Friday, October 9, 2026
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Motor Vehicles Act: करंट लगने से हुई मौत के मामलों में मोटर वाहन अधिनियम का ‘मल्टीप्लायर मेथड’ लागू नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

केस अवलोकन (Case Snapshot)

पहलूविवरण
अदालतसर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठन्यायमूर्ति संजय करोल एवं न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह
मूल अधिनियमविद्युत अधिनियम, 2003 बनाम मोटर वाहन अधिनियम, 1988
मुख्य सिद्धांतबिजली दुर्घटनाओं में मुआवजा तय करने के लिए MV Act का Multiplier Method लागू नहीं होगा।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि बिजली का करंट लगने (Electrocution) से हुई मौत या गंभीर चोट के मामलों में मुआवजा तय करने के लिए मोटर वाहन अधिनियम, 1988 (Motor Vehicles Act) के तहत इस्तेमाल होने वाले ‘मल्टीप्लायर मेथड’ (Multiplier Method) को लागू नहीं किया जा सकता।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कर्नाटक पावर ट्रांसमिशन कॉरपोरेशन (KPTCL) द्वारा दायर अपील को स्वीकार करते हुए उच्च न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें मोटर वाहन दुर्घटना दावों की तर्ज पर मुआवजा तय किया गया था।

मुख्य कानूनी बिंदु व सिद्धांत

  • विद्युत अधिनियम बनाम मोटर वाहन अधिनियम: पीठ ने रेखांकित किया कि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 में मुआवजे की गणना का पूरा ढांचा ‘मल्टीप्लायर’ पर आधारित है। इसे विद्युत अधिनियम, 2003 (Electricity Act, 2003) के मामलों में यथावत (Mutatis Mutandis) लागू नहीं किया जा सकता।
  • विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 57: न्यायालय ने कहा कि विद्युत अधिनियम की धारा 57 बिजली वितरण लाइसेंसधारक (Licensee) को कुछ परिस्थितियों में मुआवजा देने के लिए उत्तरदायी तो बनाती है, लेकिन यह मुआवजे की गणना के लिए कोई विशिष्ट फॉर्मूला या मल्टीप्लायर विधि निर्धारित नहीं करती।
  • पूर्व नजीर का हवाला: शीर्ष अदालत ने अपने 2014 के रमन बनाम उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम लिमिटेड मामले के फैसले का संदर्भ देते हुए दोहराया कि करंट लगने के मामलों में मुआवजे के निर्धारण के लिए मल्टीप्लायर पद्धति का उपयोग नहीं किया जा सकता।

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उच्च न्यायालय की टिप्पणी

न्यायमूर्ति संजय करोल द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया: करंट लगने के मामलों में मुआवजा निर्धारित करने के लिए मल्टीप्लायर पद्धति लागू नहीं की जा सकती। चूंकि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 से जुड़ी गणना पद्धति पूरी तरह मल्टीप्लायर पर निर्भर है, इसलिए उस व्यवस्था को करंट लगने के मामलों में उसी रूप में लागू नहीं किया जा सकता था, जैसा कि उच्च न्यायालय ने विवादित फैसले में किया है। यह कानून की बात है कि विद्युत अधिनियम, 2003 मुआवजे की गणना की विधि प्रदान नहीं करता। यह केवल धारा 57 के तहत कुछ परिदृश्यों में लाइसेंसधारक के मुआवजे के दायित्व का प्रावधान करता है, लेकिन इसकी गणना की विधि के बारे में कुछ नहीं कहता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला करंट लगने की दो अलग-अलग घटनाओं से जुड़ा था:

  1. 11 केवी लाइन से मौत: एक व्यक्ति 11 केवी (11 KV) ट्रांसमिशन लाइन के संपर्क में आ गया था, जिससे उसकी मौत हो गई।
  2. 66 केवी लाइन से गंभीर चोट: एक अन्य व्यक्ति क्रिकेट की गेंद उठाते समय 66 केवी (66 KV) हाई-टेंशन लाइन के संपर्क में आने से गंभीर रूप से झुलस गया था।

पीड़ितों/दावेदारों ने मुआवजे की मांग को लेकर उच्च न्यायालय में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिकाएं दायर की थीं। उच्च न्यायालय ने तथ्यों से जुड़े विवादित सवालों को नजरअंदाज करते हुए रिट याचिकाओं को स्वीकार कर लिया था और मोटर वाहन अधिनियम की तर्ज पर ‘मल्टीप्लायर फॉर्मूला’ लगाकर मुआवजे का भुगतान करने का आदेश दिया था।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक पावर ट्रांसमिशन कॉरपोरेशन की अपील स्वीकार करते हुए उच्च न्यायालय के आदेश को रद्द कर दिया और स्पष्ट किया कि विद्युत अधिनियम के तहत मामलों में मोटर वाहन दावों वाले गणितीय फॉर्मूले को जबरन लागू करना कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण है।

फैसले के मुख्य बिंदु और कानूनी तर्क

  1. कानूनी तंत्र में भिन्नता
    • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत मुआवजे की गणना पूरी तरह से मल्टीप्लायर प्रणाली पर आधारित है। इसे बिजली अधिनियम, 2003 (Electricity Act, 2003) के मामलों में सीधे लागू (Mutatis Mutandis) नहीं किया जा सकता।
    • विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 57 लाइसेंसधारी कंपनी की जवाबदेही और मुआवजा देने का प्रावधान तो करती है, लेकिन मुआवजा किस पद्धति/फार्मूले से निकाला जाएगा, इसका उल्लेख अधिनियम में नहीं है।
  2. कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला रद्द
    • हाईकोर्ट ने बिजली की चपेट में आने से हुई मौत और गंभीर चोट के रिट याचिकाओं में मोटर वाहन अधिनियम के मल्टीप्लायर फार्मूले का इस्तेमाल करते हुए मुआवजे की राशि तय की थी।
    • सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस दृष्टिकोण को गलत ठहराते हुए उसके फैसले को रद्द कर दिया।
  3. पूर्व निर्णयों का हवाला
    • पीठ ने अपने रमन बनाम उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम लिमिटेड (2014) के फैसले का हवाला देते हुए दोहराया कि बिजली हादसों में क्षतिपूर्ति राशि तय करने का दायरा और तरीका मोटर दुर्घटना दावों से भिन्न है।
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