Saturday, August 22, 2026
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Death Benefit: पॉलिसी खरीदने के 25 दिन बाद ही पति की मौत…बीमा कंपनी को केस में अदालत ने दिखाया आईना, पढ़िए क्लेम का यह केस

Death Benefit: पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने बीमा कंपनियों द्वारा पहले से बीमारी (Pre-existing Disease) का बहाना बनाकर क्लेम रिजेक्ट करने के रवैये पर एक बेहद कड़ा और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है।

बीमा कंपनी खुद के लगाए आरोप को साबित करना होगा

हाईकोर्ट के जस्टिस जगमोहन बंसल की सिंगल बेंच ने अपने आदेश में साफ कहा कि अगर बीमा कंपनी किसी पॉलिसीधारक पर बीमारी छुपाने का आरोप लगाती है, तो उसे साबित करने की पूरी जिम्मेदारी (Burden of Proof) भी उसी की है। कंपनी केवल बिना दस्तखत वाले दस्तावेजों के आधार पर क्लेम खारिज नहीं कर सकती। कोर्ट ने भारती एक्सा लाइफ इंश्योरेंस (Bharti AXA Life Insurance) की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें कंपनी ने एक विधवा महिला को ₹14.22 लाख का मृत्यु लाभ (Death Benefit) देने के आदेश को चुनौती दी थी।

क्या था पूरा मामला? (The Timeline of Events)

  • 23 मार्च 2018: हरियाणा के समंदर सिंह ने भारती एक्सा लाइफ इंश्योरेंस से एक पॉलिसी ली। इसका सम एश्योर्ड (बीमा राशि) ₹7.11 लाख था और डेथ बेनिफिट ₹14.22 लाख था। उन्होंने ₹63,172 का पहला प्रीमियम चुकाया।
  • 25 अप्रैल 2018 (महज 25 दिन बाद): समंदर सिंह की अचानक दिल का दौरा (Heart Attack) पड़ने से मृत्यु हो गई।
  • 31 मार्च 2019: बीमा कंपनी ने महिला का क्लेम यह कहते हुए खारिज (Repudiate) कर दिया कि उनके पति को फरवरी 2017 से ही ‘स्कैमस सेल कार्सिनोमा’ (एक प्रकार का कैंसर) था और उन्होंने पॉलिसी लेते वक्त इस बात को जानबूझकर छुपाया।
  • 2 अप्रैल 2025: इस फैसले के खिलाफ विधवा महिला स्थायी लोक अदालत (Permanent Lok Adalat – PLA) पहुँची। लोक अदालत ने महिला के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कंपनी को पूरा भुगतान करने का आदेश दिया। इसी आदेश के खिलाफ बीमा कंपनी हाई कोर्ट पहुँची थी।

हाई कोर्ट ने क्यों खारिज की बीमा कंपनी की दलीलें?

  • हाई कोर्ट ने स्थायी लोक अदालत के रिकॉर्ड की जांच करने के बाद पाया कि बीमा कंपनी का पूरा इन्वेस्टिगेशन और सबूत बेहद कमजोर और लापरवाह थे।
  • बिना दस्तखत वाली मेडिकल रिपोर्ट: कंपनी ने कोर्ट में जो मेडिकल रिपोर्ट की फोटोकॉपी पेश की, उस पर किसी भी डॉक्टर के हस्ताक्षर नहीं थे। न ही अस्पताल के किसी सक्षम अधिकारी ने उसे प्रमाणित (Attest) किया था।
  • दस्तावेजों में हेरफेर की आशंका: अदालत ने नोट किया कि बीमा कंपनी द्वारा पेश की गई स्कैन कॉपी में अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग सीआर नंबर (CR Numbers – केस रिकॉर्ड नंबर) दर्ज थे, जिससे सबूतों की विश्वसनीयता खत्म हो गई।
  • मौत के कारण और बीमारी में कोई संबंध नहीं: कोर्ट ने सबसे तार्किक बात यह कही कि बीमा कंपनी यह साबित करने में पूरी तरह नाकाम रही कि जिस बीमारी (कैंसर) का वे दावा कर रहे हैं, उसका मौत के वास्तविक कारण (दिल का दौरा) से क्या संबंध था।

स्थायी लोक अदालत ने स्पष्ट दर्ज किया है कि बीमा कंपनी यह साबित करने में विफल रही कि मृतक कैंसर से पीड़ित था। ऐसे संदिग्ध और बिना हस्ताक्षर वाले कागजों के आधार पर लोक अदालत के आदेश में कोई बदलाव नहीं किया जा सकता। -जस्टिस जगमोहन बंसल, पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट

केस का संक्षिप्त विवरण (Case Matrix at a Glance)

मुख्य कानूनी बिंदुकेस विवरण और अदालत का स्टैंड
मामलापॉलिसी लेने के 25 दिन बाद मौत पर क्लेम देने का विवाद।
मृतक पॉलिसीधारकसमंदर सिंह (मृत्यु: 25 अप्रैल 2018 – कारण: हार्ट अटैक)।
बीमा कंपनी का आरोपमरीज को 2017 से कैंसर था, जिसे उसने छुपाया (Suppression of Material Fact)।
अदालत का फैसलाकंपनी का आरोप साबित नहीं हुआ; सबूत के तौर पर दी गई मेडिकल रिपोर्ट फर्जी/अधूरी थी।
अंतिम आदेश₹14.22 लाख का पूरा भुगतान विधवा पत्नी को तुरंत करना होगा।

आम ग्राहकों के लिए सबक (Analysis & Takeaway)

यह फैसला देश के करोड़ों बीमा धारकों के लिए एक बड़ी ढाल है। अक्सर देखा जाता है कि बीमा कंपनियां प्रीमियम लेते वक्त मेडिकल टेस्ट के नाम पर ढिलाई बरतती हैं, लेकिन जैसे ही क्लेम देने की बारी आती है (विशेषकर अगर मौत पॉलिसी लेने के तुरंत बाद हो जाए), तो वे पुराने रिकॉर्ड खंगालने लगती हैं। पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि उपभोक्ता अदालतों या लोक अदालतों के तार्किक फैसलों में हाई कोर्ट तब तक दखल नहीं देगा, जब तक कि बीमा कंपनी के पास पुख्ता और कानूनी रूप से प्रमाणित डिजिटल या फिजिकल सबूत न हों।

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