दोनों याचिकाओं की संयुक्त सुनवाई अब दिसंबर 2026 में शीर्ष अदालत द्वारा की जाएगी।
Child Welfare: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | CJI सूर्या कांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना |
| केस / याचिकाकर्ता | श्रीरूपा चौधरी बनाम भारत संघ व अन्य (Sreerupa Chowdhury v. Union of India & Ors) |
| प्रतिनिधित्व | वरिष्ठ अधिवक्ता गीता लूथरा, अधिवक्ता शैम्बो नंदी, दक्ष शर्मा, शिवानी लूथरा आदि। |
| प्रतिवादी पक्ष | केंद्र सरकार (सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय) और मेटा प्लेटफॉर्म्स इंक. (Meta) |
| मूल विषय/मांग | 1. एल्गोरिदम ऑडिट: प्लेटफॉर्म्स के एल्गोरिदम और डेटा प्रोफाइलिंग की ऑडिटिंग कराना। 2. आयु-सत्यापन (Age Verification): 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के प्रवेश को रोकने हेतु प्रभावी व्यवस्था। 3. सुरक्षा मानक: भारत में पश्चिमी देशों की तर्ज पर ‘सेफ्टी-बाय-डिजाइन’ (Safety-by-Design) नियम लागू करना। |
| अदालत का आदेश | नोटिस जारी: केंद्र व मेटा से जवाब तलब; पूर्व में लंबित ‘एमराल्ड हाइट्स स्कूल’ याचिका के साथ विचारणीय। |

