Disabled Teacher: कर्नाटक हाई कोर्ट ने अपने छात्र की जान बचाने के लिए खुद को जोखिम में डालने वाली एक साहसी शिक्षिका के पक्ष में एक ऐतिहासिक और दूरगामी विधिक फैसला सुनाया है।
राज्य दिव्यांगजन आयुक्त के ₹10 लाख मुआवजा देने के आदेश को चुनौती
हाई कोर्ट के जस्टिस सूरज गोविंदराज की एकल पीठ ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए न केवल शिक्षिका की ससम्मान बहाली का आदेश दिया, बल्कि कर्नाटक के सभी सार्वजनिक व निजी भवनों, शैक्षणिक संस्थानों, मॉल्स, अस्पतालों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए एक व्यापक एसओपी (Standard Operating Procedure – मानक संचालन प्रक्रिया) भी जारी की है, ताकि सार्वभौमिक सुगमता (Universal Accessibility) को सुनिश्चित किया जा सके। अदालत ने एक निजी अनएडेड स्कूल (Private Unaided School) की उस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें उसने राज्य दिव्यांगजन आयुक्त के ₹10 लाख मुआवजा देने के आदेश को चुनौती दी थी।
यह रही अदालत की टिप्पणी
अदालत ने स्कूल की संकीर्ण मानसिकता पर करारा प्रहार करते हुए बेहद मानवीय और विधिक टिप्पणी की और कहा, शिक्षिका की दिव्यांगता कोई समस्या नहीं है। व्हीलचेयर के अनुकूल क्लासरूम का न होना, दिव्यांग-अनुकूल शौचालय का अभाव, सुलभ परिवहन की कमी और स्कूल द्वारा अपनी समय-सारणी (Timetable) में बदलाव करने की अनिच्छा—ये समाज द्वारा निर्मित वो बाधाएं हैं जो उन्हें दोबारा शिक्षण कार्य शुरू करने से रोकती हैं। ये बाधाएं स्कूल द्वारा ‘उचित समायोजन’ (Reasonable Accommodation) करने में विफलता के कारण पैदा हुई हैं, न कि उनकी दिव्यांगता के कारण।
घटना की पृष्ठभूमि: छात्र को बचाते हुए 90% दिव्यांग हुईं शिक्षिका (2013)
यह पूरा मामला बेंगलुरु के एक नामी सीबीएसई स्कूल ‘पीएसबीबी लर्निंग लीडरशिप एकेडमी’ (PSBB Learning Leadership Academy) का है।
अदम्य साहस की मिसाल: साल 2013 में, स्कूल की तत्कालीन शिक्षिका मिस बरनाली राउत ने अपनी जान की परवाह न करते हुए कक्षा ६ के एक छात्र को स्कूल की इमारत से नीचे कूदने से बचाया था। छात्र को सुरक्षित बचाने के इस निस्वार्थ प्रयास में वे गंभीर रूप से चोटिल हो गईं, जिसके कारण वे 90% लोकोमोटर दिव्यांगता (चलायमान अक्षमता) का शिकार हो गईं।
संस्थान की संवेदनहीनता: दुर्घटना के बाद स्कूल ने उन्हें 21 महीने का वेतन तो दिया, लेकिन साल 2015 में उन्हें शिक्षिका के पद से हटाकर कम वेतनमान (Reduced Salary) पर एक प्रशासनिक (Administrative) पद की पेशकश की। शिक्षिका ने इस पदावनति (Demotion) को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, जिसके बाद स्कूल ने उनकी सेवाएं समाप्त मान लीं।
कोर्ट रूम एनालिसिस: ‘सहानुभूति नहीं, कानून के तहत निजी संस्थान भी बाध्य’
सुनवाई के दौरान स्कूल के वरिष्ठ वकील बी.के. संपत ने ‘डैल्को इंजीनियरिंग प्राइवेट लिमिटेड बनाम भारत संघ (2007)’ मामले का हवाला देते हुए दलील दी कि एक निजी, गैर-सहायता प्राप्त स्कूल से दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत ‘उचित समायोजन’ (दिव्यांगों के अनुकूल बुनियादी ढांचा देना) प्रदान करने की उम्मीद नहीं की जा सकती।
जस्टिस सूरज गोविंदराज ने स्कूल के सभी तर्कों को विधिक रूप से किया खारिज
2016 का कानून निजी क्षेत्र पर भी लागू: कोर्ट ने साफ किया कि ‘डैल्को इंजीनियरिंग’ का फैसला 1995 के पुराने कानून पर आधारित था, जो अब निरस्त हो चुका है। 2016 के नए अधिनियम की धारा 2(i) और 2(v) के तहत ‘प्रतिष्ठान’ (Establishment) की परिभाषा में सरकारी और निजी (कंपनी, फर्म, संस्था, संगठन) दोनों शामिल हैं। इसलिए यह स्कूल पूरी तरह इस कानून के दायरे में आता है।
भेदभाव की सार्वभौमिक मनाही: अधिनियम की धारा 3(3) स्पष्ट करती है कि किसी भी दिव्यांग व्यक्ति के साथ दिव्यांगता के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता। यह नियम सार्वभौमिक है और निजी व सरकारी दोनों संस्थाओं पर समान रूप से बाध्यकारी है।
रूढ़िवादिता पर प्रहार: अदालत ने कहा कि दुनिया भर में दिव्यांग शिक्षक उचित विधिक व ढांचागत सहायता के साथ बेहतरीन शिक्षण कार्य कर रहे हैं। स्कूल का यह मान लेना कि दिव्यांगता के कारण वे उच्च स्तर पर पढ़ा नहीं सकतीं, खुद में एक रूढ़िवादी सोच (Stereotyping) है जिसे यह कानून खत्म करना चाहता है।
विश्लेषण: कर्नाटक हाई कोर्ट का अंतिम विधिक आदेश मैट्रिक्स
हाई कोर्ट ने माना कि शिक्षिका का इलाज का खर्च ₹46 लाख से अधिक हो चुका है, ऐसे में आयुक्त द्वारा तय किया गया ₹10 लाख का मुआवजा बेहद रूढ़िवादी और तार्किक है।
| विधिक/प्रशासनिक बिंदु | कर्नाटक हाई कोर्ट का अंतिम विधिक निर्देश |
| मुआवजे की राशि | स्कूल को ₹10,000,00,000 (10 लाख रुपये) का भुगतान 3 महीने के भीतर भविष्य के इलाज के खर्च के रूप में मिस बरनाली राउत को करना होगा। |
| नौकरी में ससम्मान बहाली | यदि शिक्षिका वापस आना चाहती हैं, तो उन्हें उनकी मूल नियुक्ति तिथि से वरिष्ठता (Seniority) के साथ बहाल किया जाएगा (हालांकि अनुपस्थिति की अवधि का पिछला वेतन नहीं मिलेगा)। |
| उचित समायोजन (Reasonable Accommodation) | स्कूल को शिक्षिका के लिए ग्राउंड फ्लोर पर क्लासरूम, दिव्यांग-अनुकूल टॉयलेट, ₹15,000 प्रति माह का परिवहन भत्ता, लचीला समय (Flexible Timings) और ऑनलाइन टीचिंग का विकल्प देना होगा। |
| समान अवसर नीति (Equal Opportunity Policy) | स्कूल ने धारा 21 और नियम 8 (जिसमें 20 से अधिक कर्मचारियों वाले निजी संस्थान शामिल हैं) का उल्लंघन किया है। अब स्कूल को बकायदा ‘इक्वल अपॉर्चुनिटी पॉलिसी’ बनानी और रजिस्टर करनी होगी। |
| दिव्यांगता आयुक्त का अधिकार क्षेत्र | कोर्ट ने साफ किया कि २०१६ के कानून की धारा 82(2) के तहत आयुक्त की कार्यवाही ‘न्यायिक कार्यवाही’ है और आयुक्त को निजी संस्थानों के खिलाफ भी बाध्यकारी सुधारात्मक निर्देश (Binding Directions) जारी करने का पूर्ण सिविल कोर्ट अधिकार है। |
पूरे राज्य के लिए ‘यूनिवर्सल एक्सेसिबिलिटी’ एसओपी (SOP)
जस्टिस गोविंदराज ने इस मामले को व्यक्तिगत राहत से आगे बढ़ाते हुए इसे एक संवैधानिक अधिकार माना। कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 19 (स्वतंत्रता) और 21 (जीने का अधिकार) के तहत दिव्यांगों के लिए ‘सुगमता’ (Accessibility) एक मौलिक अधिकार है।
अदालत से जारी विस्तृत राज्यव्यापी एसओपी
- कर्नाटक के सभी सरकारी और निजी भवनों (स्कूल, कॉलेज, मॉल्स, अस्पताल, बस व रेलवे स्टेशन) को दिव्यांगों के अनुकूल (हार्मोनलाइज्ड गाइडलाइंस, 2021 के तहत) बनाना अनिवार्य होगा।
- सभी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और वेबसाइट्स को भी दिव्यांगों के लिए सुलभ बनाना होगा।
- तय समय-सीमा के भीतर ऐसा न करने वाले संस्थानों पर भारी जुर्माना और दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।

