Monday, August 10, 2026
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Health System: सरकारी डॉक्टरों के निजी प्रैक्टिस…क्या डाॅक्टराें काे देने के लिए धन व सुविधा देने में कोई कमी रह गई, सरकार से ऐसा क्यूं कहा, जानिए

Health System: सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी अस्पतालों से जुड़े डॉक्टरों द्वारा नियमों के खिलाफ जाकर निजी तौर पर प्रैक्टिस करने और समानांतर स्वास्थ्य व्यवस्था (Parallel Healthcare System) चलाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर सख्त रुख अपनाया है।

प्रयागराज के मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज से संबद्ध सरकारी डॉक्टरों के खिलाफ जांच

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस जोयमाल्या बागची की खंडपीठ ने मेडिकल कॉलेज के सर्जरी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. संतोष कुमार सिंह द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) को यह कहते हुए वापस लेने (Withdraw) की अनुमति दे दी कि अदालत हाई कोर्ट के जनहित आदेश में कोई दखल नहीं देना चाहती। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया, जिसमें प्रयागराज के मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज से संबद्ध सरकारी डॉक्टरों के खिलाफ एक उच्च-स्तरीय जांच (High-Level Inquiry) के निर्देश दिए गए थे।

मामले की पृष्ठभूमि: सरकारी अस्पताल बनाम प्राइवेट अस्पताल का ‘नेक्सस’

यह पूरा विधिक विवाद प्रयागराज के मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज और उससे संबद्ध स्वरूप रानी नेहरू (SRN) अस्पताल की बदहाल स्थिति और डॉक्टरों की कथित लापरवाही से जुड़ा है।

क्या था आरोप?: इलाहाबाद हाई कोर्ट में लंबित एक जनहित कार्यवाही के दौरान यह बात सामने आई कि मेडिकल कॉलेज के कई प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और लेक्चरर सरकारी प्रतिबंध के बावजूद निजी नर्सिंग होम में मरीजों का इलाज और सर्जरी कर रहे हैं। यहां तक कि सरकारी अस्पताल (स्वरूप रानी नेहरू अस्पताल) से मरीजों को निजी अस्पतालों में शिफ्ट करने का एक संगठित खेल चल रहा है।

निजी नर्सिंग होम से जुड़ाव: हाई कोर्ट के संज्ञान में यह बात लाई गई थी कि याचिकाकर्ता डॉ. संतोष कुमार सिंह की पत्नी प्रयागराज के ‘एक्यूरा हॉस्पिटल’ (Acura Hospital) नामक एक निजी नर्सिंग होम की डायरेक्टर हैं, जहाँ डॉक्टर सिंह कथित तौर पर निजी रूप से सर्जरी करते थे।

हाई कोर्ट की कड़ी टिप्पणी: 4 मई, 2026 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस स्थिति पर गहरी नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा था। कहा, ऐसा प्रतीत होता है कि मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज और स्वरूप रानी नेहरू अस्पताल की स्थिति इसलिए नहीं खराब हुई कि सरकार के पास धन या सुविधाओं की कमी है, बल्कि इसलिए हुई है क्योंकि चिकित्सक बिरादरी (Medical Fraternity) सरकार के उद्देश्यों को विफल कर रही है। डॉक्टर प्रयागराज शहर में एक समानांतर चिकित्सा उद्योग चला रहे हैं।

मुख्य सचिव को आदेश: पूर्व में जिला मजिस्ट्रेट (DM) से मांगी गई रिपोर्ट न आने पर हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव (Chief Secretary) को व्यक्तिगत रूप से इस मामले में हस्तक्षेप करने, दोषी डॉक्टरों के खिलाफ उच्च-स्तरीय जांच कमेटी गठित करने और अस्पताल के रुके हुए बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट्स (जैसे 2006 से लंबित कार्डियोलॉजी विभाग का निर्माण) की निगरानी करने का आदेश दिया था।

सुप्रीम कोर्ट का विधिक रुख: सार्वजनिक हित सर्वोपरि

दलील: डॉ. सिंह की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता हर्षवीर प्रताप शर्मा ने दलील दी कि उनके मुवक्किल हाई कोर्ट की मूल कार्यवाही में पक्षकार (Party) नहीं थे और एकल न्यायाधीश ने उनके एक व्यक्तिगत विवाद से उपजी FIR के आधार पर यह आदेश पारित कर दिया। इस दलील को खारिज करते हुए जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने अत्यंत महत्वपूर्ण मौखिक टिप्पणी की। कहा, यह उद्देश्य (Cause) बहुत अच्छा और सार्वजनिक हित में है। सरकारी डॉक्टरों को निजी प्रैक्टिस बिल्कुल नहीं करनी चाहिए, और आप भी एक डॉक्टर हैं।

समझाया: यह कार्यवाही किसी एक व्यक्ति (डॉ. सिंह) के खिलाफ नहीं है, बल्कि उन सभी डॉक्टरों के लिए है जो इस तरह की निजी प्रैक्टिस में लिप्त हैं। इसमें कुछ भी व्यक्तिगत नहीं है। जब पीठ ने याचिका को खारिज करने के स्पष्ट संकेत दिए, तो वकील ने याचिका वापस लेने और हाई कोर्ट के समक्ष ही अपनी बात रखने की स्वतंत्रता (Liberty) मांगी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कोई विशेष छूट देने से इनकार करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता या तो आदेश को सीधे खारिज कराएं या इसे वापस लें। अंततः याचिका वापस ले ली गई।

केस मैट्रिक्स और विधिक सारांश (Case Matrix)

कानूनी बिंदु / श्रेणियांउच्चतम न्यायालय का विधिक निर्णय (2026)
संबंधित अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस जोयमाल्या बागची (खंडपीठ)
मूल आदेश देने वाली अदालतइलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court)
प्रशासनिक निर्देशउत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को दोषी डॉक्टरों के खिलाफ उच्च-स्तरीय जांच और अस्पताल के निर्माण कार्यों की निगरानी का आदेश।
अदालत का अंतिम स्टैंडसरकारी डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस पर पूर्ण असंतोष; हाई कोर्ट की जांच प्रक्रिया में किसी भी विधिक हस्तक्षेप से इनकार।
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