Saturday, August 15, 2026
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FIR plea: एक जज के खिलाफ FIR की अनुमति लेने पहुंचा… चीफ जस्टिस ने यह कह दी बात; कोर्ट के वीडियो यूट्यूब पर न डालें

FIR plea: दिल्ली हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता से कड़े सवाल किए, जिसने एक न्यायिक अधिकारी (Judicial Officer) के खिलाफ कथित जालसाजी (Forgery) के मामले में FIR दर्ज करने की अनुमति मांगी थी।

मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की पीठ ने स्पष्ट किया कि जजों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की एक निर्धारित प्रक्रिया है, जिसका उल्लंघन नहीं किया जा सकता। अदालत ने याचिकाकर्ता को सुप्रीम कोर्ट के नियमों की याद दिलाया। सुनवाई के दौरान अदालत उस समय नाराज हो गई जब उन्हें पता चला कि याचिकाकर्ता ने अदालती कार्यवाही का वीडियो यूट्यूब (YouTube) पर अपलोड किया है।

कानूनी प्रक्रिया: रिट याचिका से नहीं हो सकती FIR

  • प्रशासनिक मंजूरी: किसी भी मौजूदा (Sitting) जज के खिलाफ FIR केवल प्रशासनिक स्तर पर मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) से पूर्व अनुमति लेने के बाद ही दर्ज की जा सकती है।
  • रिट याचिका का दायरा: अदालत ने कहा कि इस तरह की अनुमति किसी ‘रिट याचिका’ (Writ Petition) के माध्यम से नहीं मांगी जा सकती।
  • शिकायत बनाम FIR: न्यायाधीशों ने स्पष्ट किया कि शिकायत दर्ज करना और FIR के लिए अनुमति मांगना, दोनों अलग-अलग चीजें हैं। भले ही कोई शिकायत लंबित हो, FIR के लिए अलग से मंजूरी लेना अनिवार्य है।

यूट्यूब वीडियो पर सख्त ऐतराज

  • चेतावनी: कोर्ट ने याचिकाकर्ता को सख्त चेतावनी दी कि वह भविष्य में अदालत की कार्यवाही के वीडियो सोशल मीडिया पर साझा न करे।
  • नियमों का उल्लंघन: दिल्ली पुलिस और राज्य की ओर से पेश वकील संजीव भंडारी ने भी इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि कोर्ट वीडियो पोस्ट करना नियमों के खिलाफ है।

तथ्यों को छिपाने का आरोप

राज्य के वकील ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि इसमें महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए गए हैं। उन्होंने कोर्ट को बताया कि संबंधित आदेश को पहले ही चुनौती दी जा चुकी है।

अदालत का निर्देश

अदालत ने वकील को सलाह दी कि वे उचित प्रक्रिया का पालन करें और बहस के दौरान निष्पक्ष रहें। कोर्ट ने अधिकारियों से मामले का रिकॉर्ड पेश करने को कहा है और अब इस पर अगले सप्ताह फिर से सुनवाई होगी।

एक नजर में: जजों के खिलाफ कार्रवाई के नियम

सुप्रीम कोर्ट के ‘वी. रामास्वामी’ और ‘के. वीरास्वामी’ जैसे ऐतिहासिक फैसलों के अनुसार, न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए किसी भी न्यायाधीश के खिलाफ आपराधिक जांच शुरू करने से पहले उच्च न्यायपालिका के प्रमुख (CJI या संबंधित हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस) की लिखित अनुमति आवश्यक होती है।

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