People Liberty: एक आपराधिक मामले में नागरिक की स्वतंत्रता और पुलिस की लचर कार्यप्रणाली पर बेहद सख्त रुख अपनाते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस के आला अधिकारियों को कटघरे में खड़ा किया है।
NDPS एक्ट के तहत आरोपी को अग्रिम जमानत पर हुई सुनवाई
हाईकोर्ट के जस्टिस गिरीश कठपालिया की एकल पीठ ने एनडीपीएस (NDPS) कानून के तहत दर्ज एक मामले में आरोपी को अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) देते हुए यह आदेश पारित किया। अदालत ने कहा, पुलिस का काम केवल लोगों को गिरफ्तार करके जेल में ठूंसना (Dump people in jail) नहीं हो सकता, खासकर तब जब वे अदालत में किसी नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Liberty) का विरोध करना चाहते हों लेकिन खुद मामले में कोई गंभीर भागीदारी नहीं निभा रहे हैं। यह स्थिति बेहद खेदजनक है कि अदालत में मामला पुकारे जाने (Called) के बाद जांच अधिकारी सरकारी वकील को ब्रीफ करना शुरू करते हैं और पूरी अदालत को इंतजार करना पड़ता है। दिल्ली पुलिस कमिश्नर यह सुनिश्चित करने के लिए निर्देश जारी करें कि जांच अधिकारी अदालत शुरू होने से पहले ही अभियोजकों को पूरी तरह ब्रीफ कर दें।
मामला क्या है?: अदालत में सुस्ती और कागजी दावों की हवा
यह विधिक विवाद स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 (NDPS Act) की धारा 20 के तहत दर्ज एक मामले से जुड़ा है।
आरोप: याचिकाकर्ता/आरोपी पर आरोप था कि उसने उस मुख्य आरोपी को रहने के लिए जगह (Accommodation) दी थी, जिसके पास से ‘कमर्शियल क्वांटिटी’ (व्यावसायिक मात्रा) में चरस बरामद हुई थी।
अदालती कार्यवाही का घटनाक्रम: पिछली सुनवाई पर कोर्ट ने आरोपी को गिरफ्तारी से अंतरिम संरक्षण (Interim Protection) दिया था। जब अंतिम सुनवाई की बारी आई, तो एडिशनल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर (APP) ने कहा कि स्टेटस रिपोर्ट दाखिल की गई थी, लेकिन वह तकनीकी आपत्तियों (Objections) के कारण रिकॉर्ड पर नहीं आ सकी।
कोर्ट रूम का नजारा: जस्टिस कठपालिया ने नोट किया कि जब मामले की सुनवाई शुरू हुई, तब जांच अधिकारी (Investigating Officer – IO) ने अदालत के भीतर ही सरकारी वकील को केस के बारे में ब्रीफ करना शुरू किया, जिससे अदालत का कीमती समय बर्बाद हुआ और पूरी कोर्ट को ब्रीफिंग खत्म होने का इंतजार करना पड़ा।
हाई कोर्ट की तीखी टिप्पणी: स्वतंत्रता के मुद्दे पर एजेंसियों का यह ढर्रा मंजूर नहीं
जस्टिस गिरीश कठपालिया ने राज्य एजेंसियों द्वारा नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मुद्दों को हल्के में लेने की प्रवृत्ति पर कड़ा ऐतराज जताया।
समय पर आपत्तियां हटाना अभियोजन का काम: कोर्ट ने कहा कि यह अभियोजन पक्ष (Prosecution) की जिम्मेदारी थी कि वह समय रहते स्टेटस रिपोर्ट की विधिक आपत्तियों को दूर करवाता।
पुलिस की जवाबदेही: जांच अधिकारी का आचरण बेहद निंदनीय (Deplorable) है। राज्य एजेंसियों को स्वतंत्रता के मुद्दे पर इस तरह से काम नहीं करना चाहिए। पुलिस केवल लोगों को गिरफ्तार करके जेल में बंद नहीं कर सकती, बिना किसी गंभीर भागीदारी के, जहां वे जमानत का विरोध करना चाहते हैं। यह बार-बार निर्देशित किया गया है कि जैसा कुछ साल पहले होता था, जांचकर्ताओं को अदालत की कार्यवाही शुरू होने से पहले ही अभियोजकों को ब्रीफ करना अनिवार्य है।
पुलिस के दावों की खुली पोल: न केस डायरी, न कोई नोटिस
अदालत ने जब जांच अधिकारी के दावों की विधिक पड़ताल की, तो पुलिस की पूरी थ्योरी ढह गई।
आरोपी का तर्क: आरोपी ने अदालत को बताया कि अंतरिम राहत मिलने के बावजूद जांच अधिकारी ने उसे कभी भी जांच में शामिल (Join investigation) होने के लिए नहीं बुलाया।
पुलिस का खोखला दावा: आईओ ने दावा किया कि उसने आरोपी को ढूंढने के बहुत प्रयास किए, लेकिन वह नहीं मिला।
अदालत का विधिक सवाल: जब कोर्ट ने एडिशनल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर (APP) से पूछा कि क्या पुलिस के पास आरोपी को तामील कराए गए किसी नोटिस की प्रति है? या आरोपी के घर जाने से पहले पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई कोई डीडी एंट्री (Daily Diary Entry) है? या इस केस की कोई केस डायरी (Case Diary) है जिसमें इन कोशिशों का जिक्र हो? तो अभियोजन पक्ष अदालत के सामने ऐसा कोई भी विधिक दस्तावेज पेश नहीं कर सका। चूंकि अभियोजन पक्ष अपनी कोई भी दलील साबित करने में नाकाम रहा, इसलिए हाई कोर्ट ने आरोपी की अंतरिम सुरक्षा को स्थायी करते हुए उसे ₹25,000 के निजी मुचलके और इतनी ही राशि की एक जमानतदार (Surety) की शर्त पर अग्रिम जमानत दे दी।
विधिक फैक्ट शीट: दिल्ली हाई कोर्ट बनाम पुलिस जांच जवाबदेही (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और कड़े निर्देश |
| संबंधित न्यायालय | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court), नई दिल्ली |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस गिरीश कठपालिया (एकल पीठ) |
| पक्षकार (वकील) | अधिवक्ता आदित्य अग्रवाल (आरोपी) बनाम एपीपी संजीव सभरवाल (राज्य) |
| प्रासंगिक कानून | धारा 20, स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम (NDPS Act), 1985 |
| प्रशासनिक निर्देश | दिल्ली पुलिस कमिश्नर को आईओ के लिए दिशा-निर्देश जारी करने का आदेश |
| अनिवार्य विधिक नजीर | अदालत की कार्यवाही शुरू होने से पहले अभियोजकों की ब्रीफिंग पूरी होना अनिवार्य |
अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी नागरिक की स्वतंत्रता (Liberty) का अधिकार सबसे अमूल्य है। पुलिस केवल ‘अवैधता या फरार होने’ के मौखिक दावे नहीं कर सकती; उसे हर कदम को केस डायरी और विधिक नोटिसों के जरिए साबित करना होगा। पुलिस कमिश्नर को दिए गए इस निर्देश के बाद उम्मीद है कि अदालतों में पुलिस की लेटलतीफी और ढीले रवैये पर लगाम लगेगी।

