Contractual Claims: दिल्ली हाईकोर्ट ने सड़क दुर्घटना दावों के विधिक दायरे को स्पष्ट करते हुए महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है।
पीड़ित मां के बेटे की हिट एंड रन हादसे में मौत हो गई थी
हाईकोर्ट जस्टिस अनीश दयाल की एकल पीठ ने अपने फैसले में एक पीड़ित मां की अपील को खारिज कर दिया, जिसके बेटे की मौत एक हिट एंड रन (Hit and Run) हादसे में हो गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि MACT के अधिकार क्षेत्र को अतार्किक सीमा तक विस्तारित नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा, मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल (MACT) का गठन एक विशेष कानून (मोटर वाहन अधिनियम) के तहत सड़क हादसों में पीड़ितों को मुआवजा दिलाने के लिए किया गया है। इसके अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) को इतना नहीं खींचा जा सकता कि यह पर्सनल इंश्योरेंस पॉलिसी के तहत मिलने वाले संविदात्मक दावों (Contractual Disputes) का निपटारा करने लगे। यदि किसी दुर्घटना में दोषी वाहन का पता नहीं चल पाता है और मामला विशुद्ध रूप से खुद की बीमा पॉलिसी (Personal Cover) की शर्तों पर आ जाता है, तो पीड़ित पक्ष को MACT के बजाय उपभोक्ता फोरम (Consumer Forum) या सक्षम सिविल कोर्ट का रुख करना होगा।
मामला क्या है?: ‘हिट एंड रन’ हादसा, अज्ञात ट्रक और पिता की कार का क्लेम
हादसा और अज्ञात वाहन: यह कानूनी विवाद साल 2022 में हुई एक दुखद सड़क दुर्घटना से उपजा है। एक युवक अपने पिता की इनोवा (Innova) कार मांगकर चला रहा था, तभी एक अज्ञात ट्रक ने उसकी कार को टक्कर मार दी। इस हादसे में युवक की मौत हो गई। चूंकि यह ‘हिट एंड रन’ का मामला था, इसलिए टक्कर मारने वाले ट्रक या उसके ड्राइवर/मालिक का कभी पता नहीं चल सका।
बीमा कंपनी से मुआवजे की मांग: चूंकि दोषी ट्रक का पता नहीं था, इसलिए मृतक की मां ने खुद अपने पति (कार के मालिक) और उस इनोवा कार की इंश्योरेंस कंपनी को प्रतिवादी बनाते हुए MACT में मुआवजे के लिए धारा 166 के तहत याचिका दायर की।
दावे का आधार: मां का तर्क था कि चूंकि उसका बेटा कार का मालिक नहीं था (उसने पिता से कार उधार ली थी), इसलिए उसे कार का एक यात्री या ‘थर्ड पार्टी’ (तीसरा पक्ष) माना जाना चाहिए, जो कार की व्यापक/पैकेज पॉलिसी (Comprehensive Policy) के तहत कवर था।
MACT और इंश्योरेंस कंपनी का रुख: बीमा कंपनी ने स्पष्ट किया कि पॉलिसी एक पैकेज पॉलिसी थी, जिसमें बेसिक थर्ड-पार्टी लायबिलिटी के अलावा मालिक-ड्राइवर के लिए पर्सनल एक्सीडेंट कवर और 7 यात्रियों के लिए अतिरिक्त एक्सीडेंट कवर शामिल था। ट्रिब्यूनल (MACT) द्वारा दावा खारिज किए जाने के बाद मां ने हाई कोर्ट में अपील की थी।
हाई कोर्ट का रुख: “लापरवाही साबित होना अनिवार्य, संविदात्मक विवाद ट्रिब्यूनल के दायरे से बाहर”
जस्टिस अनीश दयाल ने मामले के कानूनी पहलुओं और कोर्ट की सहायता के लिए नियुक्त एमिकस क्यूरी (Amicus Curiae) डॉ. अमित जॉर्ज की दलीलों पर विचार करते हुए मार्गदर्शक विधिक सिद्धांत तय किए।
थर्ड पार्टी क्लेम के लिए ‘लापरवाही’ (Negligence) साबित करना जरूरी
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मोटर वाहन अधिनियम की धारा 166 के तहत मुआवजे का दावा पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि दुर्घटना सामने वाले (दोषी) वाहन के ड्राइवर की लापरवाही के कारण हुई थी। कोर्ट ने कहा, तीसरे पक्ष (Third Party) द्वारा किया गया दावा अनिवार्य रूप से दोषी वाहन के चालक की लापरवाही के प्रमाण से जुड़ा होता है। यदि वह कारण और लापरवाही साबित नहीं होती है, तो टॉर्ट (अपकृत्य कानून) के तहत मुआवजा पाने की कड़ी टूट जाती है। बीमा कवर तभी सक्रिय होता है जब बीमित व्यक्ति की किसी तीसरे पक्ष के प्रति कानूनी देनदारी (Liability) बनती हो।
मामला टॉर्ट (Tort) से हटकर कांट्रैक्ट (Contract) के दायरे में आया
चूंकि इस मामले में टक्कर मारने वाला ट्रक अज्ञात था, इसलिए यह केस दुर्घटना कानून (Law of Torts) के दायरे से बाहर हो गया। अब यह विवाद विशुद्ध रूप से इस बात पर आ गया कि कार की पर्सनल इंश्योरेंस पॉलिसी के नियम और शर्तें (Terms & Conditions) क्या कहती हैं और उसके तहत कितना पैसा मिलना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि MACT एक वैधानिक निकाय (Creature of Statute) है और उसके पास बीमा कंपनियों के संविदात्मक वादों की व्याख्या करने का अधिकार नहीं है।
ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र को ‘अतार्किक सीमा’ तक नहीं खींचा जा सकता
अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि MACT जैसे विशेष ट्रिब्यूनल का एक विशिष्ट वैधानिक दायरा है। सभी प्रकार के दावों को इसमें जबरन शामिल करने के लिए कानून को मरोड़ा या तोड़ा (Twisted and Contorted) नहीं जा सकता। कोर्ट ने एमिकस क्यूरी की इस दलील से सहमति जताई कि ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र को जरूरत से ज्यादा फैलाने से पीड़ितों को तेजी से मुआवजा बांटने की इसकी मूल क्षमता कमजोर होगी।
अदालत का अंतिम आदेश
दिल्ली हाई कोर्ट ने मृत युवक की मां की अपील को खारिज (Dismiss) कर दिया। हालांकि, अदालत ने मां को निराश न करते हुए एक वैकल्पिक कानूनी रास्ता सुझाया। कोर्ट ने मां को सुझाव दिया कि वह इंश्योरेंस पॉलिसी की बारीकियों के अनुसार सीधे बीमा कंपनी के सामने अपना पर्सनल क्लेम सेटल करने की प्रक्रिया शुरू करें। कोर्ट ने यह स्पष्ट छूट दी कि यदि बीमा कंपनी उनके इस दावे को खारिज कर देती है, तो मां के पास उपभोक्ता फोरम (Consumer Forum) या किसी अन्य सक्षम सिविल फोरम में जाने का पूरा अधिकार सुरक्षित है।
केस मैट्रिक्स: दिल्ली हाई कोर्ट का आदेश (जुलाई 2026)
| विधिक और प्रशासनिक श्रेणियां | दिल्ली उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court), नई दिल्ली |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस अनीश दयाल (एकल पीठ) |
| अपीलकर्ता | मृतक की माता |
| संबंधित मूल कानून | मोटर वाहन अधिनियम (Motor Vehicles Act) – धारा 166 |
| विवाद का मुख्य विषय | क्या अज्ञात वाहन के मामले में पर्सनल पॉलिसी का विवाद MACT सुन सकता है? |
| न्यायालय का विधिक निष्कर्ष | नहीं, पॉलिसी की शर्तों का विवाद संविदात्मक (Contractual) है, जो MACT के दायरे से बाहर है। |
| अदालत का अंतिम निर्णय | अपील खारिज; उपभोक्ता फोरम (Consumer Forum) जाने की स्वतंत्रता दी गई। |

