Dying Declaration: दिल्ली हाईकोर्ट ने 38 साल पुराने एक दहेज उत्पीड़न और हत्या के मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए एक ही परिवार के जीवित बचे सभी सदस्यों को बाइज्जत बरी कर दिया है।
मृत्युपूर्व बयान (Dying Declaration) पूरी तरह विश्वसनीय नहीं
हाईकोर्ट के जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर दुडेजा की खंडपीठ ने साल 2002 में निचली अदालत (Trial Court) द्वारा पूरे परिवार को सुनाई गई उम्रकैद (Life Imprisonment) की सजा के 24 साल पुराने आदेश को पूरी तरह से निरस्त (Set Aside) कर दिया। कहा, मृतका द्वारा दिए गए कथित मृत्युपूर्व बयान (Dying Declaration) पूरी तरह विश्वसनीय नहीं हैं और उनमें संदेह का तत्व मौजूद है। इसके अलावा, अभियोजन पक्ष द्वारा पेश की गई अन्य परिस्थितियां भी ऐसी कड़ियों का निर्माण नहीं करतीं जिससे यह साबित हो सके कि आरोपी संदेह से परे दोषी हैं।
मामला क्या है?: 38 साल लंबी कानूनी लड़ाई और कानूनी उतार-चढ़ाव
यह मामला दिल्ली के समयपुर बादली इलाके में 30 अक्टूबर 1988 को हुई कमलेश नाम की महिला की मौत से जुड़ा है।
घटना और शुरुआती दोषसिद्धि: कमलेश अपने ससुराल में लगभग 100% झुलस गई थी और उसी दिन अस्पताल में उसकी मौत हो गई। अभियोजन पक्ष (Prosecution) का आरोप था कि दहेज के लिए प्रताड़ित करने के बाद ससुराल वालों ने उसे आग लगा दी। लंबी सुनवाई के बाद, साल 2002 में ट्रायल कोर्ट ने मृतका के पति, सास, जेठ और दो ननदों सहित कुल 5 लोगों को आईपीसी की धारा 302 (हत्या) और 498A (क्रूरता) के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
अपील के दौरान दो मुख्य आरोपियों की मौत: इस फैसले के खिलाफ परिवार ने हाई कोर्ट में अपील दायर की। सुनवाई के लंबे दौर के बीच, मुख्य आरोपी यानी मृतका के पति (राज पाल) और उसकी सास (फूलवती) की मृत्यु हो गई, जिसके कारण उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही स्वतः समाप्त (Abate) हो गई।
जीवित बचे तीन सदस्यों की रिहाई: कोर्ट ने अब परिवार के बाकी बचे तीन सदस्यों जेठ (जसवंत) और दो ननदों (सुरेश और धनपति) की दोषसिद्धि को रद्द कर उन्हें बरी कर दिया है।
हाई कोर्ट का रुख: क्यों संदेहास्पद माने गए मृतका के बयान?
दिल्ली हाई कोर्ट ने इस मामले को पलटते हुए विधिक साक्ष्यों (Legal Evidence) में मौजूद दो बेहद गंभीर खामियों को उजागर किया:
मृत्युपूर्व बयानों (Dying Declarations) में भारी विरोधाभास
आमतौर पर कानून में मरने वाले व्यक्ति के आखिरी बयान को बहुत पुख्ता सबूत माना जाता है, लेकिन इस केस में मृतका के बयानों में भारी विसंगतियां (Inconsistencies) थीं। अस्पताल के सबसे पहले मेडिकल रिकॉर्ड (MLC) में दर्ज था कि महिला खाना बनाते समय (Accidentally) झुलस गई थी। इसके बाद, सब-डिवीजनल मजिस्ट्रेट (SDM) और एक रिश्तेदार के सामने दिए गए बयानों में उसने अचानक ससुराल वालों पर आग लगाने का आरोप मढ़ दिया। कोर्ट ने माना कि ऐसे परस्पर विरोधी बयानों पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं किया जा सकता।
मृतका के खुद के माता-पिता ने नहीं दिया साथ
इस मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह रहा कि मृतका कमलेश के अपने माता-पिता ने ही अभियोजन (पुलिस) के दावों का समर्थन नहीं किया। लड़की के माता-पिता ने अदालत में गवाही दी कि उनकी बेटी ने कभी भी अपने ससुराल वालों की शिकायत नहीं की थी और न ही उनसे कभी कोई दहेज (Dowry Demand) मांगा गया था। अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि जब लड़की के माता-पिता खुद दहेज उत्पीड़न से इनकार कर रहे हैं और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ी अधूरी है, तो आरोपियों को दोषी नहीं रखा जा सकता।
केस मैट्रिक्स: दिल्ली हाई कोर्ट का आदेश (जुलाई 2026)
| विधिक और प्रशासनिक श्रेणियां | दिल्ली उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय, नई दिल्ली |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर दुडेजा (खंडपीठ) |
| केस संदर्भ | अपीलकर्ता बनाम राज्य (1988 का मूल मामला, 2002 की दोषसिद्धि) |
| बरी हुए आरोपी | जेठ जसवंत, ननद सुरेश और धनपति (पति व सास की मौत हो चुकी है) |
| मुख्य विधिक खामी | मृत्युपूर्व बयानों में अंतर्विरोध और मृतका के माता-पिता द्वारा दहेज के आरोपों को नकारना। |
| बचाव पक्ष के वकील | एडवोकेट नवीन यादव और ठाकुर सुमित |
| अदालत का अंतिम आदेश | अपील स्वीकार। 24 साल पुराना उम्रकैद का फैसला रद्द; सभी जीवित आरोपी बाइज्जत बरी। |

