Tuesday, September 22, 2026
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Justice Yashwant Verma: सस्ती लोकप्रियता पाने की कोशिश…पूर्व जज यशवंत वर्मा के आवास पर जली हुई नकदी मामले में SIT जांच की याचिका खारिज

केस एवं घटनाक्रम मैट्रिक्स (Case Overview)

विधिक/प्रशासनिक बिंदुविवरण (अगस्त 2026)
माननीय पीठन्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा एवं न्यायमूर्ति अलोक अराधे
याचिकाकर्ताघनश्याम उपाध्याय (अधिवक्ता)
मुख्य मांगपूर्व जज के खिलाफ FIR दर्ज करना और SIT द्वारा न्यायिक निगरानी में जांच
अदालत का निर्णययाचिका “सस्ती लोकप्रियता” करार देते हुए खारिज की गई।

Justice Yashwant Verma: सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े बहुचर्चित “जली हुई नकदी” (Burnt Currency) मामले में प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने और विशेष जांच दल (SIT) से अदालत की निगरानी में जांच कराने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है।

न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति अलोक अराधे की पीठ ने याचिकाकर्ता की मंशा पर सवाल उठाते हुए याचिका को “सस्ती लोकप्रियता” (Cheap Publicity) हासिल करने का प्रयास करार दिया और इस पर विचार करने से साफ इनकार कर दिया।

सुनवाई के दौरान दलीलें और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

  1. याचिकाकर्ता की दलील
    • अधिवक्ता याचिकाकर्ता (घनश्याम उपाध्याय) ने तर्क दिया कि यद्यपि जस्टिस वर्मा अपने पद से इस्तीफा दे चुके हैं, लेकिन इस्तीफा देने से उनके आवास से बरामद हुई बेहिसाब नकदी का आपराधिक दायित्व (Criminal Liability) खत्म नहीं हो जाता।
    • उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय के जज भी लोक सेवक (Public Servant) के दायरे में आते हैं और पद से हटने के बाद उन्हें अभियोजन से कोई कानूनी छूट (Immunity) प्राप्त नहीं है।
  2. सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख: पीठ ने याचिका की विचारणीयता को खारिज करते हुए संक्षिप्त टिप्पणी की।सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी: “यह सब सस्ती लोकप्रियता (Cheap Publicity) के लिए है। हम इस याचिका पर विचार करने के बिल्कुल इच्छुक नहीं हैं। याचिका खारिज की जाती है।”

पूरे मामले की पृष्ठभूमि (Background of the Incident)

  • मार्च 2025 की घटना: 14 मार्च 2025 की शाम को दिल्ली स्थित जस्टिस वर्मा के आवास में आग लग गई थी, जिसके बाद वहां से बेहिसाब नकदी जलने का वीडियो सामने आया था। उस समय जज और उनकी पत्नी मध्य प्रदेश की यात्रा पर थे।
  • इन-हाउस जांच समिति (In-House Probe): भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति (पंजाब व हरियाणा HC के सीजे शील नागू, हिमाचल HC के सीजे जी.एस. संधावालिया और कर्नाटक HC की जस्टिस अनु शिवरामन) का गठन किया। समिति की रिपोर्ट के आधार पर CJI ने उन्हें इस्तीफा देने या महाभियोग का सामना करने की सलाह दी।
  • संसदीय प्रक्रिया और महाभियोग: जस्टिस वर्मा द्वारा इस्तीफा देने से इनकार करने पर, अगस्त 2025 में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने ‘न्यायाधीश (जांच) अधिनियम’ के तहत तीन सदस्यीय समिति का गठन कर पद से हटाने (Removal Process) की कार्यवाही शुरू की।
  • इस्तीफा: हटाने की प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही, जस्टिस वर्मा ने अप्रैल 2026 में अपने पद से त्यागपत्र दे दिया था।

यहां जानिए जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े कथित कैश कांड व महाभियोग

दिल्ली हाईकोर्ट और बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज रहे जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े कथित “कैश-कांड” और महाभियोग का मामला भारतीय न्यायपालिका के इतिहास का एक बेहद संवेदनशील व चर्चित मामला रहा है।

घटना की शुरुआत: आग और नोटों का अंबार (मार्च 2025)

  • 14 मार्च 2025: नई दिल्ली के 30 तुगलक क्रीसेंट स्थित जस्टिस यशवंत वर्मा (तत्कालीन दिल्ली हाईकोर्ट जज) के सरकारी आवास के आउटहाउस/स्टोररूम में देर रात अचानक आग लग गई।
  • कैश की बरामदगी: आग बुझाने पहुँची दिल्ली फायर सर्विस और पुलिस टीम ने स्टोररूम में अधजले और जले हुए 500 रुपये के नोटों की गड्डियां देखीं। शुरुआती दावों के अनुसार वहां करोड़ों रुपये (लगभग 2.5 करोड़ रुपये) का बेहिसाबी कैश रखा हुआ था। घटना के वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो गए।

प्राथमिक कार्रवाई और प्रशासनिक कदम (मार्च – अप्रैल 2025)

  • न्यायिक कार्य वापस लिया गया: मामले की गंभीरता को देखते हुए सर्वोच्च अदालत के निर्देश पर उनसे न्यायिक कार्य तुरंत वापस ले लिया गया।
  • तबादला: अप्रैल 2025 में उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट से स्थानांतरित करके वापस उनके मूल हाईकोर्ट (इलाहाबाद हाईकोर्ट) भेज दिया गया।
  • जस्टिस वर्मा की सफाई: उन्होंने किसी भी तरह की गड़बड़ी से इनकार किया। उन्होंने तर्क दिया कि वह घटना के दिन दिल्ली में मौजूद नहीं थे, वह आउटहाउस उनके और उनके परिवार द्वारा इस्तेमाल नहीं किया जाता था, और वे किसी भी बेहिसाबी संपत्ति के मालिक नहीं हैं।

सुप्रीम कोर्ट की ‘इन-हाउस’ जांच (मार्च – मई 2025)

  • 3-सदस्यीय जांच कमेटी: तत्कालीन चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) संजीव खन्ना ने तीन जजों की एक आंतरिक (In-House) जांच समिति गठित की।
  • जांच रिपोर्ट: समिति ने 50 से अधिक गवाहों के बयान, सीसीटीवी फुटेज और फोटो-वीडियो की जांच की। समिति ने निष्कर्ष निकाला कि जस्टिस वर्मा के खिलाफ लगे आरोपों में तथ्य हैं और उनके खिलाफ महाभियोग (Impeachment) चलाने योग्य गंभीर दुर्व्यवहार (Misconduct) का मामला बनता है।
  • राष्ट्रपति व पीएम को सिफारिश: मई 2025 में सीजीआई संजीव खन्ना ने जांच रिपोर्ट राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजकर पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू करने की सिफारिश की।

संसद में महाभियोग प्रस्ताव (जुलाई – अगस्त 2025)

  • सांसदों के हस्ताक्षर: जुलाई 2025 में लोकसभा और राज्यसभा के 200 से अधिक सांसदों ने जस्टिस यशवंत वर्मा को हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए।
  • संसदीय जांच समिति: 12 अगस्त 2025 को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने ‘जज (इन्क्वायरी) एक्ट, 1968’ के तहत 3-सदस्यीय जांच समिति के गठन की घोषणा की।

सुप्रीम कोर्ट में चुनौती और कानूनी लड़ाई (2025 – जनवरी 2026)

  • जस्टिस वर्मा ने संसद और लोकसभा अध्यक्ष द्वारा गठित इस जांच समिति की वैधानिकता को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर चुनौती दी।
  • 16 जनवरी 2026: सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी, जिससे संसदीय जांच समिति के काम जारी रखने का रास्ता साफ हो गया और उन पर महाभियोग की तलवार लटकी रही।

हालिया मोड़: कार्यवाही से वॉकआउट और इस्तीफा (अप्रैल 2026)

  • 9 अप्रैल 2026: संसदीय समिति की जांच जारी रहने के बीच, जस्टिस यशवंत वर्मा ने जांच प्रक्रिया को “अन्यायपूर्ण” बताते हुए खुद को इससे अलग (Withdraw) कर लिया।
  • राष्ट्रपति को इस्तीफा: उसी दिन (9 अप्रैल 2026) उन्होंने भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज के पद से अपना तत्काल प्रभाव से इस्तीफा सौंप दिया।
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