केस मैट्रिक्स: Calcutta High Court Ruling on Identity Documents & Citizenship
| पहलू | विवरण |
| संबंधित अदालत | कलकत्ता उच्च न्यायालय (Calcutta High Court) |
| माननीय पीठ | जस्टिस देबांग्सु बसाक एवं जस्टिस अजय कुमार गुप्ता |
| मामले का नाम | सुमन मोल्ला बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (Suman Molla v. State of WB) |
| मुख्य कानूनी सिद्धांत | आधार कार्ड, पैन कार्ड, बैंक अकाउंट और वोटर कार्ड नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं हैं |
| याचिका का प्रकार | बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) — खारिज की गई |
| कानूनी प्रतिनिधित्व | याचिकाकर्ता: एडवोकेट मोकरम हुसैन, रज्जाक हुसैन राज्य सरकार: एडवोकेट दिबाशीष बासु केंद्र सरकार: वरिष्ठ अधिवक्ता सौविक नंदी |
Identity Documents: कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि आधार कार्ड (Aadhaar Card), पैन कार्ड (PAN Card) या बैंक खाता नागरिकता का अचूक प्रमाण नहीं हो सकते।
यह फैसला जस्टिस देबांग्सु बसाक (Justice Debangsu Basak) और जस्टिस अजय कुमार गुप्ता (Justice Ajay Kumar Gupta) की पीठ ने सुमन मोल्ला बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (Suman Molla v. The State of West Bengal and Ors) मामले में सुनाया। कोर्ट ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान नाम हटाए जाने के बाद हिरासत में लिए गए एक व्यक्ति की रिहाई की मांग करने वाली बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Habeas Corpus Petition) को खारिज कर दिया।
कलकत्ता हाई कोर्ट के फैसले के मुख्य बिंदु
अदालत ने याचिकाकर्ता (हिरासत में लिए गए व्यक्ति के रिश्तेदार) द्वारा पेश किए गए कई दस्तावेजों की जांच की, लेकिन उन्हें नागरिकता साबित करने के लिए अपर्याप्त पाया।
कलकत्ता हाई कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी: आधार कार्ड (Aadhaar Card) स्वयं भारतीय नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं हो सकता। इसी प्रकार आयकर विभाग द्वारा जारी स्थायी खाता संख्या (PAN Card) या किसी बैंक में खाता खोलना भी भारतीय नागरिकता का प्रमाण नहीं है। पुराना वोटर आईडी कार्ड केवल मतदाता सूची में उसके नामांकन का प्रमाण था, जिससे अब उसका नाम हटाया जा चुका है। इसलिए केवल वोटर कार्ड भी नागरिकता का अचूक साक्ष्य नहीं है।
मामला क्या था?: विसंगतियां और पुलिस जांच
- SIR प्रक्रिया और हिरासत: विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision) के तहत निर्वाचक नियमावली से नाम हटने के बाद संबंधित व्यक्ति को हिरासत में लिया गया था। गृह मंत्रालय (Ministry of Home Affairs) के परिपत्र के अनुसार की गई राज्य सरकार की जांच में उसे बांग्लादेशी नागरिक पाया गया।
- कागजातों में नाम का अंतर: कोर्ट ने नोट किया कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति का जन्म प्रमाण पत्र पेश नहीं किया गया और अलग-अलग दस्तावेजों में उसके पिता का नाम भिन्न-भिन्न पाया गया।
- वकील और रिश्तेदारी में विरोधाभास: याचिकाकर्ता (सुमन मोल्ला) ने पुलिस शिकायत में खुद को हिरासत में लिए गए व्यक्ति का चचेरा भाई बताया था, जबकि हाई कोर्ट में दाखिल रिट याचिका में उसने खुद को उसका चाचा घोषित किया।
- अभिभावकों के अंतिम संस्कार स्थल की जानकारी न होना: सुनवाई के दौरान जब कोर्ट ने व्यक्ति से उसके माता-पिता के भारत में अंतिम संस्कार स्थल/कब्र के बारे में पूछा, तो वह और याचिकाकर्ता स्थान की पहचान करने में विफल रहे। कोर्ट ने इस पर प्रतिकूल निष्कर्ष (Adverse Inference) निकालते हुए माना कि उसके माता-पिता भारतीय नागरिक नहीं थे।
भूमि रिकॉर्ड और रिश्तेदार के पासपोर्ट की स्थिति
याचिकाकर्ता ने हिरासत में लिए गए व्यक्ति के परदादा और दादा के भूमि रिकॉर्ड तथा उसकी बुआ के पासपोर्ट का हवाला भी दिया था। हालांकि, अदालत ने माना कि इन दस्तावेजों के आधार पर वंशक्रम (Citizenship by Descent) के जरिए उसकी भारतीय नागरिकता निर्णायक रूप से स्थापित नहीं होती है।

