Tuesday, September 8, 2026
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Fence-Sitters: तमाशबीनों को दूसरों के अधिकार तय होने के बाद वरिष्ठता विवाद उठाने की अनुमति नहीं दे सकते…शुरू में शामिल क्यों नहीं हुए, पढ़ें केस

Fence-Sitters: सरकारी नौकरियों में वरिष्ठता (Seniority) और पदोन्नति (Promotion) के विवादों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और कड़ा फैसला सुनाया है।

लोक कानून के सिद्धांतों को दोहराया गया

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने तमिलनाडु के एक सेवा विवाद से जुड़े मामले में यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने देरी से आने वाले (Delay and Laches) याचिकाकर्ताओं को कोई भी राहत देने से साफ इनकार कर दिया। अदालत ने लोक कानून (Public Law) के सिद्धांतों को स्पष्ट करते हुए अपनी टिप्पणी में कहा, यह पूरी तरह से स्थापित कानून है कि ‘तमाशबीनों’ को मामला संपन्न होने के बाद वरिष्ठता और परिणामी पदोन्नति से संबंधित विवाद उठाने या किसी आदेश की वैधता को चुनौती देने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

अदालत पुराने दावों को बढ़ावा नहीं देती है: अदालत

कोई भी पक्षकार अधिकार के रूप में राहत का दावा नहीं कर सकता। राहत देने से इनकार करने का एक सुस्थापित आधार यह है कि अदालत का दरवाजा खटखटाने वाला व्यक्ति अत्यधिक देरी का दोषी है। सार्वजनिक कानून क्षेत्र में काम करने वाली अदालतें बासी/सालों पुराने दावों (Stale Claims) को बढ़ावा नहीं देतीं, विशेषकर वरिष्ठता और पदोन्नति के मामलों में, जहां इस दौरान तीसरे पक्षों के अधिकार पूरी तरह परिपक्व और तय हो चुके होते हैं।

क्या था पूरा मामला? (20 साल पुराना प्रमोशन विवाद)

यह कानूनी लड़ाई साल 2005 में शुरू हुई थी और करीब दो दशकों तक न्यायपालिका के अलग-अलग स्तरों से गुजरी।

मूल विवाद (2005): तमिलनाडु सरकार ने 18 जनवरी 2005 को एक सरकारी आदेश (G.O.) जारी कर टी. ज्ञानवेल (T. Gnanavel) को 14 अप्रैल 1997 से काल्पनिक पदोन्नति (Notional Promotion) देते हुए सहायक अभियंता (Assistant Engineer) नियुक्त किया था।

हाई कोर्ट में चुनौती: विभागों के विलय के बाद जूनियर इंजीनियर बनीं आर. शशिप्रिया ने इस सरकारी आदेश और वरिष्ठता सूची को मद्रास हाई कोर्ट में चुनौती दी। 2012 में सिंगल जज ने उनकी याचिका खारिज की, लेकिन 2024 में डिवीजन बेंच ने उनके पक्ष में फैसला सुनाते हुए सरकार के पुराने आदेश को रद्द कर दिया। इसके खिलाफ राज्य सरकार और ज्ञानवेल ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

20 साल में बदल गईं स्थितियां: इस 20 साल लंबी कानूनी लड़ाई के दौरान ज्ञानवेल और शशिप्रिया दोनों को विभाग में आगे भी प्रमोशन मिलते रहे—वे 2007 में सहायक कार्यकारी अभियंता और 2016 में कार्यकारी अभियंता (Executive Engineer) बन चुके थे।

अंतिम मोड़ पर ‘तमाशबीनों’ की एंट्री को कोर्ट ने किया खारिज

जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में अंतिम सुनवाई के चरण में पहुंचा, तब दो ऐसे कर्मचारियों ने मामले में पक्षकार बनने (Impleadment) की अर्जी लगाई, जो पिछले 20 सालों में हाई कोर्ट की किसी भी कार्यवाही का हिस्सा नहीं थे। उनका दावा था कि वे ज्ञानवेल से सीनियर हैं, इसलिए उन्हें भी वे सारे प्रमोशनल लाभ मिलने चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के लिए फैसला लिखने वाले जस्टिस आर. महादेवन ने इन नए आवेदकों की अर्जी को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा, “जहां तक पक्षकार बनने का दावा करने वाले आवेदकों का सवाल है, वे हाई कोर्ट के समक्ष किसी भी कार्यवाही का हिस्सा नहीं थे, न ही उन्होंने मुख्य विवाद में हस्तक्षेप करना जरूरी समझा। वे केवल सुप्रीम कोर्ट के सामने पक्षकार बनने आए हैं। ऐसा दावा किसी भी लागू होने योग्य कानूनी अधिकार को प्रकट नहीं करता। यह साफ दिखाता है कि वे इस कार्यवाही के लिए पूरी तरह बाहरी (Outsider) हैं। वे केवल किनारे बैठकर (Side-lines) तमाशा देख रहे थे और इस इंतजार में थे कि जब विवाद का नतीजा आने वाला हो, तब बहती गंगा में हाथ धोकर प्रमोशन का फायदा उठा लिया जाए।”

विश्लेषण: प्रशासनिक स्थिरता पर सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण

सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच के 2024 के फैसले को पलट दिया और सरकार के 2005 के आदेश को बहाल रखा। अदालत ने इसके पीछे ‘प्रशासनिक अनिश्चितता’ को बड़ी वजह माना।

विषयसुप्रीम कोर्ट की व्याख्या और निर्णय
हाई कोर्ट का फैसला गलतकोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने दो दशक पुरानी और पूरी तरह से स्थापित सेवा स्थिति (Settled Service Position) में हस्तक्षेप करके गंभीर गलती की थी।
प्रशासनिक अराजकता का खतराअदालत ने स्पष्ट किया कि इतने लंबे समय के बाद यदि सेवा नियमों या वरिष्ठता सूचियों को बदला जाएगा, तो इससे प्रशासनिक अनिश्चितता (Administrative Uncertainty) पैदा होगी और व्यवस्था चरमरा जाएगी।
देरी करने वालों को कोई संरक्षण नहींकानून केवल उनके अधिकारों की रक्षा करता है जो अपने अधिकारों के प्रति जागरूक (Vigilant) होते हैं, उनके लिए नहीं जो सालों तक सोते रहते हैं और अचानक जागकर दूसरों के अधिकारों को चुनौती देते हैं।
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