Friday, June 19, 2026
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Interim Maintenance: 60 हजार कमाने वाली पत्नी को 1 लाख कमाने वाले पति से नहीं मिलेगा गुजारा भत्ता…पढ़िए यह विधिक सिद्धांत ध्यान से

Interim Maintenance: दिल्ली की एक अदालत ने वैवाहिक विवादों में अंतरिम गुजारा भत्ते के विधिक सिद्धांतों को बेहद स्पष्ट करते हुए एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है।

पत्नी की खुद के लिए भत्ते की मांग ठुकरा दी

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (Additional Sessions Judge) भूपिंदर सिंह की अदालत ने वैवाहिक विवाद से उपजीं दो क्रॉस-अपीलों (पति और पत्नी दोनों की याचिकाओं) को खारिज करते हुए यह विधिक व्यवस्था दी। जहां एक ओर अदालत ने ₹60,000 से अधिक कमाने वाली पत्नी की खुद के लिए भत्ते की मांग ठुकरा दी, वहीं दूसरी ओर नाबालिग बेटी के लिए तय ₹14,000 प्रति माह के बाल सहायता (Child Support) आदेश को पूरी तरह बरकरार रखा। अदालत ने कहा है कि यदि पत्नी आर्थिक रूप से स्वतंत्र (Financially Independent) है और अच्छी कमाई कर रही है, तो केवल इस आधार पर उसे गुजारा भत्ता नहीं दिया जा सकता कि उसके पति की आय उससे अधिक है। वित्तीय सहायता कोई स्वचालित अधिकार (Automatic Entitlement) नहीं है।

मामला क्या था? (कमाई का अंतर और बच्चे के खर्च का विवाद)

पत्नी का दावा: यह विधिक विवाद एक अलग रह रहे जोड़े के बीच आय और जिम्मेदारियों के संतुलन से जुड़ा है। पत्नी ने अदालत से अंतरिम गुजारा भत्ते की मांग करते हुए तर्क दिया था कि उसके पति की मासिक आय ₹1 लाख से अधिक है, इसलिए उसे वित्तीय सहायता मिलनी चाहिए।

पति की चुनौती: दूसरी ओर, पति ने अपनी नाबालिग बेटी को दिए जाने वाले गुजारे भत्ते को अदालत में चुनौती दी थी। उसका तर्क था कि चूंकि बच्ची की मां (पत्नी) खुद अच्छा कमा रही है, इसलिए बेटी के लिए तय की गई रकम अत्यधिक है और इसमें मां की कमाई को नजरअंदाज किया गया है।

अदालत का विधिक विश्लेषण और महत्वपूर्ण सिद्धांत

अदालत ने दोनों पक्षों के तर्कों को खारिज करते हुए पति और पत्नी के विधिक दायित्वों पर तीन मुख्य बातें स्पष्ट कीं।

आत्मनिर्भर पत्नी के लिए गुजारा भत्ता ‘नियम’ नहीं

जज भूपिंदर सिंह ने पाया कि महिला सुशिक्षित है और वर्तमान में ₹60,000 प्रति माह से अधिक की नियमित और अच्छी आय अर्जित कर रही है। अदालत ने स्पष्ट किया। कहा, अंतरिम गुजारा भत्ता केवल एक तय ढर्रे या औपचारिकता के रूप में सिर्फ इसलिए नहीं दिया जा सकता क्योंकि एक जीवनसाथी दूसरे से अधिक कमाता है। जब पत्नी खुद वित्तीय रूप से सक्षम हो, तो गुजारा भत्ते पर उसका कोई स्वचालित विधिक अधिकार नहीं बनता।

बाल सहायता ‘भविष्य के निवेश’ के लिए नहीं, ‘वर्तमान आवश्यकताओं’ के लिए है

पति ने एक अनोखा तर्क दिया था कि बेटी के भत्ते की राशि को नियमित खर्च करने के बजाय उसके भविष्य के लिए फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) या सेविंग्स अकाउंट में रख दिया जाना चाहिए। अदालत ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा, गुजारा भत्ते का मूल उद्देश्य बच्चे की ‘वर्तमान और आवर्ती’ (Present and Recurring) जरूरतों को पूरा करना है। यदि पूरी रकम को निवेश में लगा दिया जाएगा, तो भत्ते का विधिक उद्देश्य ही विफल हो जाएगा। एक बढ़ते बच्चे की जरूरतें सिर्फ पढ़ाई तक सीमित नहीं होतीं; उसमें भोजन, कपड़े, स्वास्थ्य, परिवहन और रोजमर्रा के खर्च शामिल होते हैं।”

कस्टोडियल पैरेंट का योगदान केवल मौद्रिक (Monetary) नहीं होता

अदालत ने रेखांकित किया कि जो माता-पिता बच्चे को अपने पास रखते हैं (Custodial Parent), वे केवल पैसा खर्च नहीं करते, बल्कि बच्चे की निरंतर देखभाल, समय और देखरेख के रूप में बहुत बड़ा योगदान देते हैं। इसलिए, यदि गैर-कस्टोडियल पैरेंट (जिसके पास बच्चा नहीं है) की आय काफी अधिक है, तो उससे बच्चे के लिए थोड़ा बड़ा वित्तीय योगदान मांगना कहीं से भी अनुचित नहीं है।

मुलाकात (Visitation) विवाद के कारण बच्चे का हक नहीं छीना जा सकता

पति का एक आरोप यह भी था कि पत्नी उसे बेटी से मिलने नहीं देती, इसलिए भत्ते की रकम पर भरोसा नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट विधिक व्यवस्था दी कि बच्चे का भत्ते का अधिकार, माता-पिता के बीच कस्टडी या मुलाकात के विवादों पर निर्भर नहीं करता। इन विवादों के लिए अलग कानूनी कार्यवाही की जानी चाहिए, इसे बच्चे का वित्तीय समर्थन रोकने का हथियार नहीं बनाया जा सकता।

विधिक एवं केस सारांश (Case Matrix)

विधिक बिंदुदिल्ली सत्र न्यायालय का विधिक रुख
मामले की प्रकृतिघरेलू हिंसा/भरण-पोषण विवाद से उपजी विधिक क्रॉस-अपीलें।
सुनवाई करने वाले जजअतिरिक्त सत्र न्यायाधीश भूपिंदर सिंह (दिल्ली)।
पत्नी की वित्तीय स्थितिसुशिक्षित, कार्यरत और ₹60,000+/माह की आय (निर्णय: व्यक्तिगत भत्ता नामंजूर)।
पति की वित्तीय स्थिति₹1,00,000+/माह की आय।
बेटी के लिए आदेश₹14,000/माह (5% वार्षिक वृद्धि के साथ) का आदेश बरकरार।
स्थापित विधिक सिद्धांत1. पत्नी आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो तो स्वतः भत्ता नहीं मिलता।
2. बाल सहायता बच्चे की तात्कालिक जरूरतों के लिए है, न कि भविष्य के निवेश के लिए।
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