Wednesday, October 21, 2026
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Human Trafficking: मानव तस्करी रोधी इकाइयों को कानूनन पुलिस स्टेशन का दर्जा अधिसूचित करें; पीड़ित संरक्षण योजना का जमीनी क्रियान्वयन अनिवार्य

सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख निर्देश एवं अनुपालन बिंदु

1. AHTUs को पुलिस थाने का दर्जा:

  • FIR दर्ज करने व जांच का अधिकार: AHTU को पुलिस स्टेशन का दर्जा मिलने से ये इकाइयां मानव तस्करी के मामलों में सीधे प्राथमिकी (FIR) दर्ज कर सकेंगी, स्वतंत्र जांच कर सकेंगी और अपराधियों के खिलाफ तुरंत कानूनी कार्रवाई कर पाएंगी।
  • अनुच्छेद 142 के तहत निर्देश: कोर्ट ने कहा कि पीड़ित सुरक्षा योजना को प्रभावी बनाने के लिए मुख्य फैसले के पैरा 362(b)(iii) का पालन करना अनिवार्य है।

2. पीड़ित सुरक्षा योजना का पूर्ण अनुपालन:

कोर्ट ने चिंता जताई कि 29 मई 2026 के मुख्य फैसले के पैरा 456 में जारी किए गए चार अतिरिक्त निर्देशों का राज्यों द्वारा पूरी तरह से पालन नहीं किया गया है। कोर्ट ने निम्नलिखित कदम जल्द पूरे करने के निर्देश दिए:

  • कल्याणकारी संस्थाओं की अधिसूचना: अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 (Immoral Traffic (Prevention) Act, 1956) की धारा 15(6A) और 17A के तहत मान्यता प्राप्त कल्याणकारी संस्थानों (Recognised Welfare Institutions) को अधिसूचित किया जाए।
  • सामाजिक कार्यकर्ताओं की सूची: पात्र सामाजिक कल्याण कार्यकर्ताओं की राज्य/UT-वार सूची तैयार की जाए।
  • नोडल अधिकारियों की नियुक्ति: मानव तस्करी रोकने और पीड़ितों की सहायता के लिए पुलिस नोडल अधिकारी (Police Nodal Officers) और सरकारी नोडल अधिकारी (Government Nodal Officers) नामित किए जाएं।

3. स्थिति रिपोर्ट (Status Report):

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को सभी हितधारकों से कार्यान्वयन से संबंधित जानकारी एकत्र करने और अगली सुनवाई से पहले एक नई स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 14 दिसंबर 2026 तय की गई है।

नई दिल्ली: भारत के संविधान के अनुच्छेद 23 (मानव दुर्व्यापार एवं बलात् श्रम का प्रतिषेध), अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार), अनुच्छेद 142 (पूर्ण न्याय प्रदान करने की असाधारण संवैधानिक शक्ति), अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 (Immoral Traffic (Prevention) Act, 1956 – ITPA) की धारा 15(6A) एवं धारा 17A (मान्यता प्राप्त कल्याणकारी संस्थाओं की अधिसूचना), तथा वाणिज्यिक यौन शोषण (Commercial Sexual Exploitation) के लिए महिलाओं और बच्चों की तस्करी की रोकथाम हेतु राष्ट्रीय ‘पीड़ित संरक्षण योजना’ (Victim Protection Plan) के प्रभावी क्रियान्वयन पर सुप्रीम कोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है।

न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की खंडपीठ ने 29 मई 2026 के अपने ऐतिहासिक फैसले के अनुपालन की समीक्षा करते हुए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के गृह विभागों को निर्देश दिया कि वे अपने-अपने अधिकार क्षेत्रों में कार्यरत मानव तस्करी रोधी इकाइयों (Anti-Human Trafficking Units – AHTUs) को कानून के अनुसार विधिवत अधिसूचना जारी कर ‘पुलिस स्टेशन’ (Police Station) का दर्जा प्रदान करें।

शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक AHTUs को पुलिस स्टेशन का दर्जा नहीं दिया जाता, तब तक वे स्वतंत्र रूप से प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने, जांच करने और पीड़ित महिलाओं व बच्चों को तत्काल विधिक सुरक्षा देने में अक्षम रहेंगी। अदालत ने केंद्र सरकार को सभी राज्यों के साथ समन्वय स्थापित कर आवश्यक अधिसूचनाएं जारी कराने का निर्देश दिया और मामले की अगली सुनवाई 14 दिसंबर 2026 तय की।

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायिक निर्देश एवं विधिक व्यवस्था

1. AHTUs को ‘पुलिस स्टेशन’ के रूप में अधिसूचित करने का बाध्यकारी आदेश

वरिष्ठ अधिवक्ता अपर्णा भट ने खंडपीठ के संज्ञान में लाया कि 29 मई 2026 के मुख्य निर्णय के पैरा 362(b)(iii) के तहत दिए गए स्पष्ट निर्देशों के बावजूद कई राज्यों ने अभी तक AHTUs को पुलिस स्टेशन का दर्जा देने वाली सांविधिक अधिसूचना जारी नहीं की है। इस दलील को स्वीकार करते हुए खंडपीठ ने आदेश दिया: “इस संबंध में, हम सभी राज्य/केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों को उनके संबंधित गृह विभागों (Home Departments) के माध्यम से निर्देश देते हैं कि वे कानून के अनुसार एक उपयुक्त अधिसूचना जारी करके इस निर्देश को जल्द से जल्द प्रभावी बनाएं। केंद्र सरकार भी सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के साथ इस मुद्दे को शीघ्रता से उठाएगी और यह सुनिश्चित करेगी कि आवश्यक अधिसूचनाएं जारी की जाएं।”

2. पीड़ित संरक्षण योजना (Victim Protection Plan) का जमीनी क्रियान्वयन:

  • अदालत ने खेद व्यक्त किया कि 29 मई 2026 के फैसले के पैरा 456 में जारी किए गए चार अतिरिक्त निर्देशों का राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा अभी तक पूर्ण अनुपालन नहीं किया गया है।
  • खंडपीठ ने रेखांकित किया कि ये उपाय संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत तैयार की गई ‘विक्टिम प्रोटेक्शन प्लान’ को धरातल पर उतारने के लिए “पूरी तरह से अनिवार्य” (Absolutely Necessary for Ground-Level Implementation) हैं।

3. पैरा 456 के तहत राज्यों द्वारा पूरे किए जाने वाले अनिवार्य विधिक मानक:

सर्वोच्च न्यायालय ने निम्नलिखित चार प्रमुख बिंदुओं पर तत्काल कार्रवाई की अनिवार्यता दोहराई:

  1. कल्याणकारी संस्थाओं की अधिसूचना: ITPA, 1956 की धारा 15(6A) और धारा 17A के तहत तस्करी के पीड़ितों के पुनर्वास हेतु मान्यता प्राप्त कल्याणकारी संस्थानों को अधिसूचित करना।
  2. योग्य समाज कल्याण कार्यकर्ताओं की सूची: राज्य और केंद्र शासित प्रदेश स्तर पर योग्य एवं प्रशिक्षित सोशल वेलफेयर वर्कर्स की आधिकारिक सूची तैयार करना।
  3. पुलिस नोडल अधिकारी (Police Nodal Officers): प्रत्येक राज्य/यूटी में मानव तस्करी मामलों के समन्वय हेतु वरिष्ठ पुलिस नोडल अधिकारियों को पदनामित करना।
  4. सरकारी नोडल अधिकारी (Government Nodal Officers): पीड़ित सहायता, मुआवजे और पुनर्वास के लिए संबंधित विभागों के सरकारी नोडल अधिकारियों की नियुक्ति।

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AHTU को पुलिस स्टेशन का दर्जा मिलने का व्यावहारिक व विधिक प्रभाव

वर्तमान में कई राज्यों में AHTU केवल एक ‘समन्वय प्रकोष्ठ’ (Coordination Cell) के रूप में कार्य करती हैं, जिसके कारण उन्हें हर छापेमारी और कानूनी कार्रवाई के लिए स्थानीय थानों पर निर्भर रहना पड़ता है:

विधिक पहलूसामान्य इकाई (यथास्थिति)पुलिस स्टेशन का दर्जा मिलने के बाद
प्राथमिकी (FIR) दर्ज करनास्थानीय थाने में केस दर्ज कराना पड़ता है; क्षेत्राधिकार की समस्याएं आती हैं।AHTU स्वयं सीधे FIR दर्ज करने के लिए सक्षम होगी (CrPC धारा 154 / BNSS धारा 173)।
अन्वेषण व गिरफ्तारीस्थानीय थाने के जांच अधिकारी (IO) के साथ संयुक्त कार्रवाई आवश्यक।AHTU के विशेष प्रशिक्षित अधिकारी स्वतंत्र जांच, तलाशी और गिरफ्तारी कर सकेंगे।
क्षेत्राधिकार (Jurisdiction)एक थाने की संकीर्ण सीमा।जिले या अंतर-जिला स्तर पर विस्तृत विशेष क्षेत्राधिकार, जिससे अंतर-राज्यीय तस्करी रैकेट को पकड़ना सुगम होगा।
पीड़ितों का पुनर्वासस्थानीय थानों में संवेदनशीलता और महिला कर्मियों का अभाव।सीधे बाल कल्याण समितियों (CWC) और मान्यता प्राप्त शेल्टर होम्स के समन्वय से गोपनीय राहत।

विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: क्या कहता है कानून?

  • संविधान का अनुच्छेद 23 और पूर्ण न्याय (Article 142):
    • संविधान का अनुच्छेद 23 मानव दुर्व्यापार (Traffic in Human Beings) को एक दंडनीय अपराध घोषित करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने विशाल जीत बनाम भारत संघ (1990) और बुद्धदेव करमास्कर (2022) में बार-बार रेखांकित किया है कि वाणिज्यिक यौन शोषण के उद्देश्य से की जाने वाली तस्करी मानवीय गरिमा का सबसे जघन्य हनन है।
    • अनुच्छेद 142 के तहत शीर्ष अदालत द्वारा बनाई गई ‘पीड़ित संरक्षण योजना’ सभी राज्यों के लिए बाध्यकारी कानून (Law of the Land under Article 141) है।
  • CrPC की धारा 2(s) / BNSS की धारा 2(w) — ‘पुलिस थाने’ की परिभाषा:
    • कानून के अनुसार, “पुलिस थाना” का अर्थ राज्य सरकार द्वारा सामान्यतः या विशेष रूप से इस रूप में घोषित कोई भी चौकी या स्थान है।
    • राज्य के गृह विभागों को केवल एक औपचारिक प्रशासनिक गजट अधिसूचना जारी कर AHTU परिसरों को यह दर्जा प्रदान करना होता है; इसके लिए किसी नए विधायी संशोधन की आवश्यकता नहीं है।
  • ITPA की धारा 15(6A) व 17A की सांविधिक महत्ता:
    • जब भी किसी वेश्यालय या तस्करी के अड्डे से किसी महिला या बच्चे को छुड़ाया जाता है, तो कानून यह अनिवार्य करता है कि उन्हें तुरंत किसी सामान्य हवालात में रखने के बजाय राज्य द्वारा अधिसूचित ‘सुरक्षात्मक गृह’ (Protective Home) या मान्यता प्राप्त सामाजिक संस्था में भेजा जाए। इन संस्थाओं को अधिसूचित न करके राज्य सरकारें कानून का उल्लंघन कर रही थीं।

विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता

  • केस संदर्भ: इन री: वाणिज्यिक यौन शोषण हेतु महिलाओं और बच्चों की मानव तस्करी रोकथाम एवं पीड़ित संरक्षण योजना [रिट याचिका (आपराधिक) – 2026 INSC – सर्वोच्च न्यायालय]
  • पीठ: न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन (खंडपीठ)
  • आदेश की तिथि: 16-17 अक्टूबर 2026
  • मुख्य पूर्व निर्णय: 29 मई 2026 का ऐतिहासिक फैसला (पैरा 362(b)(iii) एवं पैरा 456)
  • अगली सुनवाई की तिथि: 14 दिसंबर 2026 (समेकित स्टेटस रिपोर्ट प्रस्तुत करने की अंतिम समय-सीमा)

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • याचिकाकर्ता की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता अपर्णा भट (Senior Advocate Aparna Bhat)
  • भारत संघ की ओर से: सॉलिसिटर जनरल / केंद्रीय विधि अधिकारी
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 23 (मानव तस्करी का प्रतिषेध), अनुच्छेद 21 (जीवन और मानवीय गरिमा) एवं अनुच्छेद 142 (विस्तृत पीड़ित संरक्षण योजना)
    • अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 (ITPA) — धारा 15(6A) (छुड़ाए गए व्यक्तियों की देखरेख) एवं धारा 17A (कल्याणकारी संस्थाएं)
    • दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) — धारा 2(s) (पुलिस स्टेशन की परिभाषा) व धारा 154 / BNSS 2023 की संगत धाराएं
    • किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 (JJ Act)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • संस्थागत मानव तस्करी रोधी ढांचा: ‘मानव तस्करी केवल एक सामान्य कानून-व्यवस्था का अपराध नहीं है, बल्कि यह संगठित अंतर-राज्यीय शोषण है; जब तक AHTUs को पूर्ण पुलिस स्टेशन का दर्जा देकर स्वतंत्र अन्वेषण शक्तियां और अधिसूचित आश्रय गृहों का जाल नहीं दिया जाता, तब तक संवैधानिक संरक्षण अधूरा रहेगा।’
  • अंतिम निर्देश: सभी राज्यों और यूटी के गृह विभागों को AHTUs को पुलिस स्टेशन अधिसूचित करने का तत्काल आदेश; केंद्र सरकार को सभी हितधारकों से प्रगति रिपोर्ट एकत्र कर 14 दिसंबर 2026 तक समग्र हलफनामा दाखिल करने का अंतिम निर्देश।

Human Trafficking:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठन्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला एवं न्यायमूर्ति आर. महादेवन
याचिकाकर्ता की ओर सेवरिष्ठ अधिवक्ता अपर्णा भट (Senior Advocate Aparna Bhat)
मुख्य कानूनी निर्देशसभी राज्य और UTs AHTUs को पुलिस थाने का दर्जा प्रदान करने के लिए अधिसूचना जारी करें।
संबंधित कानूनअनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 (ITPA, 1956) और संविधान का अनुच्छेद 142
मुख्य उद्देश्य29 मई 2026 के मुख्य फैसले के तहत बनाई गई पीड़ित सुरक्षा योजना (Victim Protection Plan) का जमीनी कार्यान्वयन।
अगली सुनवाई तिथिताजा स्थिति रिपोर्ट (Status Report) के साथ 14 दिसंबर 2026
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