Saturday, November 7, 2026
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E-Commerce: क्या केवल ऑनलाइन विज्ञापन या डिलीवरी से दिल्ली में क्षेत्राधिकार बनेगा?; फुल बेंच अपीलीय अदालत नहीं है, एकल पीठ के फैसले को अपील में चुनौती दें

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मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी बहस

  1. संदर्भ की उत्पत्ति (Hindustan Unilever v. Kwick Living):यह कानूनी संदर्भ मुख्य रूप से सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) की धारा 20 और विशेष ट्रेडमार्क/कॉपीराइट अधिनियमों के क्षेत्राधिकार संबंधी प्रावधानों के बीच परस्पर क्रिया से उपजा है। मुद्दा यह है कि क्या ऑनलाइन विज्ञापनों, ई-कॉमर्स बिक्री, या केवल वेबसाइट पहुंच के माध्यम से उत्पन्न होने वाले ‘कॉज़ ऑफ़ एक्शन’ (Cause of Action) के आधार पर दिल्ली की अदालतों को मुकदमा सुनने का अधिकार बनता है या नहीं।
  2. वकीलों द्वारा उठाई गई मुख्य आपत्तियां:
    • अटकते मुकदमे: अधिवक्ता साईकृष्ण राजगोपाल ने चिंता जताई कि सिंगल जज के फैसले के कारण लंबित IP मुकदमों की सुनवाई ठप हो गई है।
    • इन्वेस्टिगेशन साक्ष्य और Banyan Tree नज़ीर: अधिवक्ता श्वेताश्री मजूमदार ने दलील दी कि वादी के निजी अन्वेषक (Plaintiff’s Investigator) द्वारा एकत्रित साक्ष्य या ऑनलाइन खरीद को स्वचालित रूप से क्षेत्राधिकार देने से इनकार करने का आधार नहीं माना जाना चाहिए।
    • बिना लेनदेन के उल्लंघन: वरिष्ठ अधिवक्ता चंदर एम. लाल ने तर्क दिया कि मानहानिकारक विज्ञापन या कॉपीराइट के अनधिकृत प्रसारण के मामलों में किसी पूर्ण व्यावसायिक लेनदेन (Completed Commercial Transaction) की आवश्यकता नहीं होती, फिर भी उल्लंघन (Infringement) घटित होता है। धारा 20(c) CPC के तहत जहां अंशतः भी कॉज़ ऑफ़ एक्शन उत्पन्न होता है, वहां मुकदमा दायर किया जा सकता है।
  3. Forum Non Conveniens का प्रयोग:सिंगल जज ने अपने 3 नवंबर के फैसले में Forum Non Conveniens के सिद्धांत का हवाला दिया था, जिसके तहत अदालत क्षेत्राधिकार होने के बावजूद मामले को अधिक उपयुक्त मंच (Appropriate Forum) पर भेजने का अधिकार रखती है। वकीलों ने तर्क दिया कि भारत में वैधानिक क्षेत्राधिकार को इस प्रशासनिक सिद्धांत के आधार पर संकुचित नहीं किया जाना चाहिए।

मुख्य विधिक व क्षेत्राधिकार संबंधी निष्कर्ष

1. डिजिटल युग में IP मुकदमों का प्रादेशिक क्षेत्राधिकार:

यह मामला ई-कॉमर्स और डिजिटल विज्ञापनों के दौर में यह तय करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है कि क्या केवल किसी वेबसाइट का दिल्ली में एक्सेस होना या ऑनलाइन सामान की डिलीवरी होना दिल्ली हाईकोर्ट को मुकदमा सुनने का क्षेत्राधिकार देता है या इसके लिए अधिक मजबूत प्रादेशिक संबंध (Substantial Territorial Connection) आवश्यक है।

2. अपीलीय अधिकार बनाम वैधानिक संदर्भ:

फुल बेंच ने स्पष्ट करके यह स्थापित किया कि भले ही सिंगल जज के फैसले से वादियों के मुकदमों में अनिश्चितता आई हो, लेकिन किसी संदर्भ पीठ (Reference Bench) के सामने कानूनी प्रश्नों का समाधान अलग से होगा, जबकि विशिष्ट आदेशों को डिवीजन बेंच के समक्ष नियमित अपीलों के जरिए ही चुनौती दी जानी चाहिए।

नई दिल्ली: सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) की धारा 20(a), (b) व (c) (प्रतिवादी का निवास/कारोबार या वाद हेतुक / Cause of Action का पूर्ण या आंशिक उद्भव), व्यापार चिह्न अधिनियम, 1999 (Trade Marks Act, 1999) की धारा 134(2) एवं कॉपीराइट अधिनियम, 1957 (Copyright Act, 1957) की धारा 62(2) (वादी के कारोबार/निवास स्थान पर मुकदमा दायर करने का विशेष विधिक अधिकार), ई-कॉमर्स व डिजिटल परिदृश्य में ‘लक्षित वाणिज्यिक गतिविधि’ (Targeted Commercial Activity) बनाम निष्क्रिय वेबसाइट, अपकृत्य विधि में ‘फोरम नॉन कन्वीनियंस का सिद्धांत’ (Doctrine of Forum Non Conveniens), तथा ऐतिहासिक खंडपीठ निर्णयों—बरगद का पेड़ (Banyan Tree Holding Ltd. v. A. Murali Krishna Reddy, 2009) व अल्ट्रा होम कंस्ट्रक्शन (Ultra Home Construction Pvt. Ltd. v. Purushottam Kumar Chaubey, 2016)—के स्थापित विधिक मानकों के तहत दिल्ली उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ (Full Bench) के समक्ष बौद्धिक संपदा मुकदमों के क्षेत्राधिकार पर एक बड़ा विधिक संग्राम हुआ है।

दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर (Justice C Hari Shankar), न्यायमूर्ति ज्योति सिंह (Justice Jyoti Singh) और न्यायमूर्ति विनोद कुमार (Justice Vinod Kumar) की तीन-न्यायाधीशों की पूर्ण पीठ (Full Bench) ने बौद्धिक संपदा अधिकारों (IPR) में क्षेत्रीय अधिकार-क्षेत्र (Territorial Jurisdiction) के जटिल विधिक संदर्भ पर विस्तृत बहस सुनने के बाद अपना निर्णय सुरक्षित (Verdict Reserved) रख लिया।

सुनवाई के दौरान देश के शीर्ष आईपी वकीलों ने न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव (Justice Purushaindra Kumar Kaurav) द्वारा 3 नवंबर 2026 को सुनाए गए 246 पृष्ठों के युगांतकारी निर्णय पर तीखी चिंता जताई, जिसमें जस्टिस कौरव ने दिल्ली से नाममात्र का संबंध रखने वाले 17 वाणिज्यिक मुकदमों में क्षेत्राधिकार को अस्वीकार करते हुए उनके वादपत्र लौटा दिए थे (Plaints Returned under Order VII Rule 10 CPC) और कहा था कि अदालत का क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार बौद्धिक संपदा मुकदमों को अवरुद्ध कर रहा है। हालांकि, पूर्ण पीठ ने अधिवक्ताओं को रोकते हुए दो-टूक स्पष्ट किया कि वह जस्टिस कौरव के फैसले के विरुद्ध कोई अपीलीय अदालत नहीं है; यदि उस फैसले से कोई व्यथित है, तो उसे खंडपीठ के समक्ष नियमित अपीलीय उपचार (Appellate Remedies) का सहारा लेना होगा।

पूर्ण पीठ के मुख्य कानूनी निर्देश एवं विधिक टिप्पणियां

1. ‘फुल बेंच अपीलीय अदालत नहीं है; एकल पीठ के फैसले को अपील में चुनौती दें’:

जब वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने 3 नवंबर के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि इससे दिल्ली में लंबित सैकड़ों आईपी मुकदमे ठप हो रहे हैं, तो न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर की अध्यक्षता वाली पूर्ण पीठ ने स्पष्ट किया: “आप इस पूर्ण पीठ को उस एकल पीठ के फैसले के विरुद्ध एक अपीलीय पीठ (Appellate Bench) में तब्दील नहीं कर सकते। जस्टिस कौरव के निर्णय से जुड़ी आपत्तियों या उसकी निष्कर्षों की विधिक वैधता को आपको स्थापित अपीलीय उपचारों (Appellate Remedies / Division Bench Appeals) के माध्यम से ही चुनौती देनी होगी। हम यहाँ केवल हमें भेजे गए मूल कानूनी संदर्भ (Issues for Reference) पर विचार कर रहे हैं।”

2. संदर्भ (Reference) का मूल विधिक प्रश्न:

  • यह संपूर्ण संदर्भ मूल रूप से हिंदुस्तान यूनिलीवर बनाम क्विक लिविंग (Hindustan Unilever v. Kwick Living) के मामले से उपजा है।
  • मुख्य विधिक प्रश्न यह है कि सीपीसी की धारा 20(c) (जहाँ वाद हेतुक पूर्णतः या अंशतः उत्पन्न होता है) और ट्रेडमार्क एक्ट की धारा 134(2) व कॉपीराइट एक्ट की धारा 62(2) के बीच क्या अंतर्संबंध है?
  • क्या किसी ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म (जैसे अमेजन, फ्लिपकार्ट) पर केवल उत्पाद का सूचीबद्ध होना, दिल्ली में ऑनलाइन विज्ञापन दिखना, या दिल्ली के किसी पते पर डिलीवरी बुक करा लेना दिल्ली उच्च न्यायालय को मुकदमा सुनने का पर्याप्त और वैध क्षेत्रीय अधिकार-क्षेत्र प्रदान करता है?

वकीलों द्वारा उठाए गए मुख्य कानूनी आक्षेप एवं विधिक तर्क

1. अधिवक्ता साईकृष्ण राजगोपाल (लंबित मुकदमों के ठप होने की चिंता):

  • वरिष्ठ बौद्धिक संपदा अधिवक्ता साईकृष्ण राजगोपाल (Advocate Saikrishna Rajagopal) ने बहस की शुरुआत में ही 3 नवंबर के फैसले के प्रभाव को उठाते हुए कहा:“माई लॉर्ड्स, हमारी एकमात्र गंभीर चिंता यह है कि हमारे सभी वाणिज्यिक मुकदमे पूरी तरह ठप (Stalled) हो रहे हैं। संदर्भ के लिए भेजे गए कम से कम दो ऐसे कानूनी मुद्दे हैं जिनका 3 नवंबर के फैसले के निष्कर्षों पर सीधा और निर्णायक प्रभाव पड़ता है।”

2. अधिवक्ता श्वेतश्री मजूमदार (जांचकर्ताओं द्वारा की गई खरीद व खंडपीठ की नज़ीरें):

  • अधिवक्ता श्वेतश्री मजूमदार (Advocate Shwetasree Majumder) ने पीठ के समक्ष एक विस्तृत विधिक नोट प्रस्तुत किया, जिसमें दर्शाया गया कि एकल पीठ ने किस प्रकार पूर्ववर्ती खंडपीठों के बाध्यकारी निर्णयों से भिन्न रुख अपनाया है:
    • ‘ट्रैप परचेज’ / जांचकर्ताओं द्वारा साक्ष्य संकलन:
      • मजूमदार ने दलील दी कि यद्यपि बरगद का पेड़ (Banyan Tree) मामले में खंडपीठ ने जांचकर्ताओं के जरिए गढ़ी गई खरीदारी (Trap Purchases) को अस्वीकार किया था, किंतु इसका यह अर्थ नहीं निकाला जा सकता कि वादी के निजी अन्वेषक द्वारा जुटाए गए प्रत्येक साक्ष्य को खारिज कर दिया जाए या उसे क्षेत्राधिकार से इनकार करने का स्वतः आधार मान लिया जाए।
    • वस्तुएं बनाम सेवाएं (Goods vs Services Passing Off):
      • 3 नवंबर के फैसले में पासिंग-ऑफ (Passing Off) को मुख्य रूप से वस्तुओं के भौतिक लेन-देन तक सीमित रखा गया। मजूमदार ने रेखांकित किया कि सेवा क्षेत्र (जैसे ऑनलाइन कंसल्टेंसी, सॉफ्टवेयर, डिजिटल प्लेटफॉर्म) में लेन-देन का स्वरूप अलग होता है और उसे भौतिक वस्तुओं के तराजू पर नहीं तौला जा सकता।

3. वरिष्ठ अधिवक्ता चंदर एम. लाल (बिना वाणिज्यिक लेन-देन के उल्लंघन का सिद्धांत):

  • वरिष्ठ अधिवक्ता चंदर एम. लाल (Senior Advocate Chander M Lall) ने डिजिटल युग में क्षेत्राधिकार के मूलभूत सिद्धांतों पर प्रकाश डालते हुए तर्क दिया:
    • प्रत्येक आईपी मामले में पूर्ण वाणिज्यिक लेन-देन अनिवार्य नहीं:“हर बौद्धिक संपदा मामले में एक संपन्न वाणिज्यिक लेन-देन (Completed commercial transaction) का होना आवश्यक नहीं हो सकता। एक अपमानजनक विज्ञापन (Disparaging advertisement) या अनधिकृत कॉपीराइट प्रसारण (Unauthorised copyright broadcast) बिना किसी भौतिक खरीद या बिक्री के भी गंभीर उल्लंघन को जन्म देता है। वहाँ कोई व्यावसायिक लेन-देन संपन्न नहीं हो रहा है, फिर भी उल्लंघन लगातार घटित हो रहा है।”
    • सीपीसी धारा 20(a)/(b) बनाम धारा 20(c) का विभेद:
      • लाल ने तर्क दिया कि धारा 20(a) और 20(b) (जहाँ प्रतिवादी निवास करता है या व्यवसाय करता है) की सीमाओं को जबरन धारा 20(c) (जहाँ वाद हेतुक का कोई अंश उत्पन्न होता है) पर नहीं थोपा जा सकता। यदि किसी उल्लंघनकारी उत्पाद या विज्ञापन का प्रभाव दिल्ली के उपभोक्ताओं तक पहुंच रहा है, तो धारा 20(c) के तहत वाद हेतुक का एक हिस्सा दिल्ली में उत्पन्न माना जाएगा।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम

संदर्भ / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
फोरम / न्यायालयदिल्ली उच्च न्यायालय, नई दिल्ली (पूर्ण पीठ क्षेत्राधिकार — Full Bench)
पीठन्यायमूर्ति सी. हरि शंकर (Justice C Hari Shankar), न्यायमूर्ति ज्योति सिंह (Justice Jyoti Singh) एवं न्यायमूर्ति विनोद कुमार (Justice Vinod Kumar)
कार्यवाही की तिथि7 नवंबर 2026 (शुक्रवार)
केस संदर्भहिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड बनाम क्विक लिविंग प्रोडक्ट्स व अन्य [विधिक संदर्भ — FAO(OS) / CS(COMM) Reference / 2026]
मूल एकल पीठ का निर्णय3 नवंबर 2026 को न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव (Justice Purushaindra Kumar Kaurav) द्वारा 17 वाणिज्यिक बौद्धिक संपदा मुकदमों में दिया गया 246 पृष्ठों का विस्तृत निर्णय।
एकल पीठ का मुख्य निष्कर्षएकल पीठ ने माना था कि वादी केवल इसलिए दिल्ली में मुकदमा नहीं चला सकते क्योंकि उत्पाद इंटरनेट पर उपलब्ध है या वादी के जांचकर्ता ने दिल्ली में डिलीवरी मंगा ली। अदालत ने ‘फोरम शॉपिंग’ पर रोक लगाने हेतु ‘फोरम नॉन कन्वीनियंस’ (Forum Non Conveniens) लागू कर 17 मुकदमों के वादपत्र उचित अधिकार-क्षेत्र वाली अदालतों में प्रस्तुत करने हेतु लौटा दिए थे।
फुल बेंच के समक्ष उठाए गए मुद्दे1. क्या ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर उत्पाद की उपलब्धता मात्र दिल्ली में सीपीसी धारा 20(c) के तहत वाद हेतुक सृजित करती है?
2. क्या ट्रेडमार्क की धारा 134 और कॉपीराइट की धारा 62 सीपीसी की धारा 20 के सामान्य नियमों को पूरी तरह निष्प्रभावी करती हैं?
3. क्या निजी जांचकर्ताओं द्वारा की गई खरीद (Trap Orders) को क्षेत्राधिकार निर्धारण में पूरी तरह नकारा जा सकता है?
प्रमुख विधिक प्रतिनिधित्ववरिष्ठ अधिवक्ता चंदर एम. लाल, अधिवक्ता साईकृष्ण राजगोपाल, अधिवक्ता श्वेतश्री मजूमदार व अन्य प्रमुख आईपी बार सदस्य।
पूर्ण पीठ का अंतिम आदेशसंदर्भ के सभी कानूनी प्रश्नों पर निर्णय सुरक्षित (Verdict Reserved); एकल पीठ के 3 नवंबर के फैसले पर किसी भी हस्तक्षेप हेतु नियमित खंडपीठ में अपील दाखिल करने की स्वतंत्रता।

विधिक एवं विधायी विश्लेषण: ‘सीपीसी धारा 20(c), डिजिटल वाणिज्य और फोरम नॉन कन्वीनियंस’

  • सीपीसी की धारा 20(c) बनाम ट्रेडमार्क अधिनियम की धारा 134(2):
    • सामान्य दीवानी कानून (सीपीसी धारा 20) यह तय करता है कि मुकदमा वहाँ होगा जहाँ प्रतिवादी रहता है/काम करता है या जहाँ वाद हेतुक उत्पन्न होता है।
    • बौद्धिक संपदा कानूनों (ट्रेडमार्क धारा 134 और कॉपीराइट धारा 62) ने वादी को राहत देने हेतु यह विशेष प्रावधान किया था कि वादी जहाँ स्वयं निवास करता है या कारोबार करता है, वहाँ भी मुकदमा दाखिल कर सकता है।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने इंडियन परफॉर्मिंग राइट्स सोसाइटी (IPRS) बनाम संजय डालिया [(2015) 10 SCC 161] में इस पर रोक लगाते हुए कहा था कि यदि वादी का मुख्य कार्यालय मुंबई में है और वाद हेतुक चेन्नई में हुआ, तो वह केवल अपनी किसी छोटी शाखा के आधार पर दिल्ली में मुकदमा नहीं ठोक सकता।
  • ई-कॉमर्स और ‘लक्षित वाणिज्यिक गतिविधि’ (Targeted Commercial Activity):
    • खंडपीठ के ऐतिहासिक निर्णय Banyan Tree (2009) के अनुसार, इंटरनेट की सीमाहीन प्रकृति के कारण प्रत्येक वेबसाइट पूरे विश्व में खुलती है। केवल इस आधार पर कि वेबसाइट दिल्ली में खुल रही है, दिल्ली की अदालतों को अधिकार नहीं मिल जाता। वादी को यह दिखाना होता है कि प्रतिवादी ने दिल्ली के बाजार और उपभोक्ताओं को “लक्षित” (Targeted) किया था।
    • 3 नवंबर के फैसले में जस्टिस कौरव ने इस सिद्धांत को बहुत कठोरता से लागू किया और ई-कॉमर्स डिलीवरी के सूक्ष्म संपर्कों को अपर्याप्त मानते हुए केस खारिज कर दिए। पूर्ण पीठ का भावी निर्णय यह तय करेगा कि क्या डिजिटल युग में यह दृष्टिकोण बहुत अधिक संकीर्ण है अथवा ‘फोरम शॉपिंग’ (Forum Shopping) को रोकने हेतु आवश्यक है।
  • ‘फोरम नॉन कन्वीनियंस’ का विवादास्पद प्रयोग:
    • भारतीय दीवानी कानून में ‘फोरम नॉन कन्वीनियंस’ का सिद्धांत सामान्यतः विदेशी अदालतों बनाम भारतीय अदालतों के अंतरराष्ट्रीय क्षेत्राधिकार में लागू किया जाता रहा है।
    • घरेलू मुकदमों में (जहाँ वादी और प्रतिवादी दोनों भारत के हैं और सीपीसी की धारा 20 के तहत तकनीकी क्षेत्राधिकार बनता है) क्या कोई दीवानी अदालत यह कहकर वादपत्र लौटा सकती है कि “दिल्ली में काम का बोझ अधिक है और पक्षों के लिए चंडीगढ़ या मुंबई अधिक सुविधाजनक होगा”? वकीलों का तर्क है कि ऐसा करना कानून द्वारा प्रदत्त वाद दायर करने के अधिकार को छीनना है।

विधिक विवरण एवं संदर्भ

  • न्यायालय: दिल्ली उच्च न्यायालय, नई दिल्ली (पूर्ण पीठ क्षेत्राधिकार — Full Bench)
  • केस संदर्भ: हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड बनाम क्विक लिविंग प्रोडक्ट्स व अन्य [विधिक संदर्भ — Jurisdiction in IP Disputes / 2026]
  • पीठ: न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर (Justice C Hari Shankar), न्यायमूर्ति ज्योति सिंह (Justice Jyoti Singh) एवं न्यायमूर्ति विनोद कुमार (Justice Vinod Kumar)
  • कार्यवाही की तिथि: 7 नवंबर 2026 (शुक्रवार)
  • कार्यवाही का परिणाम: आईपी मुकदमों में क्षेत्राधिकार के सभी कानूनी प्रश्नों पर बहस पूर्ण; पूर्ण पीठ द्वारा निर्णय सुरक्षित (Verdict Reserved); एकल पीठ के 3 नवंबर के फैसले के खिलाफ अलग से अपीलीय मंच अपनाने का निर्देश।

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • प्रमुख वरिष्ठ अधिवक्ता एवं परामर्शदाता:
    • वरिष्ठ अधिवक्ता चंदर एम. लाल (Senior Advocate Chander M Lall)
    • अधिवक्ता साईकृष्ण राजगोपाल (Advocate Saikrishna Rajagopal)
    • अधिवक्ता श्वेतश्री मजूमदार (Advocate Shwetasree Majumder) एवं देश की प्रमुख आईपी लॉ फर्मों के वरिष्ठ अधिवक्तागण।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक उपबंध:
    • सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC):
      • धारा 20(a), (b) व (c) — अन्य वाद वहाँ संस्थित किए जाएंगे जहाँ प्रतिवादी निवास करते हैं या वाद हेतुक उत्पन्न होता है
      • आदेश VII नियम 10 — वादपत्र का लौटाया जाना (Return of Plaint)
    • व्यापार चिह्न अधिनियम, 1999 (Trade Marks Act, 1999) — धारा 134(2) (मुकदमा संस्थित करने का विशेष अधिकार-क्षेत्र)
    • कॉपीराइट अधिनियम, 1957 (Copyright Act, 1957) — धारा 62(2) (अधिकार-क्षेत्र के विशेष प्रावधान)
    • अपकृत्य एवं निजी अंतरराष्ट्रीय विधि — फोरम नॉन कन्वीनियंस का सिद्धांत (Doctrine of Forum Non Conveniens)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • बौद्धिक संपदा, डिजिटल वाणिज्य और क्षेत्रीय अधिकार-क्षेत्र का विधिक मानक: ‘ई-कॉमर्स और ऑनलाइन व्यापार के युग में सीपीसी की धारा 20(c) के तहत क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार का निर्धारण केवल वेबसाइट की दृश्यता (Passive Website Accessibility) पर आधारित नहीं हो सकता, बल्कि वादी को प्रतिवादी द्वारा संबंधित न्यायाधिकार क्षेत्र के उपभोक्ताओं को लक्षित करने (Targeted Commercial Intent) का ठोस साक्ष्य प्रस्तुत करना अनिवार्य है; अपमानजनक विज्ञापनों या डिजिटल कॉपीराइट उल्लंघनों में किसी संपन्न भौतिक वाणिज्यिक लेन-देन (Completed Commercial Transaction) के अभाव में भी वाद हेतुक उत्पन्न हो सकता है; निजी जांचकर्ताओं द्वारा जुटाए गए साक्ष्यों (Trap Purchases) का मूल्यांकन प्रत्येक मामले के विशिष्ट तथ्यों पर होना चाहिए और उन्हें बिना जांचे सरसरी तौर पर नकारा नहीं जा सकता; घरेलू वाणिज्यिक मुकदमों में जहाँ वैधानिक क्षेत्राधिकार बनता हो, वहाँ फोरम नॉन कन्वीनियंस के सिद्धांत का अंधाधुंध प्रयोग वादियों के न्याय तक पहुंच के अधिकार को बाधित कर सकता है; तथा पूर्ण पीठ विधिक सिद्धांतों का मानकीकरण करती है, किंतु एकल पीठ के व्यक्तिगत न्यायिक आदेशों को चुनौती केवल अधिकृत अपीलीय खंडपीठ के समक्ष ही दी जा सकती है।’
  • वर्तमान स्थिति व अंतिम प्रभाव: दिल्ली उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ द्वारा निर्णय सुरक्षित रखे जाने के बाद अब संपूर्ण देश के बौद्धिक संपदा बार और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की नजरें इस फैसले पर टिकी हैं; पूर्ण पीठ का यह ऐतिहासिक फैसला तय करेगा कि क्या दिल्ली उच्च न्यायालय—जो देश की अनौपचारिक “आईपी राजधानी” माना जाता रहा है—में ऑनलाइन व्यापार से जुड़े मुकदमों के द्वार खुले रहेंगे अथवा 3 नवंबर के फैसले की तर्ज पर दिल्ली से बाहर के वादियों को अपने-अपने स्थानीय राज्यों की जिला अदालतों का रुख करना होगा।

E-Commerce:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतदिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court – Full Bench)
पीठन्यायमूर्ति सी. हरि शंकर, न्यायमूर्ति ज्योति सिंह एवं न्यायमूर्ति विनोद कुमार
मूल संदर्भ (Reference Case)Hindustan Unilever v. Kwick Living (CPC की धारा 20 बनाम ट्रेडमार्क/कॉपीराइट अधिनियम के क्षेत्राधिकार प्रावधान)
प्रमुख अधिवक्तावरिष्ठ अधिवक्ता चंदर एम. लाल (Sr. Adv. Chander M. Lall), अधिवक्ता साईकृष्ण राजगोपाल, अधिवक्ता श्वेताश्री मजूमदार
विवादास्पद फैसला3 नवंबर 2026 का 246-पेज का फैसला (न्यायमूर्ति पुरूषेंद्र कुमार कौरव), जिसने Forum Non Conveniens लागू कर 17 IP मुकदमों की प्लैंट्स वापस की थीं।
अदालत का आदेशनिर्णय सुरक्षित: वकीलों के तर्कों और लिखित नोट्स को रिकॉर्ड पर लेकर IP क्षेत्राधिकार के संदर्भ पर फैसला सुरक्षित रखा गया।
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