Wednesday, October 21, 2026
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Waqf Board: नियुक्ति करने की शक्ति में हटाने की शक्ति अंतर्निहित है; राज्य वक्फ बोर्ड पुनर्गठन करने व 9 नए सदस्यों की नियुक्ति संबंधी सरकारी आदेश केस जानें

हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी तर्क

  1. प्रथम दृष्टया सरकार का रुख अवैध नहीं:न्यायामूर्ति एस. मनु ने पाया कि डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार को वक्फ अधिनियम की धारा 14 के तहत बोर्ड के गठन को कानून के अनुरूप बनाने से नहीं रोका था। इसलिए, सरकार का यह कदम पहले के बयानों के विपरीत नहीं माना जा सकता।
  2. सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांत का लागू होना:अदालत ने माना कि Sheikh Mahemud मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किया गया सिद्धांत (नियुक्त करने की शक्ति में हटाने/रद्द करने की शक्ति शामिल है) संशोधित वक्फ अधिनियम के संदर्भ में भी प्रासंगिक है। यह नहीं कहा जा सकता कि सरकार के पास पूर्व में की गई नियुक्तियों को रद्द करने का कोई अधिकार नहीं है।
  3. मामला डिवीजन बेंच को संदर्भित:चूंकि याचिकाओं में ऐसे गंभीर कानूनी प्रश्न उठाए गए हैं जिन पर विस्तृत विचार की आवश्यकता है, इसलिए एकल पीठ ने अंतरिम रोक खारिज करते हुए इन दोनों याचिकाओं को जनहित याचिकाओं की सुनवाई कर रही डिवीजन बेंच के समक्ष स्थानांतरित कर दिया।

कोच्चि: वक्फ अधिनियम, 1995 (Waqf Act, 1995) की धारा 14 (राज्य वक्फ बोर्ड की संरचना, विभिन्न श्रेणियों का प्रतिनिधित्व, शिया-सुन्नी व बोहरा समुदाय का अनुपात), धारा 14(6) के तहत सांविधिक निर्धारण, धारा 20 (अध्यक्ष व सदस्यों को हटाने की विशिष्ट परिस्थितियां), धारा 99 (बोर्ड के अधिक्रमण / Supersession की कठोर प्रक्रिया व कारण बताओ नोटिस की अनिवार्यता), तथा सामान्य खंड अधिनियम, 1897 (General Clauses Act) की धारा 16 के तहत ‘नियुक्ति करने की शक्ति में ही हटाने व रद्द करने की शक्ति अंतर्निहित होने’ के विधिक सिद्धांत (Power to appoint includes power to remove – State of Maharashtra v. Shaikh Mahemud) पर केरल हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है।

न्यायमूर्ति एस. मनु की एकल पीठ ने केरल सरकार द्वारा 16 अक्टूबर 2026 को जारी उस प्रशासनिक आदेश (Exhibit P9) पर अंतरिम रोक (Interim Stay) लगाने से साफ इनकार कर दिया, जिसके माध्यम से राज्य वक्फ बोर्ड का पुनर्गठन करते हुए 9 नए सदस्यों की नियुक्ति की गई थी और पूर्ववर्ती अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति वाले पुराने आदेशों को अधिक्रमित (Superseded) कर दिया गया था।

अदालत ने स्पष्ट किया कि यद्यपि याचिकाओं में गंभीर विधिक प्रश्न उठाए गए हैं जिन पर विस्तृत विचार की आवश्यकता है, किंतु सरकार के आदेश के संचालन को रोकने के लिए कोई ठोस अंतरिम आधार नहीं बनता। अदालत ने निर्देश दिया कि बोर्ड का नया पुनर्गठन इन रिट याचिकाओं के अंतिम परिणाम के अधीन (Subject to the outcome of these writ petitions) रहेगा। साथ ही एकल पीठ ने नव-नियुक्त अध्यक्ष व सदस्यों को नोटिस जारी करते हुए इन दोनों याचिकाओं को मुख्य जनहित याचिकाओं (PILs) की सुनवाई कर रही खंडपीठ (Division Bench) के समक्ष संदर्भित (Referred) कर दिया।

उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायिक निष्कर्ष एवं विधिक आधार

1. ‘कठोर अंतरिम रोक लगाने का कोई औचित्य नहीं; पुनर्गठन रिट याचिकाओं के अंतिम परिणाम के अधीन’

न्यायमूर्ति एस. मनु ने पूर्व अध्यक्ष और सदस्य द्वारा मांगी गई अंतरिम राहत को खारिज करते हुए दर्ज किया: “मेरा यह सुविचारित मत है कि Exhibit P9 के संचालन पर रोक लगाने वाला कोई सख्त अंतरिम आदेश पारित करने का कोई मामला नहीं बनता है। इसलिए Ext. P9 के संचालन पर रोक लगाने का अनुरोध अस्वीकार किया जाता है। फिर भी, चूंकि इन रिट याचिकाओं में ऐसे मजबूत और विचारणीय तर्क (Formidable contentions) उठाए गए हैं जिन पर विस्तृत चिंतन की आवश्यकता है, अतः मैं निर्देश देता हूं कि Ext. P9 द्वारा बोर्ड का किया गया यह पुनर्गठन इन रिट याचिकाओं के अंतिम परिणाम के अधीन रहेगा।”

2. ‘नियुक्ति करने की शक्ति में रद्द करने और हटाने की शक्ति समाहित है’:

  • याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क था कि संशोधित वक्फ अधिनियम में राज्य सरकार को पूरे बोर्ड को अचानक ‘पुनर्गठित’ करने की कोई सीधी शक्ति नहीं दी गई है; बोर्ड को हटाने के लिए धारा 20 और धारा 99 की प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है।
  • अदालत ने इस तर्क को प्रथम दृष्टया अस्वीकार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय के नजीरपरक निर्णय ‘महाराष्ट्र राज्य बनाम शेख महमूद व अन्य’ (State of Maharashtra v. Shaikh Mahemud and Anr.) के विधिक सिद्धांत को लागू किया:“सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित यह सिद्धांत—विशेष रूप से राज्य सरकार द्वारा किए जाने वाले नामांकनों (Nominations) के संबंध में—संशोधित अधिनियम के संदर्भ में भी पूरी तरह प्रासंगिक है। यह नहीं कहा जा सकता कि सरकार के पास उसके द्वारा की गई नियुक्तियों को रद्द करने का कोई विधिक प्राधिकार नहीं है।”

3. खंडपीठ के आदेशों और बयानों के उल्लंघन का आरोप खारिज:

  • याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि सरकार ने खंडपीठ के समक्ष केवल ‘रिक्तियों को भरने’ की बात कही थी, किंतु पीछे से पूरे बोर्ड को ही बदल दिया।
  • एकल पीठ ने 19 अगस्त और 14 अक्टूबर के पूर्व अदालती आदेशों का अवलोकन कर पाया कि खंडपीठ ने सरकार को धारा 14 के अनुरूप कानूनी बोर्ड बनाने से कभी नहीं रोका था; बल्कि महाधिवक्ता (AG) के पुनर्गठन संबंधी वक्तव्य को रिकॉर्ड पर लिया गया था:“प्रथम दृष्टया, मुझे याचिकाकर्ताओं के इस तर्क में कोई दम नहीं दिखता कि बोर्ड का यह पुनर्गठन खंडपीठ के समक्ष दिए गए बयानों और जनहित याचिकाओं में पारित आदेशों के विपरीत है।”

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं दोनों पक्षों की दलीलें

पक्षकार / मंचप्रमुख विधिक दलीलें एवं तथ्यात्मक आधार
याचिकाकर्ता
(के.एस. हम्ज़ा – पूर्व अध्यक्ष एवं सी.के. उस्मान हाजी – पूर्व सदस्य)
1. सरकार ने खंडपीठ में केवल रिक्तियां भरने की बात कही थी, किंतु अदालत बंद होने (22 अक्टूबर तक छुट्टी) की पूर्व संध्या पर 16 अक्टूबर को पूरे बोर्ड को हटा दिया।
2. वक्फ कानून में सरकार को मनमाने ‘पुनर्गठन’ की शक्ति नहीं है। धारा 99(1) के तहत अधिक्रमण (Supersession) केवल विशिष्ट विफलताओं पर कारण बताओ नोटिस देकर ही हो सकता है।
3. सदस्यों को पद से हटाने के लिए धारा 20 की विधिक शर्तें पूरी नहीं की गईं। धारा 14(1)(b)(i) और 14(1)(f) के तहत सांसद और बार काउंसिल प्रतिनिधि की अनदेखी की गई।
राज्य सरकार
(अपर महाधिवक्ता – AAG द्वारा पक्ष)
1. पुराना बोर्ड कानूनन त्रुटिपूर्ण था क्योंकि उसमें धारा 14(6) के तहत अनिवार्य समुदायों का निर्धारण नहीं हुआ था। पुराने बोर्ड में 9 मुस्लिम सदस्य पहले से थे, जिससे बोहरा और शिया समुदाय को जगह नहीं मिल पा रही थी।
2. नए आदेश (Ext.P9) में बोहरा और शिया प्रतिनिधित्व की वैधानिक आवश्यकता को पूर्ण किया गया है।
3. 14 अक्टूबर को खंडपीठ ने पुनर्गठन रोकने की अंतरिम अर्जी पर कोई रोक नहीं लगाई थी।
4. सांसद व बार काउंसिल सदस्य के संबंध में: सुप्रीम कोर्ट में 2 गैर-मुस्लिम सदस्यों की अनिवार्यता को लेकर मामला लंबित है, अतः 2 रिक्तियों को उसके निर्णय तक लंबित रखा गया है।

विधिक एवं सांविधिक विश्लेषण: वक्फ अधिनियम, 1995 का विधिक ढांचा

  • ‘शेख महमूद’ सिद्धांत और सामान्य खंड अधिनियम की धारा 16:
    • प्रशासनिक कानून का स्थापित सिद्धांत है कि जिस संप्रभु प्राधिकारी के पास सदस्यों को नामांकित करने (Nominate) की शक्ति होती है, उसी प्राधिकारी के पास त्रुटिपूर्ण नामांकन को निरस्त करने या नए सिरे से बोर्ड का गठन करने की अंतर्निहित शक्ति होती है।
    • राज्य सरकार ने यह प्रदर्शित किया कि पुराना बोर्ड धारा 14(6) के अनुपात को संतुष्ट नहीं कर रहा था, इसलिए नए विधिक संतुलन को स्थापित करने के लिए पुनर्गठन आवश्यक था।
  • धारा 20 बनाम पुनर्गठन (Removal vs Reconstitution):
    • धारा 20 किसी व्यक्तिगत सदस्य को दुराचार, दिवालियापन या अयोग्यता के आधार पर ‘दंडात्मक निष्कासन’ (Removal for Misconduct) से संबंधित है।
    • जहां पूरी संस्था की संरचना में वैधानिक असंतुलन हो और सरकार नए सिरे से अधिसूचना जारी करे, वहां व्यक्तिगत निष्कासन की दंडात्मक प्रक्रिया के बजाय नीतिगत पुनर्गठन का सिद्धांत आकर्षित होता है।
  • खंडपीठ के समक्ष व्यापक संदर्भ:
    • चूंकि वक्फ बोर्ड की संवैधानिक और वैधानिक वैधता से जुड़ी कई जनहित याचिकाएं पहले से ही उच्च न्यायालय की खंडपीठ के समक्ष विचाराधीन हैं, इसलिए एकल पीठ द्वारा मामले को खंडपीठ को सौंपना प्रक्रियात्मक सामंजस्य और परस्पर विरोधी आदेशों से बचने के लिए उपयुक्त कदम है।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: के.एस. हम्ज़ा एवं सी.के. उस्मान हाजी बनाम केरल राज्य व अन्य [रिट याचिका (सिविल) – केरल उच्च न्यायालय]
  • पीठ: न्यायमूर्ति एस. मनु (एकल पीठ)
  • आदेश की तिथि: 17 अक्टूबर 2026
  • चुनौतीपूर्ण आदेश: केरल सरकार का आदेश दिनांक 16 अक्टूबर 2026 (Exhibit P9 – राज्य वक्फ बोर्ड का पुनर्गठन व 9 नए सदस्यों की नियुक्ति)

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • याचिकाकर्ताओं (पूर्व अध्यक्ष व सदस्य) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता / संबंधित काउंसल
  • केरल राज्य की ओर से: अपर महाधिवक्ता (Additional Advocate General – AAG)
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • वक्फ अधिनियम, 1995 (Waqf Act, 1995) — धारा 14 (बोर्ड की संरचना एवं विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व), धारा 14(6) (समुदायों का निर्धारण), धारा 20 (सदस्यों को हटाने की शर्तें) एवं धारा 99 (बोर्ड का अधिक्रमण)
    • सामान्य खंड अधिनियम, 1897 — धारा 16 (नियुक्ति की शक्ति में हटाने/वापस लेने की शक्ति का अंतर्निहित होना)
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार)
  • संबद्ध न्यायिक नजीर:
    • महाराष्ट्र राज्य बनाम शेख महमूद व अन्य [State of Maharashtra v. Shaikh Mahemud and Anr.] — ‘राज्य सरकार द्वारा की जाने वाली नियुक्तियों/नामांकनों को वापस लेने या रद्द करने का प्राधिकार उसी सत्ता में निहित होता है जिसने नियुक्ति की थी।’
  • अंतिम परिणाम: सरकारी पुनर्गठन आदेश (Ext.P9) पर अंतरिम रोक लगाने की याचिकाकर्ताओं की प्रार्थना खारिज; नए बोर्ड का कामकाज याचिकाओं के अंतिम निर्णय के अधीन घोषित; नए सदस्यों को नोटिस जारी कर दोनों याचिकाएं आगे की संयुक्त सुनवाई हेतु जनहित याचिका खंडपीठ को संदर्भित।

Waqf Board: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतकेरल उच्च न्यायालय (Kerala High Court)
न्यायाधीशन्यायमूर्ति एस. मनु
याचिकाकर्ताके.एस. हमज़ा (पूर्व अध्यक्ष) और सी.के. उस्मान हाजी (पूर्व सदस्य)
विवादित आदेशकेरल सरकार का 16 अक्टूबर का आदेश (Ext. P9), जिसके तहत पुराने बोर्ड को रद्द कर 9 नए सदस्य नियुक्त किए गए।
संबंधित कानूनसंशोधित वक्फ अधिनियम (Waqf Act) की धारा 14, 20 और 99(1)
मुख्य कानूनी प्रश्नक्या सरकार के पास वक्फ बोर्ड को रद्द/पुनर्गठित करने का अधिकार है और क्या नियुक्ति की शक्ति में हटाने की शक्ति शामिल है?
अदालत का अंतिम आदेशअंतरिम रोक की मांग खारिज; मामले को समान मुद्दों वाली जनहित याचिकाओं (PILs) की सुनवाई कर रही डिवीजन बेंच (Division Bench) को संदर्भित किया गया।
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