Saturday, September 19, 2026
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Influence With Judges: जजों के नाम पर पक्षकारों से सौदेबाजी करनेवाले आरोपी जीतू के साथ क्या हुआ….ठग पर फैसला यह हुआ

Influence With Judges: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने उच्च न्यायपालिका के जजों के नाम पर मुकदमों के पक्षकारों (Litigants) से सौदेबाजी करने और मनमाफिक अदालती आदेश दिलाने का झांसा देकर लाखों रुपये ठगने वाले गिरोहों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है।

आरोपी जितेंद्र सिंह उर्फ जीतू की नियमित जमानत याचिका खारिज

हाई कोर्ट के जस्टिस विनोद एस. भारद्वाज की एकल पीठ ने मामले के एक सह-आरोपी जितेंद्र सिंह उर्फ जीतू की नियमित जमानत याचिका (Regular Bail Plea) को पूरी तरह खारिज करते हुए यह महत्वपूर्ण विधिक व्यवस्था दी। आरोपी के खिलाफ पलवल (हरियाणा) के बहीन थाने में जालसाजी और धोखाधड़ी की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि न्यायपालिका में ‘सेटिंग’ या प्रभाव (Influence) का झूठा दावा कर ठगी करना केवल एक साधारण धोखाधड़ी नहीं है, बल्कि यह देश की पूरी न्याय वितरण प्रणाली (Justice Delivery System) की साख और पवित्रता पर सीधा हमला है।

न्यायिक व्यवस्था की साख पर टिप्पणी

अदालत ने न्यायिक व्यवस्था की साख पर टिप्पणी करते हुए अपने विधिक आदेश में कहा, न्याय का यह संस्थान अपनी वैधता और शक्ति आम जनता के विश्वास (Public Confidence) से प्राप्त करता है। अदालती कामकाज और जजों पर झूठा प्रभाव होने का ढोंग रचकर भोले-भाले पक्षकारों का शोषण करना न्याय प्रशासन की नींव को हिला देता है। शिकायतकर्ता से जितनी बड़ी रकम ऐंठी गई है और जिस तरह के गंभीर आरोप हैं, वे किसी आकस्मिक कृत्य को नहीं, बल्कि एक सोची-समझी और व्यवस्थित साजिश (Calculated and Systematic Design) को दर्शाते हैं।

मामला क्या था? (पिता की नौकरी का मामला और ₹28.5 लाख की ठगी)

नौकरी का झांसा: यह पूरा मामला वर्ष 2021 में दर्ज एक आपराधिक एफआईआर (FIR No. 169) से जुड़ा हुआ है। शिकायतकर्ता के पिता का एक सर्विस मैटर (Service Matter – नौकरी से जुड़ा विवाद) पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में लंबित था। मुख्य आरोपियों ने शिकायतकर्ता को विश्वास दिलाया कि उनकी हाई कोर्ट के जजों के साथ गहरी विधिक और व्यक्तिगत ‘सेटिंग’ है और वे उसके पक्ष में फैसला करा देंगे।

किश्तों में वसूली: पक्ष में आदेश दिलाने के नाम पर आरोपियों ने शिकायतकर्ता से किश्तों में कुल ₹28.5 लाख की भारी-भरकम राशि ऐंठ ली।

फर्जी अदालती आदेश और चेक: ठगी को छिपाने के लिए आरोपियों ने हद पार करते हुए हाई कोर्ट के फर्जी और जाली अदालती आदेश (Forged Court Orders) तैयार किए। यही नहीं, राजस्व विभाग (Revenue Department) के नाम का एक ₹98 लाख का जाली चेक भी शिकायतकर्ता को दिखाया गया। बाद में जब पीड़ित को पता चला कि कोर्ट से ऐसा कोई आदेश जारी ही नहीं हुआ है, तो उसने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।

अदालत में विधिक बहस: ‘ड्राइवर’ होने का तर्क खारिज

बचाव पक्ष (याचिकाकर्ता) का तर्क

आरोपी जितेंद्र सिंह उर्फ जीतू के वकील ने दलील दी कि उनका मुवक्किल मुख्य आरोपी के पास केवल एक ड्राइवर (Driver) के रूप में काम करता था। उसका धोखाधड़ी, जालसाजी या किसी को उकसाने में कोई सीधा रोल नहीं है, बल्कि केवल मुख्य आरोपी के साथ जुड़े होने के कारण उसे झूठा फंसाया गया है। वह पिछले लगभग एक साल से जेल (Custody) में है, इसलिए उसे जमानत दी जानी चाहिए।

अभियोजन (राज्य सरकार) का विरोध

राज्य के सरकारी वकील ने जमानत का पुरजोर विरोध करते हुए कहा कि यह एक संगठित धोखाधड़ी (Organized Fraud) का मामला है। याचिकाकर्ता केवल ड्राइवर नहीं था, बल्कि वह शिकायतकर्ता से पैसे वसूलने (कलेक्शन) और उसे बार-बार यह भरोसा दिलाने में सक्रिय रूप से शामिल था कि जजों पर प्रभाव के जरिए काम पक्का हो जाएगा।

हाई कोर्ट का अंतिम विधिक निष्कर्ष

जस्टिस विनोद एस. भारद्वाज ने बचाव पक्ष के ‘ड्राइवर’ होने के तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया। कोर्ट ने पाया कि प्रथम दृष्टया (Prima Facie) यह एक “सुनियोजित योजना” (Well-orchestrated scheme) थी। याचिकाकर्ता की सक्रिय भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मामले के वर्तमान चरण (Stage of proceedings) और समाज पर इसके पड़ने वाले व्यापक नकारात्मक प्रभाव को देखते हुए कोर्ट ने आरोपी को कोई भी विधिक राहत या नरमी देने से साफ इनकार कर दिया।

विधिक एवं केस सारांश (Case Matrix)

विधिक बिंदुपंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का विधिक निर्णय
याचिकाकर्ता (अभियुक्त)जितेंद्र सिंह उर्फ जीतू (नियमित जमानत का आकांक्षी)।
संबंधित थाना/जिलापुलिस स्टेशन बहीन, जिला पलवल (हरियाणा)।
आईपीसी की धाराएंधारा 420 (धोखाधड़ी), 406, 467, 468, 471 (जालसाजी) और 120-B (साजिश)।
सुनवाई करने वाले जजजस्टिस विनोद एस. भारद्वाज।
मुख्य कानूनी सिद्धांतजजों के नाम पर बिचौलिया बनकर ठगी करना न्याय प्रणाली की शुद्धता को दूषित करता है; ऐसे मामलों में जमानत नहीं दी जा सकती।
अदालत का अंतिम आदेशनियमित जमानत याचिका पूरी तरह खारिज (Dismissed)।
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