Declining Sex Ratio: सुप्रीम कोर्ट ने देश में घटते लिंगानुपात और कन्या भ्रूण हत्या जैसी सामाजिक बुराई पर एक बेहद गंभीर और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की खंडपीठ ने महाराष्ट्र के एक डॉक्टर (डॉ. रमेश बनाम महाराष्ट्र राज्य) की उस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने अपने सोनोग्राफी सेंटर पर कानूनी कमियों के कारण शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही को चुनौती दी थी। अदालत ने साफ किया है कि पितृसत्तात्मक मानसिकता और बेटे की चाह के कारण आज भी समाज में ‘पर्दे के पीछे’ लिंग चयन (Sex Selection) की प्रथाएं धड़ल्ले से जारी हैं। ऐसे में, पीसीपीएनडीटी (PCPNDT) एक्ट जैसे कड़े कानूनों के प्रवर्तन में थोड़ी सी भी ढिलाई या लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जा सकती।
सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता से हुई फैसले की शुरुआत
जस्टिस संजय करोल द्वारा लिखे गए इस ऐतिहासिक फैसले की शुरुआत मशहूर कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की प्रसिद्ध कविता ‘बालिका का परिचय’ की पंक्तियों से हुई, जो एक बेटी के जन्म पर मां के उल्लास और गौरव को दर्शाती है। सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की, PCPNDT एक्ट का मुख्य उद्देश्य यही सुनिश्चित करना है कि देश की हर मां बिना किसी सामाजिक या पारिवारिक दबाव के अपनी बेटी के जन्म पर उस असीम खुशी और आनंद को महसूस कर सके।
आंकड़ों का आईना: ‘सुधार तो हुआ, पर मंजिल अभी दूर है’
अदालत ने देश के लिंगानुपात से जुड़े सरकारी आंकड़ों और नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) की रिपोर्ट का बारीकी से विश्लेषण किया और बताया कि देश में कागजी तरक्की के बावजूद जमीनी हकीकत में असमानता क्यों है।
जन्म के समय लिंगानुपात कम: कोर्ट ने नोट किया कि NFHS-4 (2015-16) में देश का कुल लिंगानुपात जहां प्रति 1,000 पुरुषों पर 991 महिलाएं था, वह NFHS-5 (2019-21) में सुधरकर 1,020 महिलाएं जरूर हो गया है। लेकिन, जन्म के समय का लिंगानुपात (Sex Ratio at Birth) आज भी प्रति 1,000 लड़कों पर मात्र 929 लड़कियां ही है, जो चिंताजनक है।
वैश्विक स्तर पर गिरावट: सुप्रीम कोर्ट ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की स्थिति को रेखांकित करते हुए कहा, “वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2025 में लैंगिक समानता के मामले में भारत की रैंकिंग पिछले वर्ष के 129वें स्थान से गिरकर 148 देशों में से 131वें स्थान पर आ गई है।”
दिखावटी सुधार: 1991 में बाल लिंगानुपात (Child Sex Ratio) 94 था, जो 2011 में घटकर 919 रह गया था। हाल के वर्षों में जो थोड़ा बहुत सुधार दिखा है, वह केवल आंशिक सुधार है, पूर्ण समानता और समाज में बेटियों की स्वीकार्यता का मार्ग अभी भी अधूरा है।
मामला क्या था? (‘फॉर्म-एफ’ की गड़बड़ी को डॉक्टर ने बताया ‘तकनीकी चूक’)
जांच में पकड़ी गई चोरी: यह पूरा कानूनी विवाद सोलापुर (महाराष्ट्र) के एक सोनोग्राफी सेंटर से शुरू हुआ था। स्वास्थ्य अधिकारियों ने जब डॉक्टर रमेश के सोनोग्राफी सेंटर का औचक निरीक्षण किया, तो वहां रिकॉर्ड्स के रखरखाव में भारी गड़बड़ियां पाई गईं। विशेषकर ‘फॉर्म-एफ’ (Form F) जिसमें गर्भवती महिला का पूरा मेडिकल विवरण और सोनोग्राफी का कारण दर्ज करना अनिवार्य होता है, उसमें गंभीर विसंगतियां मिलीं।
निचली अदालतों से लगा झटका: प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट (JMFC) ने डॉक्टर के खिलाफ अपराध का संज्ञान (Cognizance) लिया। डॉक्टर ने इसे रिविजनल कोर्ट और फिर बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन दोनों अदालतों ने उनकी अर्जी खारिज कर दी। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
डॉक्टर के तर्क: सुप्रीम कोर्ट में डॉक्टर के वकील राजीव शंकर द्विवेदी ने दलील दी कि कार्रवाई करने वाले जिला सिविल सर्जन इसके लिए सक्षम प्राधिकारी नहीं थे और फॉर्म-एफ में जो भी कमियां थीं, वे केवल मामूली ‘तकनीकी और अनजाने में हुई चूक’ (Technical and Inadvertent Errors) थीं, जिसके लिए आपराधिक केस नहीं चलना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा फैसला: ‘फॉर्म-एफ’ की अनदेखी मतलब कानून की हत्या
सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टर के तमाम तर्कों को खारिज करते हुए अपने ही पुराने ऐतिहासिक फैसले (फेडरेशन ऑफ ऑब्सटेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजिकल सोसाइटीज ऑफ इंडिया बनाम भारत संघ) का हवाला दिया और साफ किया।
फॉर्म-एफ कोई साधारण कागज नहीं: कोर्ट ने कहा कि पीसीपीएनडीटी एक्ट के तहत फॉर्म-एफ का रखरखाव ही इस कानून की आत्मा है। इसके जरिए ही यह ट्रैक किया जाता है कि कहीं सोनोग्राफी का दुरुपयोग लिंग जांच के लिए तो नहीं हो रहा। इस रिकॉर्ड में गड़बड़ी को महज ‘तकनीकी चूक’ कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
कानून को कमजोर नहीं कर सकते: भले ही ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ और ‘जननी सुरक्षा योजना’ जैसी कल्याणकारी योजनाओं से समाज में कुछ बदलाव आ रहा है, लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि हम कानून के प्रावधानों को हल्का (Dilute) होने दें या डॉक्टरों की ऐसी लापरवाहियों को अनदेखा करें।
अदालत ने कड़े शब्दों में कहा: यह स्थिति साफ तौर पर दर्शाती है कि समाज में आज भी बेटे को प्राथमिकता देने की पितृसत्तात्मक सोच गहरी जमी हुई है। हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों ने कड़े नियमों के दम पर सुधार दिखाया है, लेकिन कई राज्यों में जन्म के समय लिंगानुपात राष्ट्रीय औसत से बहुत नीचे है।
विश्लेषण: PCPNDT एक्ट, 1994 और सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस
यह फैसला देश के उन सभी रेडियोलॉजिस्ट और सोनोग्राफी केंद्रों के लिए एक बड़ी चेतावनी है जो रिकॉर्ड्स को गंभीरता से नहीं लेते हैं।
| कानूनी और तकनीकी पहलू | सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था और टिप्पणी |
| सख्त प्रवर्तन (Strict Enforcement) | जब तक महिलाओं के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण में मौलिक बदलाव नहीं आता, तब तक ऐसे सुरक्षात्मक और कल्याणकारी कानूनों का पूरी सख्ती से लागू रहना अनिवार्य है। |
| समानता का अधिकार | कोर्ट ने कहा कि जब देश में सच्ची समानता का उदय होगा, तब समाज को यह अहसास होगा कि ऐसे कानूनों की जरूरत ही नहीं है। तब तक कानून का हंटर चलता रहेगा। |
| अपील खारिज | सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए डॉक्टर के खिलाफ आपराधिक मुकदमे को जारी रखने का आदेश दिया। |

