Saturday, August 29, 2026
HomeBNS & BNSS LawDowry Death: 90 दिनों में तय हों आरोप, फिजूल स्थगन नहीं; दहेज...

Dowry Death: 90 दिनों में तय हों आरोप, फिजूल स्थगन नहीं; दहेज हत्या और क्रूरता के मामलों में त्वरित सुनवाई के लिए 10 दिशा-निर्देश, पूरा पढ़ लें

एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतसर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठासीन पीठन्यायमूर्ति संजय करोल एवं न्यायमूर्ति ए.जी. मसीह
संबंधित धाराएंIPC धारा 304B/498A (नया BNS धारा 80/85) और दहेज प्रतिषेध अधिनियम
मामले की पृष्ठभूमि2001 में दहेज के लिए 20 वर्षीय महिला की हत्या; सुप्रीम कोर्ट तक फैसला आने में 24 साल लगे
मुख्य आदेशसमयबद्ध सुनवाई, न्यूनतम स्थगन (Adjournments), और डिजिटल मॉनिटरिंग

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने दहेज हत्या (Dowry Death) और विवाहिताओं के खिलाफ क्रूरता (Cruelty) के मामलों में त्वरित सुनवाई और प्रभावी कानूनी क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के लिए सभी अदालतों और सरकारों के लिए 10 सूत्रीय व्यापक दिशा-निर्देश जारी किए हैं [उत्तर प्रदेश राज्य बनाम अजमल बेग व अन्य]।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ए. जी. मसीह की पीठ ने 20 अगस्त के आदेश में स्पष्ट किया कि निचली अदालतों को चार्जशीट दाखिल होने के 60 से 90 दिनों के भीतर आरोप (Charges) तय करने का प्रयास करना चाहिए और मुकदमों में गैर-जरूरी स्थगन (Adjournments) पर सख्त रोक लगानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के 10 प्रमुख दिशा-निर्देश

  1. प्राथमिकता के आधार पर सुनवाई: आईपीसी की धारा 304B (दहेज हत्या) और धारा 498A (पति या ससुराल वालों द्वारा क्रूरता)—जो अब भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 80 और 85 हैं—से संबंधित मुकदमों को अदालतें यथासंभव प्राथमिकता श्रेणी में रखें।
  2. 3 वर्ष से अधिक पुराने मामलों की निगरानी: जिला न्यायपालिका उन मुकदमों की पहचान करे जो 3 साल से अधिक समय से लंबित हैं (विशेषकर आरोप तय करने या गवाही दर्ज करने के चरण में) और उनकी समय-समय पर समीक्षा करे।
  3. समयबद्ध ट्रायल (Time-Bound Trials): चार्जशीट पेश होने के 60 से 90 दिनों के भीतर आरोप तय किए जाएं। आरोप तय होने के बाद उचित अवधि में गवाही शुरू हो और यथासंभव प्रतिदिन (Day-to-day) या निरंतर आधार पर दर्ज की जाए।
  4. स्थगन पर रोक: अदालतें अनावश्यक स्थगन को हतोत्साहित करें और स्थगन देने पर कारण दर्ज करें। यदि आरोपी के वकील बिना ठोस वजह बार-बार अनुपस्थित रहते हैं, तो लीगल एड वकील या एमिकस क्यूरी (Amicus Curiae) नियुक्त किया जाए।
  5. गवाहों का कैलेंडर (Witness Calendar): आरोप तय होने के बाद महत्वपूर्ण गवाहों की गवाही के लिए एक कैलेंडर तैयार किया जाए। जांच अधिकारी समय पर समन तामील कराने और गवाहों को पेश करने के लिए जिम्मेदार होंगे।
  6. डिजिटल ट्रैकिंग व अलर्ट: उच्च न्यायालय अपने केस-मैनेजमेंट सिस्टम का उपयोग करके दहेज मामलों के चरणवार लंबित रहने की निगरानी करें और पुराने मामलों के लिए अलर्ट सिस्टम विकसित करें।
  7. हाईकोर्ट द्वारा समय-समय पर समीक्षा: उच्च न्यायालय उन पुरानी आपराधिक अपीलों, पुनरीक्षण याचिकाओं, धारा 482 CrPC / धारा 528 BNSS याचिकाओं और जमानत मामलों की नियमित समीक्षा करें जहां निचली अदालत की कार्यवाही पर रोक (Stay) लगी हुई है।
  8. विशेषज्ञ अभियोजक व प्रशिक्षण: न्यायिक अधिकारियों, पुलिसकर्मियों, अभियोजकों, संरक्षण अधिकारियों और काउंसलरों के लिए नियमित प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए जाएं। महिलाओं के खिलाफ अपराधों के लिए अनुभवी अभियोजकों को नियुक्त किया जाए।
  9. संस्थागत सहायता और जागरूकता: राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों को वन-स्टॉप सेंटर, परिवार परामर्श केंद्र, महिला हेल्प डेस्क, पीड़ित सहायता तंत्र और ऑनलाइन शिकायत प्रणाली को मजबूत करने का निर्देश दिया गया है। लैंगिक समानता और महिला अधिकारों पर व्यापक जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाएं।
  10. आवधिक अनुपालन रिपोर्ट (Compliance Reports): लंबित मुकदमों की संख्या में ठोस कमी आने तक उच्च न्यायालयों और राज्य सरकारों को नियमित रूप से अनुपालन और स्थिति रिपोर्ट दाखिल करनी होगी।

Also Read;3-Year Practice Rule:न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन बोले; 3 साल की वकालत का नियम शिथिल करने से ‘न्यायविद’ नहीं, केवल ‘कैरियरिस्ट’ पैदा होंगे…

मामले की पृष्ठभूमि: 24 साल लंबा कानूनी सफर

  • 2001 का मामला: यह मामला एक 20 वर्षीय महिला की शादी के एक साल बाद हुई दहेज हत्या से जुड़ा है, जिससे रंगीन टीवी, मोटरसाइकिल और ₹15,000 नकद की मांग को लेकर प्रताड़ित किया गया था।
  • ट्रायल कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक: ट्रायल कोर्ट ने पति अजमल बेग और सास जमीला बेग को दोषी ठहराया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2025 में हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए दोनों की सजा बहाल कर दी थी।
  • निगरानी कार्यवाही: 2001 में शुरू हुए इस मामले को अंतिम निर्णय तक पहुंचने में 24 साल लग गए। इसी अत्यधिक देरी को गंभीरता से लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पूरे देश में दहेज से जुड़े मुकदमों में तेजी लाने के लिए यह निगरानी तंत्र स्थापित किया है।
  • यह मामला वर्ष 2001 का है, जिसमें शादी के महज एक साल बाद 20 साल की महिला की टीवी, मोटरसाइकिल और ₹15,000 की मांग पूरी न होने पर हत्या कर दी गई थी। ट्रायल कोर्ट ने पति (अजमल बेग) और सास को दोषी ठहराया था, लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया।
  • दिसंबर 2025 में, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए दोषियों की सजा बहाल की। कोर्ट ने इस बात पर गहरा दुख व्यक्त किया कि एक आपराधिक मामले को अंतिम न्याय तक पहुंचने में 24 साल का लंबा समय लग गया। इसी देरी को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पूरे देश की कानूनी प्रक्रिया में सुधार के लिए यह कदम उठाया है।
  • मामले की अगली अनुपालन सुनवाई (Compliance Report) के लिए 15 अक्टूबर की तारीख तय की गई है।

अगली सुनवाई

सर्वोच्च न्यायालय ने मामले को सभी उच्च न्यायालयों और राज्य सरकारों की अनुपालन रिपोर्ट के साथ 15 अक्टूबर 2026 को सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है।

RELATED ARTICLES

Most Popular

Patna
overcast clouds
31 ° C
31 °
31 °
84 %
4.1kmh
100 %
Fri
30 °
Sat
35 °
Sun
34 °
Mon
31 °
Tue
28 °

Recent Comments