At A Glance | एक नजर में
- डिजिटल और ऑनलाइन ट्रैकिंग: RTI के तहत लापरवाह अधिकारियों के खिलाफ लगाई गई पेनाल्टी और अनुशासनात्मक कार्रवाई का विवरण विभागवार और वर्षवार आधिकारिक वेबसाइटों पर सार्वजनिक करना होगा।
- मानक प्रारूप (Standard Format): कर्नाटक राज्य सूचना आयोग (KSIC) को एक मानकीकृत प्रारूप तय करने का निर्देश दिया गया है ताकि सभी विभाग एक समान तरीके से यह डेटा बनाए रखें।
- सक्रिय प्रकटीकरण (Proactive Disclosure): कोर्ट ने कहा कि RTI से जुड़ी जानकारी मांगने पर पुरानी फाइलों से डेटा जुटाने के बजाय इसे पहले से ही व्यवस्थित और डिजिटल रूप में रखा जाना चाहिए।
- आवेदक का अधिकार: हाईकोर्ट ने दोहराया कि धारा 6(2) के तहत RTI आवेदक को जानकारी मांगने की वजह (Reason) या अपना निजी विवरण देने की कोई आवश्यकता नहीं है।
बेंगलुरु: सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act) के प्रभावी क्रियान्वयन, सूचना देने में विफल रहने वाले लोक सूचना अधिकारियों (PIOs) की जवाबदेही और सरकारी विभागों द्वारा सूचनाओं के स्वतः प्रकटीकरण (Proactive Disclosure) पर कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक युगांतरकारी निर्णय दिया है।
ऑनलाइन सुलभ बनाए ताकि आम जनता और राज्य सूचना आयोग (KSIC) दोनों के लिए त्वरित निगरानी संभव हो सके
न्यायमूर्ति सूरज गोविंदराज की एकल पीठ ने अपने विस्तृत आदेश में स्पष्ट किया कि आरटीआई व्यवस्था ऐसी नहीं होनी चाहिए जहां नागरिकों द्वारा जानकारी मांगने पर अधिकारियों को बार-बार पुरानी फाइलों से ब्योरा खंगालना पड़े। जब डेटा व्यवस्थित रूप से संधारित किया जा सकता है, तो प्रशासन का कर्तव्य है कि वह इसे ऑनलाइन सुलभ बनाए ताकि आम जनता और राज्य सूचना आयोग (KSIC) दोनों के लिए त्वरित निगरानी संभव हो सके। उच्च न्यायालय ने सभी संबंधित विभागों और राज्य प्राधिकरणों को सख्त निर्देश दिया है कि वे आरटीआई कानून का उल्लंघन करने वाले लापरवाह अधिकारियों के खिलाफ अधिरोपित किए गए अर्थदंड (Penalties) और शुरू की गई अनुशासनात्मक कार्यवाहियों (Disciplinary Actions) का वर्षवार विस्तृत ब्योरा अनिवार्य रूप से डिजिटल प्रारूप (Digital Format) में अपनी आधिकारिक वेबसाइटों पर सार्वजनिक रूप से अपलोड करें।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘हर बार फाइलों को खंगालने की जरूरत नहीं; डिजिटल और स्वतः प्रकटीकरण हो’ न्यायमूर्ति सूरज गोविंदराज ने आरटीआई प्रशासन की सुस्ती और सूचना छिपाने के बहानों पर तीखा प्रहार करते हुए कहा:
“जब मांगी गई जानकारी आरटीआई अधिनियम के क्रियान्वयन से संबंधित है और उसे एक व्यवस्थित रूप में बनाए रखना पूरी तरह संभव है, तो इसका उचित उत्तर यह नहीं हो सकता कि जब भी कोई नागरिक इसे मांगे, तो हर बार अलग-अलग फाइलों से उसी जानकारी को दोबारा जुटाया (Reconstructed) जाए।
बेहतर तरीका यह सुनिश्चित करना है कि जानकारी को इस तरह से संधारित किया जाए जिससे वह तुरंत पुनः प्राप्त (Ready Retrieval) की जा सके और जहां उपयुक्त हो, उसका स्वतः प्रकटीकरण (Proactive Disclosure) किया जाए। आरटीआई तंत्र को इस तरह से काम नहीं करना चाहिए कि इसके प्रशासन के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को स्वयं ऐसी जानकारी को दोबारा संकलित करने में काफी समय बर्बाद करना पड़े जिसे आसानी से एक संगठित रूप में बनाए रखा और सार्वजनिक किया जा सकता है।”
2. स्रोत पर डेटा संधारण और मानक प्रारूप (Standard Format)
- अदालत ने जोर देकर कहा कि सूचना उसके मूल स्रोत (Source) पर ही डिजिटल रूप में दर्ज होनी चाहिए:“उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आरटीआई अधिनियम के क्रियान्वयन से संबंधित जानकारी उसके मूल स्रोत पर ही व्यवस्थित रखी जाए, एक समान तरीके से संकलित की जाए, कर्नाटक राज्य सूचना आयोग (KSIC) को उपलब्ध कराई जाए, और कानून के दायरे में जहां तक संभव हो, इसे जनता के लिए आसानी से उपलब्ध कराया जाए।”
- पीठ ने कर्नाटक राज्य सूचना आयोग को निर्देश दिया कि वह एक मानक प्रारूप (Standard Format) तैयार करे, जिसके आधार पर सभी सरकारी विभाग अपने अधिकारियों पर की गई दंडात्मक कार्रवाई की जानकारी संकलित और अद्यतन करेंगे।
3. धारा 6(2) का कड़ा संदेश: ‘आवेदक को कारण या निजी रुचि साबित करने की बाध्यता नहीं’
- अदालत ने लोक सूचना अधिकारियों की उस प्रवृत्ति को खारिज किया जहां वे आवेदकों से उनके इरादों या व्यक्तिगत हित पर सवाल उठाते हैं।
- पीठ ने अधिनियम की धारा 6(2) को स्पष्ट करते हुए कहा कि कानून में आवेदक के लिए जानकारी मांगने का कोई भी कारण बताना या संपर्क विवरण के अलावा कोई अन्य व्यक्तिगत जानकारी देना कतई अनिवार्य नहीं है। इसलिए याचिकाकर्ता पर यह साबित करने की कोई विधिक बाध्यता नहीं थी कि उसका उस डेटा में कोई निजी हित (Personal Interest) है या वह इसे किस उद्देश्य से प्राप्त कर रहा है।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं विधिक विवाद
- याचिकाकर्ता: प्रसिद्ध आरटीआई कार्यकर्ता रमेश बाबू एन. (Ramesh Babu N.) ने एक आरटीआई आवेदन दायर कर कर्नाटक राज्य सूचना आयोग से उन सभी लोक सूचना अधिकारियों की सूची, उन पर लगाए गए जुर्माने और की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई का विवरण मांगा था जिन्होंने नागरिकों को समय पर सूचना उपलब्ध नहीं कराई थी।
- पीआईओ द्वारा इंकार: लोक सूचना अधिकारी (PIO) ने यह कहकर जानकारी देने से मना कर दिया था कि यह डेटा आयोग के कार्यालय में “उस रूप में संधारित नहीं है जिस रूप में मांगा गया है” और इसे जुटाने के लिए सैकड़ों पुरानी फाइलों को खोलना पड़ेगा।
- हाईकोर्ट में चुनौती: अधिकारियों और अपीलीय प्राधिकारी द्वारा आवेदन खारिज किए जाने के बाद रमेश बाबू ने कर्नाटक हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर केएसआईसी को जानकारी उपलब्ध कराने का निर्देश देने की गुहार लगाई।
आरटीआई अधिनियम की धारा 25(3) का वैधानिक अधिदेश
अदालत ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि आरटीई अधिनियम, 2005 की धारा 25(3) पहले से ही राज्य सूचना आयोग पर यह वैधानिक दायित्व डालती है कि वह अपनी वार्षिक रिपोर्ट (Annual Report) में निम्नलिखित बिंदुओं का विस्तृत ब्योरा तैयार करे:
- प्राप्त किए गए कुल आरटीआई आवेदनों की संख्या।
- सूचना देने से इनकार करने वाले निर्णयों की संख्या और उनके लिए प्रयुक्त वैधानिक धाराएं।
- आयोग के समक्ष दायर अपीलों की संख्या, उनकी प्रकृति और उनके अंतिम परिणाम।
- अधिनियम के प्रशासन के संबंध में दोषी अधिकारियों के विरुद्ध की गई दंडात्मक व अनुशासनात्मक कार्रवाई का संपूर्ण विवरण।
- एकत्रित की गई कुल फीस/प्रभार।
- कानून की मूल भावना को लागू करने के प्रयास और व्यवस्थागत सुधार हेतु सिफारिशें।
अदालत ने स्पष्ट किया कि जब कानून स्वयं वार्षिक रिपोर्ट में यह विवरण दर्ज करने का निर्देश देता है, तो इसे डिजिटल डेटाबेस के रूप में आधिकारिक पोर्टल पर सार्वजनिक न करना विधायी मंशा के प्रतिकूल है।
उच्च न्यायालय द्वारा जारी समयबद्ध निर्देश
अदालत ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए सख्त समय-सीमा निर्धारित की:
- 8 सप्ताह के भीतर जानकारी दें: कर्नाटक राज्य सूचना आयोग (KSIC) को निर्देश दिया गया कि वह अपने वर्तमान रिकॉर्ड में पहले से उपलब्ध जानकारी की जांच करे और आरटीआई कानून के प्रावधानों के अधीन रहते हुए याचिकाकर्ता को 8 सप्ताह के भीतर वांछित सूचना उपलब्ध कराए।
- अन्य विभागों से डेटा जुटाने हेतु 60 दिन: जो अतिरिक्त जानकारी अन्य सरकारी विभागों से संकलित की जानी है, उसे जुटाकर याचिकाकर्ता को 60 दिनों के भीतर अनिवार्य रूप से प्रेषित किया जाए।
- पोर्टल पर सार्वजनिक अपलोड: सभी राज्य विभागों को अपनी आधिकारिक वेबसाइटों पर पीआईओ के खिलाफ की गई दंडात्मक कार्यवाहियों का वर्षवार विवरण निरंतर अद्यतन करने का आदेश दिया गया।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: रमेश बाबू एन. बनाम कर्नाटक राज्य सूचना आयोग व अन्य [रिट याचिका (सिविल) – कर्नाटक उच्च न्यायालय, बेंगलुरु]
- आदेश की तिथि: 23 सितंबर 2026
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act, 2005):
- धारा 4(1)(b) (लोक प्राधिकरणों द्वारा सूचनाओं का स्वतः प्रकटीकरण / Proactive/Suo Motu Disclosure)
- धारा 6(2) (आवेदक द्वारा कारण या व्यक्तिगत विवरण न देने का विधिक संरक्षण)
- धारा 20 (कर्तव्य में लापरवाही बरतने वाले पीआईओ पर ₹250 प्रतिदिन के हिसाब से अधिकतम ₹25,000 का अर्थदंड एवं अनुशासनात्मक कार्रवाई की संस्तुति)
- धारा 25(3) (सूचना आयोग की वार्षिक रिपोर्ट और उसमें दंडात्मक कार्यवाहियों के प्रकटीकरण का अधिदेश)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 19(1)(a) (जानने का अधिकार और सूचना की स्वतंत्रता)
- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act, 2005):
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन बनाम आदित्य बंदोपाध्याय (2011, सुप्रीम कोर्ट) — ‘आरटीआई कानून का प्राथमिक उद्देश्य सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और लोक सेवकों की जवाबदेही तय करना है।’
- इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया बनाम शौनक एच. सत्य (2012, सुप्रीम कोर्ट) — ‘सार्वजनिक प्राधिकरणों द्वारा धारा 4 के तहत अधिकतम जानकारी को सार्वजनिक डोमेन में रखा जाना चाहिए ताकि नागरिकों को अलग से आरटीआई दाखिल करने की कम से कम आवश्यकता पड़े।’
- पीठ: न्यायमूर्ति सूरज गोविंदराज (कर्नाटक उच्च न्यायालय)
- अंतिम निर्णय: रिट याचिका आंशिक रूप से स्वीकार; केएसआईसी को 8 सप्ताह और 60 दिनों के भीतर चरणबद्ध रूप से जानकारी देने का आदेश; दोषी अधिकारियों के खिलाफ जुर्माने व दंडात्मक कार्रवाई के ब्योरे को आधिकारिक वेबसाइटों पर डिजिटल रूप से सार्वजनिक करने की व्यवस्था अनिवार्य घोषित।
RTI Act: Key Indicators | मुख्य बिंदु
| संकेत बिंदु | विवरण |
| संबंधित अदालत | कर्नाटक हाईकोर्ट (जस्टिस सूरज गोविंदराज की एकल पीठ) |
| याचिकाकर्ता | RTI कार्यकर्ता रमेश बाबू एन. |
| मुख्य निर्देश | KSIC 8 हफ्तों के भीतर याचिकाकर्ता को मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराए और विभागों से डेटा एकत्र कर 60 दिनों में दे। |
| कानूनी धाराएं | धारा 25(3): वार्षिक रिपोर्ट तैयार करने और सुधार के उपायों का प्रावधान; धारा 6(2): आवेदक से कारण न पूछने का नियम। |
| अदालत का मुख्य उद्देश्य | RTI व्यवस्था में पारदर्शिता लाना और बार-बार जानकारी जुटाने में अधिकारियों का समय बर्बाद होने से बचाना। |

