Thursday, July 2, 2026
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Delhi HC: पति-पत्नी के रिश्ते में कोई डाले दरार… तीसरे व्यक्ति पर करें “Alienation of Affection” का केस…यह है तरीका

Delhi HC: दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा, यदि कोई तीसरा व्यक्ति जानबूझकर और गलत तरीके से किसी विवाह में हस्तक्षेप कर पति-पत्नी के रिश्ते में दरार डालता है, तो पीड़ित जीवनसाथी उस व्यक्ति पर हर्जाने का दावा कर सकता है।

यह कहा हाईकोर्ट ने

अदालत ने इस नए कानूनी सिद्धांत को “Alienation of Affection” (स्नेह से वंचित करना) के रूप में स्वीकार किया है। ऐसा दावा सिविल कोर्ट में दायर किया जा सकता है, न कि फैमिली कोर्ट में। इसमें पीड़ित को यह साबित करना होगा कि प्रतिवादी ने जानबूझकर और गलत आचरण किया, उसके कारण वैवाहिक संबंध प्रभावित हुआ, और उसे वास्तविक नुकसान हुआ जिसकी भरपाई पैसों से आंकी जा सकती है। अदालत ने कहा कि पति/पत्नी को वैवाहिक संगति, निकटता और साथ का अधिकार है, और किसी तीसरे व्यक्ति को इसमें गलत हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है।

यह है मामले की पृष्ठभूमि

एक विवाहित महिला ने अपने पति और उसकी प्रेमिका के खिलाफ हाईकोर्ट में सिविल सूट दायर किया। महिला का आरोप था कि दूसरी महिला ने जानबूझकर उसके वैवाहिक रिश्ते में दखल दिया, जिससे उसका पति उससे दूर हो गया और सार्वजनिक तौर पर उसे अपमानित करने लगा। इसके बाद पति ने तलाक का केस भी दायर किया।

प्रतिवादियों की आपत्तियां

पति और उसकी प्रेमिका ने कहा कि यह विवाद वैवाहिक संबंध से जुड़ा है और फैमिली कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आता है। उन्होंने यह भी दलील दी कि तलाक का मामला पहले से लंबित है। लेकिन हाईकोर्ट ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया और कहा कि यह मामला स्वतंत्र सिविल चोट (civil injury) का है, इसलिए सिविल कोर्ट में चल सकता है।

अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणियां

  • भारतीय कानून में “Alienation of Affection” को अभी तक औपचारिक रूप से मान्यता नहीं मिली है, लेकिन न्यायालयों ने इसे संभावित टॉर्ट (tort) के रूप में स्वीकार किया है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने Joseph Shine मामले में व्यभिचार (adultery) को अपराध से बाहर कर दिया था, परंतु यह अब भी सिविल दायित्व का आधार हो सकता है।
  • अदालत ने स्पष्ट किया कि फैमिली कोर्ट्स एक्ट की धारा 7(d) यहां लागू नहीं होती, क्योंकि यह मुकदमा वैवाहिक विवाद नहीं बल्कि तृतीय पक्ष द्वारा टॉर्टियस इंटरफेरेंस का मामला है।
  • अदालत ने कहा कि सोशल/कानूनी रूप से यह नया कदम है और भले ही शादी वापस न हो पाए, पीड़ित पक्ष को क्षतिपूर्ति का अधिकार है।
  • यह फैसला भारतीय न्यायशास्त्र में पहली बार “Alienation of Affection” को व्यवहारिक मुकदमेबाजी के स्तर पर सामने लाता है।

HIGH COURT OF DELHI
CS(OS) 602/2025 & I.A. 21712-21714/2025
SHELLY MAHAJAN versus MS BHANUSHREE BAHL & ANR.

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