हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी तर्क
- बच्चे का कल्याण सर्वोपरि (Welfare of the Child): न्यायमूर्ति गौरी गोडसे ने अपने आदेश में कहा:“भारतीय कानून में बच्चों की कस्टडी और अभिभावकता को नियंत्रित करने वाला वैधानिक ढांचा संयुक्त पालन-पोषण (Joint Parenting) की अवधारणा को मान्यता नहीं देता है। कानून में समान पालन-पोषण का कोई अनिवार्य अधिकार नहीं है; भारतीय कानून का मुख्य आधार नाबालिग बच्चे का कल्याण है।” — बॉम्बे हाईकोर्ट
- संयुक्त पालन-पोषण के लिए आपसी सहमति अनिवार्य: अदालत ने माना कि यदि माता-पिता के बीच आपसी समझ और सहयोग नहीं है, तो जबरन जॉइंट पैरेंटिंग लागू करने से बच्चे पर प्रतिकूल मनोवैज्ञानिक प्रभाव (Adverse Psychological Impact) पड़ेगा। फैमिली कोर्ट ने यह देखने में चूक की कि क्या यह व्यवस्था व्यावहारिक थी या नहीं।
- कस्टडी वाले माता-पिता की जिम्मेदारी: हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि जिस माता-पिता के पास कस्टडी है (वर्तमान में मां), उसकी यह कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी है कि वह बच्चे को दूसरे माता-पिता (पिता) से मिलने और समय बिताने के लिए सौहार्दपूर्ण माहौल बनाए।
मुंबई: बॉम्बे हाईकोर्ट ने बच्चे की कस्टडी (Child Custody), गार्जियनशिप और माता-पिता के अधिकारों पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक व्यवस्था दी है।
न्यायमूर्ति गौरी गोडसे की एकल पीठ ने 14 वर्षीय बालक की कस्टडी को लेकर फैमिली कोर्ट द्वारा पारित 50-50 संयुक्त पालन-पोषण के आदेश को निरस्त (Set Aside) कर दिया और मामले को नए सिरे से निष्पक्ष सुनवाई हेतु फैमिली कोर्ट को वापस भेज दिया। अदालत ने स्पष्ट किया है कि भारतीय वैधानिक ढांचे में ‘जॉइंट पेरेंटिंग’ (संयुक्त पालन-पोषण) की कोई बाध्यकारी या संहिताबद्ध विधिक अवधारणा नहीं है। अदालत ने माना कि उचित संरचना और माता-पिता की आपसी सहमति के बिना 50:50 कस्टडी का आदेश बच्चे पर प्रतिकूल मनोवैज्ञानिक प्रभाव डाल सकता है और नए विवादों को जन्म दे सकता है।
उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां
1. ‘संयुक्त पालन-पोषण’ कोई बाध्यकारी वैधानिक अवधारणा नहीं भारतीय कानून में बच्चे की कस्टडी के मूल सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए न्यायमूर्ति गौरी गोडसे ने कहा: “भारतीय कानून में, बच्चे की कस्टडी और गार्जियनशिप को नियंत्रित करने वाला वैधानिक ढांचा संयुक्त पालन-पोषण (Joint Parenting) की अवधारणा को मान्यता नहीं देता है। यहां समान पेरेंटिंग (Equal Parenting) की कोई बाध्यता नहीं है, और भारतीय कानून में कस्टडी का एकमात्र विधिक आधार केवल नाबालिग बच्चे का कल्याण (Welfare of the Minor Child) है।”
- अदालत ने रेखांकित किया कि बिना किसी स्पष्ट और व्यावहारिक संरचना के संयुक्त पालन-पोषण की योजना लागू करने से जटिलताएं पैदा हो सकती हैं, जिसका बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ सकता है।
2. कस्टडी सौदेबाजी का विषय नहीं (पिता के असंवेदनशील रवैये पर टिप्पणी)
- पिता ने तर्क दिया था कि सहमति की शर्तों (Consent Terms) के तहत मां ने ₹8 लाख और घर में हिस्से के बदले बच्चे की कस्टडी छोड़ दी थी।
- हाईकोर्ट ने इसे पिता का ‘असंवेदनशील दृष्टिकोण’ करार देते हुए कहा:“सहमति शर्तों में लिखी गई नियमित बातों का यह अर्थ कतई नहीं निकाला जा सकता कि मां ने किसी वित्तीय प्रतिफल (Consideration) के बदले बच्चे की कस्टडी छोड़ दी थी।”
3. दूसरे माता-पिता से मिलने में सहयोग कस्टोडियल पेरेंट का कर्तव्य
- अदालत ने निर्देश दिया कि जिस माता या पिता के पास बच्चे का भौतिक वास (Physical Custody) है, उसका यह कर्तव्य है कि वह बच्चे को दूसरे पक्ष से मिलने और समय बिताने के लिए सहज बनाए।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (14 वर्षीय बालक की कस्टडी विवाद)
- विवाह विच्छेद व आरंभिक कस्टडी: माता-पिता के अलग होने के बाद बच्चा 4 वर्ष की उम्र तक मां के पास रहा। मार्च 2015 में पिता ने तलाक की अर्जी दाखिल की और 2016 में बच्चे को अपनी मां के घर ले गया। जुलाई 2017 में बच्चा दोबारा मां को सौंपा गया।
- 2019 की संशोधित शर्तें: दिसंबर 2019 में संशोधित सहमति शर्तों के तहत पिता को कस्टडी मिली, लेकिन उसमें मां से मिलने का कोई प्रावधान नहीं था। बाद में नवंबर 2021 में मां को हर दो महीने में दो रातों के लिए मिलने और आधी छुट्टियों में बच्चे को साथ रखने की अनुमति दी गई।
- फैमिली कोर्ट का 50:50 आदेश (20 सितंबर 2024): फैमिली कोर्ट ने मां की अर्जी पर सुनवाई करते हुए संयुक्त पालन-पोषण और छुट्टियों का 50-50 विभाजन का आदेश दिया, जिसके खिलाफ दोनों पक्षों ने हाईकोर्ट में क्रॉस-याचिकाएं दायर की थीं।
हाईकोर्ट की अंतरिम व्यवस्था व निर्देश
उच्च न्यायालय ने फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए मामले के अंतिम निस्तारण तक निम्नलिखित अंतरिम व्यवस्था लागू की है:
- मां के पास अंतरिम कस्टडी: जब तक फैमिली कोर्ट नए सिरे से निर्णय नहीं ले लेती, तब तक बच्चा मां की कस्टडी में रहेगा।
- पिता को मिलने का अधिकार (Visitation Rights): पिता को दिवाली, क्रिसमस और गर्मियों की छुट्टियों के पहले आधे हिस्से में बच्चे को अपने साथ रखने का अधिकार होगा, साथ ही प्रत्येक वैकल्पिक सप्ताहांत (Every alternate weekend) पर बच्चा पिता के साथ रह सकेगा।
- खर्चों का समान विभाजन: बच्चे की शिक्षा, चिकित्सा और दैनिक पालन-पोषण के सभी खर्चों को माता-पिता दोनों 50-50 (समान रूप से) वहन करेंगे।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: रिट याचिका (पारिवारिक न्यायालय के कस्टडी आदेश को चुनौती)
- प्रासंगिक कानून: हिंदू अल्पसंख्यक और संरक्षकता अधिनियम, 1956 (HMGA) की धारा 13; गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट, 1890 (GWA) की धारा 7 व 17; ‘बच्चे का सर्वोत्तम हित’ सिद्धांत (Welfare of the Child)
- पीठ: न्यायमूर्ति गौरी गोडसे (बॉम्बे उच्च न्यायालय)
Joint Parenting: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | बॉम्बे उच्च न्यायालय (Bombay High Court) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति गौरी गोडसे (Justice Gauri Godse) |
| संबंधित कानून | हिंदू अल्पसंख्यक और अभिभावकता अधिनियम / गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट |
| मुख्य बिंदु | भारतीय कानून में ‘समान माता-पिता अधिकार’ (Equal Parenting) का अधिकार नहीं है; बच्चे का कल्याण (Child’s Welfare) सर्वोपरि है। |
| अंतरिम व्यवस्था | फैमिली कोर्ट का नया फैसला आने तक बच्चा मां के पास रहेगा; पिता को छुट्टियों के पहले आधे हिस्से और हर दूसरे सप्ताहांत (Weekend) पर मिलने का अधिकार होगा। |

