Hidden Third Marriage: दिल्ली हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के मामले में आरोपी व्यक्ति की डिस्चार्ज याचिका (Revisional Petition) को खारिज करते हुए निचली अदालत द्वारा तय किए गए आरोपों को पूरी तरह से बरकरार रखा है।
शादी का झूठा वादा करके शारीरिक संबंध बनाया: अदालत
हाईकोर्ट के जस्टिस सौरभ बनर्जी की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि आईपीसी की धारा 376(2)(n) (बार-बार बलात्कार) और धारा 377 (अप्राकृतिक यौन संबंध) के तहत आरोप तय करने के लिए प्राथमिक दृष्ट्या (Prima Facie) पर्याप्त सामग्री मौजूद है। अदालत ने कहा, यदि दो संभावित विचार (Possible Views) निकल रहे हों और सबूत केवल एक ‘सामान्य संदेह’ पैदा करते हों, तो अभियुक्त को डिस्चार्ज (मुक्त) किया जा सकता है। लेकिन जहां अभियुक्त ने शादी का झूठा वादा करके शारीरिक संबंध बनाए और पीड़िता से छिपाकर किसी तीसरी महिला से शादी कर ली, तो यह अदालत के मन में गंभीर संदेह (Grave Suspicion) पैदा करने के लिए पर्याप्त है। ऐसे मामले में मिनी-ट्रायल चलाए बिना मुकदमा (Trial) का सामना करना ही होगा।
मामला क्या है?: मैट्रिमोनियल ऐप पर मुलाकात से लेकर शादी के धोखे तक
मुलाकात: पीड़िता और आरोपी की पहचान एक मैट्रिमोनियल ऐप (Matrimonial App) के जरिए हुई थी, जो बाद में दोस्ती में बदल गई। आरोपी उत्तराखंड से दिल्ली पीड़िता से मिलने आया।
आरोप: पीड़िता का आरोप है कि आरोपी ने शादी का झांसा देकर दिल्ली के एक होटल में उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। इसके बाद कई सालों तक अलग-अलग होटलों में शादी का वादा दोहराकर संबंध बनाए गए। कुछ मौकों पर पीड़िता की सहमति के बिना जबरन अप्राकृतिक यौन संबंध (Unnatural Acts) भी बनाए गए।
शादी का सच आया सामने: पीड़िता को बाद में पता चला कि आरोपी ने उसके पीछे किसी अन्य महिला से शादी कर ली है। इसके बाद उसने पुलिस में शिकायत दर्ज कराकर एफआईआर (FIR) दर्ज कराई।
दोनों पक्षों की दलीलें और कोर्ट का रुख
आरोपी (याचिकाकर्ता) के तर्क: दोनों के बीच 3 साल तक संबंध रहे, जो यह दिखाता है कि संबंध पूरी तरह सहमति से (Consensual) थे। होटल में पीड़िता ने खुद अपनी आईडी जमा कराई थी, इसलिए वह केवल मेहमान नहीं थी। विवाह का पता चलने के बाद भी पीड़िता उससे मिली, जिससे उसके आरोपों पर सवाल उठते हैं। इलेक्ट्रॉनिक सबूत (ऑडियो रिकॉर्डिंग) की कोई फोरेंसिक जांच (FSL) नहीं हुई थी।
हाई कोर्ट का रुख और मुख्य विधिक निष्कर्ष (Legal Principles)
‘सामान्य संदेह’ बनाम ‘गंभीर संदेह’ (Mere Suspicion vs Grave Suspicion)
कोर्ट ने डिस्चार्ज के कानूनी सिद्धांतों को स्पष्ट करते हुए कहा कि आरोप तय (Framing of Charges) करते समय अदालत को सबूतों की गहराई से जांच (Mini-Trial) नहीं करनी होती।
कोर्ट की टिप्पणी: यदि सबूत केवल ‘सामान्य संदेह’ (Mere Suspicion) पैदा करते हैं, तो आरोपी को रिहा (Discharge) किया जा सकता है। लेकिन जहां पीड़िता को अंधेरे में रखकर शादी का झांसा दिया गया और किसी तीसरी महिला से शादी कर ली गई, वहां यह ‘गंभीर संदेह’ (Grave Suspicion) का मामला बनता है, जिसका फैसला केवल पूर्ण मुकदमे (Full Trial) में ही हो सकता है।
सिर्फ ‘रिलेशनशिप खराब होना’ नहीं, बल्कि ‘धोखाधड़ी’
अदालत ने आरोपी द्वारा दिए गए पिछले कानूनी फैसलों की नज़ीरों को खारिज करते हुए कहा कि यह केवल “आपसी सहमति से बना संबंध जो बाद में खराब हो गया” का मामला नहीं है। पीड़िता से छुपाकर दूसरी शादी करना आरोपी की शुरुआती नीयत और वादे पर सवाल उठाता है।
इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों और सहमति की जांच ट्रायल का विषय
कोर्ट ने माना कि ऑडियो रिकॉर्डिंग की प्रामाणिकता, होटल के रिकॉर्ड और विवाह के बाद की मुलाकातों के तथ्यों की सत्यता की जांच गवाही के दौरान ट्रायल में होगी, न कि डिस्चार्ज के स्तर पर।
अदालत का अंतिम निर्णय
दिल्ली उच्च न्यायालय ने निचली अदालत द्वारा आईपीसी की धारा 376(2)(n) और धारा 377 के तहत तय किए गए आरोपों में हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया और आरोपी की पुनरीक्षण याचिका को खारिज (Dismiss) कर दिया। मामले में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता प्रिंस अरोड़ा और राज्य की ओर से एपीपी रघुविंदर वर्मा ने पैरवी की।
केस मैट्रिक्स: दिल्ली उच्च न्यायालय का फैसला
| कानूनी और प्रक्रियात्मक बिंदु | अदालत द्वारा तय की गई स्थिति |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस सौरभ बनर्जी (Justice Saurabh Banerjee) |
| संबंधित धाराएं | IPC की धारा 376(2)(n) (समान महिला से बार-बार रेप) और धारा 377 (अप्राकृतिक यौन संबंध) |
| मुख्य कानूनी सिद्धांत | पीड़िता से छुपाकर तीसरी औरत से शादी करना ‘गंभीर संदेह’ (Grave Suspicion) पैदा करता है। |
| अदालत का फैसला | याचिका खारिज; डिस्चार्ज देने से इनकार, ट्रायल जारी रहेगा। |

