Tuesday, September 8, 2026
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Dowry Death: बेटी को जन्म देने पर महिला की मौत तक जारी रहा दहेज उत्पीड़न…महिला की आत्महत्या मामले में दिए फैसले को ध्यान से पढ़िए

Dowry Death: देश में बेटियों के प्रति संकीर्ण मानसिकता और दहेज की सामाजिक बुराई पर तीखी टिप्पणी करते हुए दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट (शाहदरा जिला) ने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

महिला को बेटी (Girl Child) को जन्म देने के लिए भी लगातार ताने दिए

न्यायाधीश हरविंदर सिंह ने अपने आदेश में कहा कि कोई भी पिता अपनी बारात या बेटी की विदाई के समय अपनी बेबसी की हर तारीख याद नहीं रख सकता। कोर्ट ने आरोपियों की उस दलील को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने कहा था कि लड़की के पिता की माली हालत इतनी अच्छी नहीं थी कि वे दहेज दे सकें। अदालत ने एक महिला की आत्महत्या के मामले में उसके पति और ससुराल वालों को दहेज मृत्यु (Dowry Death) का दोषी करार दिया है। अदालत ने पाया कि शादी के बाद से लेकर मौत के कुछ दिनों पहले तक महिला को न केवल और अधिक दहेज के लिए शारीरिक व मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया, बल्कि एक बेटी (Girl Child) को जन्म देने के लिए भी लगातार ताने दिए गए और पीटा गया।

शादी से लेकर मौत तक का सफर: क्या था पूरा मामला?

2011 में हुई थी शादी: मृतका और आरोपी की शादी 10 जून 2011 को हुई थी। लड़की के पिता ने अपनी हैसियत के अनुसार शादी में भारी दहेज और उपहार दिए थे।

लगातार बढ़ती मांगें: शादी के तुरंत बाद से ही ससुराल वालों ने और पैसों की मांग शुरू कर दी। इसमें ₹50,000 की अपाचे (Apache) मोटरसाइकिल, बिजनेस के लिए ₹40,000 का लोन और दामाद की बहन के लिए ₹1 लाख की मांग शामिल थी।

बेटी पैदा होने पर जुल्म: जब महिला ने एक बच्ची को जन्म दिया, तो ससुराल वालों का उत्पीड़न और बढ़ गया। उसे लगातार प्रताड़ित किया जाने लगा।

रक्षाबंधन पर आखिरी दर्द: 18 अगस्त 2016 (रक्षाबंधन) के दिन महिला ने अपने मायके वालों को रोते हुए बताया कि उसका पति, सास और जेठ दहेज के लिए उसे बुरी तरह मारते-पीटते हैं।

21 अगस्त को मौत: 19 अगस्त 2016 को वह वापस अपने ससुराल गई और 21 अगस्त 2016 को (शादी के सात साल के भीतर) उसने ससुराल में फांसी लगाकर जान दे दी।

ससुराल पक्ष के कुतर्क और कोर्ट द्वारा उनका खंडन

बचाव पक्ष (आरोपियों) ने खुद को बचाने के लिए अदालत के सामने कई दलीलें रखीं, जिन्हें कोर्ट ने पूरी तरह अतार्किक मानते हुए खारिज कर दिया।

लोन मांगना दहेज नहीं है: आरोपियों ने तर्क दिया कि उन्होंने सिर्फ व्यापार के लिए ‘लोन’ मांगा था, जो दहेज के दायरे में नहीं आता।

कोर्ट का रुख: अदालत ने इसे खारिज करते हुए माना कि शादी के बाद ससुराल पक्ष द्वारा रुपयों या सामान का लगातार दबाव बनाना सीधे तौर पर दहेज उत्पीड़न है।

अवसाद (Depression) की थ्योरी: आरोपियों ने कहानी गढ़ी कि महिला इस बात से डिप्रेशन में थी कि उसकी बहन की शादी किसी अमीर घर में नहीं हो पाई।

कोर्ट का रुख: अदालत ने कहा कि मेडिकल साक्ष्यों (Medical Evidence) के अभाव में इस काल्पनिक डिप्रेशन थ्योरी को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

शरीर पर चोट के निशान नहीं थे: उन्होंने दलील दी कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में शरीर पर बाहरी चोट के निशान नहीं मिले, इसलिए मारपीट का दावा झूठा है।

कोर्ट का रुख: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पोस्टमार्टम में बाहरी चोट के निशान न होना, महिला के साथ हुए मानसिक उत्पीड़न, क्रूरता और शारीरिक दुर्व्यवहार की थ्योरी को खारिज नहीं कर सकता।

बेटी खोने वाले पिता के शुरुआती बयान में मामूली कमियों को नजरअंदाज किया जा सकता है’

शोक की स्थिति (State of Shock): अदालत ने पीड़ित परिवार के प्रति गहरी संवेदनशीलता दिखाते हुए एक बड़ा कानूनी सिद्धांत रेखांकित किया। कोर्ट ने कहा कि जिस पिता ने अभी-अभी अपनी जवान बेटी को खोया हो, वह स्वाभाविक रूप से गहरे सदमे में होगा। ऐसे में पुलिस को दिए गए उसके शुरुआती बयान में अगर कोई छोटी-मोटी बातें छूट जाती हैं या तारीखों का अंतर आता है, तो उसे केस की कमजोरी नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने आगे कहा, “यह घटना 6 साल के लंबे दायरे में घटी है, यह ऐसा मामला नहीं है जहां शादी के कुछ दिनों या महीनों के भीतर मौत हो गई हो कि परिवार का हर सदस्य मांग की सटीक तारीख, उसे पूरा करने की तारीख और पैसे लेने वाले का नाम उंगलियों पर याद रखे।”

विश्लेषण: आईपीसी की धारा 304 B (दहेज मृत्यु) के वैधानिक मानक

कड़कड़डूमा कोर्ट ने पाया कि यह मामला कानूनन दहेज मृत्यु के सभी पैमानों को पूरा करता है।

कानून की आवश्यकता (Section 304B)इस मामले में अदालत के निष्कर्ष
शादी के 7 साल के भीतर मौतमहिला की शादी 2011 में हुई थी और मौत 2016 में हुई (लगभग 6 साल), जो 7 साल की वैधानिक सीमा के अंदर है।
अस्वाभाविक मौत (Unnatural Death)महिला की मौत फंदे से लटकने (फांसी) के कारण हुई, जो पूरी तरह से अस्वाभाविक है।
मौत से ठीक पहले उत्पीड़न (Soon before death)मौत से महज 3 दिन पहले (रक्षाबंधन पर) महिला ने अपने परिवार को ₹50,000 की मांग और मारपीट के बारे में रोकर बताया था।
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