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मामले की पृष्ठभूमि और साइबर सुरक्षा एडवाइजरी
- फिशिंग और क्लोन वेबसाइटों का बढ़ता खतरा:सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री ने बताया कि यह नई चेतावनी 16 जुलाई 2025, 28 अप्रैल 2026 और 13 अगस्त 2026 को जारी की गई पिछली चेतावनियों के निरंतरता में है। फर्जी वेबसाइटों के माध्यम से आम जनता, अधिवक्ताओं और मुकदमों से जुड़े पक्षों को निशाना बनाकर उनकी गोपनीय जानकारी मांगने के प्रयास किए जा रहे हैं।
- आधिकारिक यूआरएल की पहचान:रजिस्ट्री ने दोहराया कि भारत का सर्वोच्च न्यायालय केवल
sci.gov.inडोमेन का पंजीकृत उपयोगकर्ता है। किसी भी अन्य डोमेन नाम (जैसे.comया अतिरिक्त शब्दों के साथ बने लिंक) पर विश्वास न करने का आग्रह किया गया है। - साइबर सुरक्षा उपाय:एडवाइजरी में कहा गया है कि यदि किसी व्यक्ति को यह संदेह होता है कि उसने गलती से इस फर्जी वेबसाइट पर अपनी जानकारी दर्ज कर दी है या उसका डेटा हैक हुआ है, तो उसे तुरंत अपने सभी वित्तीय व व्यक्तिगत ऑनलाइन खातों के पासवर्ड बदल लेने चाहिए और बिना किसी देरी के अपने बैंक को अनधिकृत पहुंच की सूचना देनी चाहिए।
मुख्य विधिक व साइबर सुरक्षा बिंदु
1. संस्थागत विश्वसनीयता का संरक्षण:
सुप्रीम कोर्ट द्वारा बार-बार जारी सार्वजनिक नोटिस यह दर्शाते हैं कि न्यायिक प्रणाली के नाम पर धोखाधड़ी करने वाले साइबर अपराधियों से निपटने और वादियों को सुरक्षित रखने के लिए कड़े कदम उठाए जा रहे हैं।
2. डिजिटल साक्षरता और सतर्कता:
सर्वोच्च न्यायालय ने मुकदमों की ऑनलाइन ट्रैकिंग, कोर्ट फीस भुगतान या केस फाइलिंग के दौरान उपयोगकर्ताओं को केवल प्रामाणिक सरकारी डोमेन (.gov.in) का ही प्रयोग करने की सख्त हिदायत दी है।
नई दिल्ली: सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act, 2000) की धारा 66C (पहचान की चोरी / Identity Theft), धारा 66D (कंप्यूटर संसाधन का उपयोग कर प्रतिरूपण द्वारा धोखाधड़ी / Cheating by Personation), भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 318 व 319 (धोखाधड़ी व प्रतिरूपण), तथा सर्वोच्च न्यायालय की डिजिटल संपत्तियों व न्याय चाहने वाले नागरिकों के साइबर संरक्षण पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय की रजिस्ट्री ने एक अत्यंत गंभीर और आपातकालीन सार्वजनिक विधिक परामर्श (Public Advisory / Notice) जारी किया है।
सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री ने वादियों, वकीलों, न्यायिक हितधारकों और आम जनता को सतर्क करते हुए एक नव-पहचाने गए दुर्भावनापूर्ण व धोखाधड़ी वाले डोमेन—scigovinjudicial.com—के प्रति आगाह किया है। यह डोमेन भारत के सर्वोच्च न्यायालय के आधिकारिक वेब पोर्टल की हुबहू नकल (Clone / Impersonation) कर लक्षित फिशिंग तंत्र (Targeted Phishing Mechanisms) के जरिए लोगों से गोपनीय साख (Credentials), व्यक्तिगत पहचान और बैंक खातों के वित्तीय विवरण चुराने के आपराधिक उद्देश्य से संचालित किया जा रहा है।
रजिस्ट्री ने स्पष्ट किया कि यह चेतावनी पूर्व में 16 जुलाई 2025, 28 अप्रैल 2026 और 13 अगस्त 2026 को जारी की गई सार्वजनिक चेतावनियों के सिलसिले में जारी की गई है। रजिस्ट्री ने स्पष्ट दोहराया है कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय का एकमात्र आधिकारिक और पंजीकृत डोमेन sci.gov.in है।
सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री के सार्वजनिक नोटिस के मुख्य निर्देश एवं सुरक्षा मानक
1. ‘scigovinjudicial.com’ के माध्यम से डेटा चोरी और फिशिंग का गंभीर जोखिम:
सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री द्वारा जारी आधिकारिक नोटिस में साइबर अपराधियों के तौर-तरीकों को उजागर करते हुए कहा गया: “रजिस्ट्री इसके द्वारा सभी हितधारकों को एक नव-पहचाने गए फर्जी डोमेन, scigovinjudicial.com के प्रति कड़ाई से आगाह करती है, जो वर्तमान में इस न्यायालय की आधिकारिक ऑनलाइन उपस्थिति का प्रतिरूपण (Impersonating the official online presence) कर रहा है। साइबर अपराधी उक्त लिंक के माध्यम से आम जनता और वादियों के संवेदनशील व्यक्तिगत डेटा और गोपनीय क्रेडेंशियल्स को मांगने या चुराने का प्रयास कर सकते हैं। सभी हितधारकों को किसी भी प्रकार की व्यक्तिगत या वित्तीय जानकारी साझा न करने की सख्त सलाह दी जाती है, क्योंकि इस प्रकार का प्रकटीकरण इन अपराधियों द्वारा डेटा चोरी (Theft of data) को सुगम बना सकता है।”
2. ‘Hover-over’ तकनीक द्वारा URL का सत्यापन और एकमात्र वैध डोमेन sci.gov.in:
- रजिस्ट्री ने इलेक्ट्रॉनिक संचार की प्रामाणिकता जांचने के लिए विधिक व तकनीकी दिशानिर्देश दिए:
- सर्वोच्च न्यायालय केवल और केवल
sci.gov.inडोमेन का पंजीकृत उपयोगकर्ता है। - किसी भी लिंक पर क्लिक करने से पूर्व कर्सर को लिंक के ऊपर ले जाकर (Hovering over the URL) वास्तविक वेब पते की पूरी तरह पुष्टि कर लें। यदि डोमेन के अंत में
.gov.inनहीं है, तो वह फर्जी और अनधिकृत है।
- सर्वोच्च न्यायालय केवल और केवल
3. प्रभावित या संदिग्ध उपयोगकर्ताओं हेतु तत्काल उपचारात्मक कार्रवाई:
- यदि किसी नागरिक, अधिवक्ता या पक्षकार ने अनजाने में उक्त फर्जी वेबसाइट पर कोई जानकारी दर्ज कर दी है, तो उन्हें तत्काल निम्नलिखित सुरक्षा कदम उठाने का निर्देश दिया गया है:
- अपने सभी ऑनलाइन खातों, ईमेल और पोर्टल के पासवर्ड को तत्काल बदलें (Update passwords immediately)।
- अनधिकृत वित्तीय लेनदेन या अनधिकृत पहुंच की रोकथाम हेतु अपने संबंधित बैंकों को फौरन सूचित करें और खातों/कार्ड्स को फ्रीज/ब्लॉक कराएं।
- राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (
cybercrime.gov.in) या स्थानीय साइबर पुलिस स्टेशन में अविलंब प्राथमिकी दर्ज कराएं।
तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2025–2026)
| संदर्भ / विवरण | विधिक एवं तथ्यात्मक स्थिति |
| जारीकर्ता निकाय | रजिस्ट्री, भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Registry, Supreme Court of India), नई दिल्ली |
| सूचना जारी होने की तिथि | 3 नवंबर 2026 (मंगलवार) |
| दस्तावेज़ का स्वरूप | आधिकारिक सार्वजनिक सुरक्षा परामर्श (Public Caution Notice / Advisory) |
| चिह्नित फर्जी/दुर्भावनापूर्ण डोमेन | scigovinjudicial.com (जो सर्वोच्च न्यायालय के आधिकारिक पोर्टल का रूप धरकर संचालित है)। |
| न्यायालय का एकमात्र वैध डोमेन | sci.gov.in (भारत सरकार के राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र – NIC द्वारा होस्टेड सुरक्षित सरकारी डोमेन)। |
| पूर्व सार्वजनिक नोटिसों की श्रृंखला | 1. 16 जुलाई 2025 2. 28 अप्रैल 2026 3. 13 अगस्त 2026 4. 3 नवंबर 2026 (वर्तमान नोटिस)। |
| साइबर अपराधियों का कार्यप्रणाली तंत्र (Modus Operandi) | शीर्ष अदालत के ई-फाइलिंग, वाद सूची (Cause List), केस स्टेटस या ऑनलाइन अदालती आदेशों के इंटरफेस की नकल तैयार कर वादियों और अधिवक्ताओं को झूठे नोटिस/मैसेज भेजना; उनसे केस शुल्क या ई-कोर्ट चालान के नाम पर बैंक विवरण, ओटीपी और संवेदनशील पासवर्ड दर्ज कराकर साइबर ठगी करना। |
| संभावित विधिक परिणाम | फर्जी डोमेन बनाने और चलाने वालों के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता (BNS) और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) के तहत संज्ञेय व गैर-जमानती धाराओं में साइबर अपराध अन्वेषण एजेंसियों द्वारा आपराधिक अभियोजन। |
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: ‘साइबर प्रतिरूपण, फिशिंग और डिजिटल न्यायपालिका का संरक्षण’
- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के सुसंगत दंडात्मक प्रावधान:
- धारा 66C (पहचान की चोरी): जो कोई कपटपूर्वक या बेईमानी से किसी अन्य व्यक्ति/संस्था के इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर, पासवर्ड या अन्य किसी विशिष्ट पहचान लक्षण का उपयोग करेगा, वह तीन वर्ष तक के कारावास और जुर्माने से दंडनीय होगा।
- धारा 66D (प्रतिरूपण द्वारा छल): जो कोई किसी कंप्यूटर संसाधन या संचार युक्ति के माध्यम से किसी का प्रतिरूपण करके छल करेगा, उसे तीन वर्ष के कारावास और ₹1,00,000 तक के जुर्माने से दंडित किया जाएगा।
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) के तहत आपराधिक दायित्व:
- धारा 318 व 319 (पूर्ववर्ती IPC 419 व 420): किसी संवैधानिक संस्था (सर्वोच्च न्यायालय) का झूठा रूप धारण कर आम जनता को अपनी संपत्ति, वित्तीय क्रेडेंशियल्स या धन अंतरित करने के लिए प्रेरित करना संज्ञेय अपराध है, जिसमें 7 वर्ष तक के कठोर कारावास का प्रावधान है।
- डिजिटल अदालतों (e-Courts) पर जन-विश्वास की सुरक्षा:
- सर्वोच्च न्यायालय की ई-कमेटी द्वारा पूरे देश में ई-फाइलिंग, वर्चुअल कोर्ट्स और ऑनलाइन सर्टिफाइड कॉपीज की व्यवस्था लागू की गई है।
- जब धोखेबाज
scigovinjudicial.comजैसे मिलते-जुलते डोमेन बनाते हैं, तो इससे न केवल भोले-भाले वादियों के साथ वित्तीय धोखाधड़ी होती है, बल्कि देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था की डिजिटल साख और जन-विश्वास पर भी गंभीर आघात पहुंचता है। इसी कारण रजिस्ट्री को बार-बार सार्वजनिक नोटिस जारी कर विधिक व सुरक्षात्मक मानक स्थापित करने पड़ रहे हैं।
विधिक विवरण एवं संदर्भ
- प्राधिकारी: रजिस्ट्री, भारत का सर्वोच्च न्यायालय, तिलक मार्ग, नई दिल्ली
- दस्तावेज़: सार्वजनिक सतर्कता परामर्श / आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति (Public Notice)
- जारी होने की तिथि: 3 नवंबर 2026
- प्रभाव: देश भर के सभी अधिवक्ताओं, वादियों, उच्च न्यायालयों, बार एसोसिएशनों और आम नागरिकों पर लागू।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक उपबंध:
- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act, 2000):
- धारा 43 — कंप्यूटर डेटा चोरी व अनाधिकृत पहुंच हेतु हर्जाना
- धारा 66C — पहचान की चोरी के लिए दंड
- धारा 66D — कंप्यूटर संसाधन का उपयोग करके प्रतिरूपण द्वारा धोखाधड़ी
- धारा 70 — संरक्षित प्रणाली (Protected Systems) की सुरक्षा
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS):
- धारा 318 — छल (Cheating)
- धारा 319 — प्रतिरूपण द्वारा छल (Cheating by Personation)
- धारा 336 व 338 — कूटरचना और कूटरचित इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख का उपयोग (Forgery of Electronic Records)
- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act, 2000):
- संबद्ध न्यायिक एवं साइबर सुरक्षा सिद्धांत:
- न्यायिक डिजिटल परिसंपत्तियों और वादियों के साइबर संरक्षण का मानक: ‘भारत के सर्वोच्च न्यायालय के आधिकारिक डिजिटल नाम और स्वरूप का दुरुपयोग कर फर्जी डोमेन बनाना कानून के शासन और नागरिकों के न्याय तक पहुंच (Access to Justice) की शुचिता पर सीधा साइबर हमला है; वादियों और वकीलों को यह विधिक व व्यावहारिक सावधानी बरतनी चाहिए कि वे किसी भी अनधिकृत निजी डोमेन (यथा
.comया.org) पर अदालती कार्यों हेतु अपनी गोपनीय जानकारी साझा न करें; आधिकारिक सरकारी न्यायिक सेवाएं केवल सुरक्षित राष्ट्रीय डोमेन (.gov.in) के माध्यम से ही संप्रभु रूप से संचालित होती हैं; तथा किसी भी संदिग्ध फिशिंग गतिविधि की स्थिति में तात्कालिक पासवर्ड नवीनीकरण और वित्तीय प्राधिकारियों को रिपोर्टिंग करना डेटा नुकसान को सीमित करने का प्राथमिक कानूनी व सुरक्षात्मक दायित्व है।’
- न्यायिक डिजिटल परिसंपत्तियों और वादियों के साइबर संरक्षण का मानक: ‘भारत के सर्वोच्च न्यायालय के आधिकारिक डिजिटल नाम और स्वरूप का दुरुपयोग कर फर्जी डोमेन बनाना कानून के शासन और नागरिकों के न्याय तक पहुंच (Access to Justice) की शुचिता पर सीधा साइबर हमला है; वादियों और वकीलों को यह विधिक व व्यावहारिक सावधानी बरतनी चाहिए कि वे किसी भी अनधिकृत निजी डोमेन (यथा
- वर्तमान स्थिति व अनुवर्ती कानूनी कदम: सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री द्वारा संबंधित मामले की सूचना कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पांस टीम (CERT-In), गृह मंत्रालय के भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) और दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल (IFSO) को दी जा रही है, ताकि फर्जी डोमेन
scigovinjudicial.comको तत्काल ब्लॉक/सस्पेंड कराया जा सके और इसे पंजीकृत करने वाले अज्ञात साइबर अपराधियों के आईपी पते व बैंक खातों को ट्रैक कर उनके विरुद्ध कठोर आपराधिक अभियोजन शुरू किया जा सके।
Fraud Website: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| जारीकर्ता संस्था | भारत के सर्वोच्च न्यायालय की रजिस्ट्री (Supreme Court Registry) |
| जारी तिथि | 03 नवंबर 2026 |
| चिह्नित फर्जी डोमेन | scigovinjudicial.com |
| आधिकारिक वेबसाइट | sci.gov.in |
| पूर्व सार्वजनिक नोटिस | 16 जुलाई 2025, 28 अप्रैल 2026, और 13 अगस्त 2026 (फिशिंग साइटों के खिलाफ पूर्व एडवाइजरी) |
| मुख्य सलाह/दिशा-निर्देश | 1. किसी भी लिंक पर क्लिक करने से पहले कर्सर ले जाकर (Hover over URL) असली वेबसाइट की पुष्टि करें। 2. धोखाधड़ी का संदेह होने पर तुरंत सभी ऑनलाइन खातों के पासवर्ड बदलें और अपने बैंक को सूचित करें। |

