Friday, June 19, 2026
HomeHigh CourtJuvenility Case: 18 साल से कम उम्र का आरोपी कभी भी जुवेनाइल...

Juvenility Case: 18 साल से कम उम्र का आरोपी कभी भी जुवेनाइल होने का दावा कर सकता है…पटना हाईकोर्ट की टिप्पणी

Juvenility Case: पटना हाईकोर्ट ने कहा, किसी भी आपराधिक मामले में आरोपी किसी भी चरण में खुद को नाबालिग (जुवेनाइल) बताकर राहत की मांग कर सकता है, चाहे केस का अंतिम फैसला हो चुका हो।

सिवान की जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड को जांच का निर्देश

जस्टिस जितेंद्र कुमार ने 1993 के हत्या के प्रयास मामले में दोषी एक आरोपी की उम्र की जांच के लिए सिवान की जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (JJB) को जांच करने का निर्देश दिया है। यह आदेश 2017 में सिवान की फास्ट ट्रैक कोर्ट द्वारा सुनाए गए फैसले के खिलाफ दायर अपील पर आया है। इस फैसले में आठों आरोपियों को आईपीसी की धारा 307, 148, 149 और 326 के तहत दोषी ठहराया गया था। अपील के दौरान आरोपी नंबर 8 ने पहली बार खुद को नाबालिग बताया और बिहार स्कूल एग्जामिनेशन बोर्ड का मैट्रिक सर्टिफिकेट पेश किया, जिसमें उसकी जन्मतिथि 15 जून 1975 दर्ज है। इस हिसाब से घटना की तारीख (1 जून 1993) को उसकी उम्र 17 साल 11 महीने 15 दिन थी।

जुवेनाइल जस्टिस एक्ट 2000 के तहत मांगी राहत

आरोपी ने दलील दी कि भले ही अपराध 1986 के जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत हुआ हो, जिसमें लड़कों के लिए नाबालिग की उम्र 16 साल थी, लेकिन 2000 के नए कानून और 2006 के संशोधन के अनुसार उम्र सीमा 18 साल कर दी गई है। इसलिए उसे इस कानून के तहत राहत मिलनी चाहिए।

सरकारी वकील ने किया विरोध

सरकारी वकील ने इसका विरोध करते हुए कहा कि आरोपी की उम्र उस समय 16 साल से ज्यादा थी, इसलिए वह 1986 के कानून के तहत नाबालिग नहीं माना जा सकता। साथ ही उन्होंने कहा कि 2000 का कानून पुराने मामलों पर लागू नहीं होता।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला

जस्टिस जितेंद्र कुमार ने राज्य सरकार की आपत्तियों को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला दिया, जैसे- हरी राम बनाम राजस्थान राज्य (2009), दयानंद बनाम हरियाणा राज्य (2011) और राजू बनाम हरियाणा राज्य (2019)। कोर्ट ने कहा कि 2000 का कानून और उसका 2006 का संशोधन सभी लंबित मामलों पर लागू होता है, चाहे वह ट्रायल हो, रिवीजन हो या अपील। कोर्ट ने अशोक बनाम मध्यप्रदेश राज्य (2023) के फैसले का भी जिक्र किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर जांच में यह साबित होता है कि आरोपी अपराध के समय 18 साल से कम उम्र का था, तो उसे जुवेनाइल माना जाएगा, भले ही अपराध पुराने कानून के समय हुआ हो।

मैट्रिक सर्टिफिकेट को माना गया प्राथमिक साक्ष्य

कोर्ट ने कहा कि अगर मैट्रिक सर्टिफिकेट जैसे दस्तावेजों से यह साबित होता है कि आरोपी की उम्र अपराध के समय 18 साल से कम थी, तो उसे संदेह का लाभ मिलना चाहिए। कोर्ट ने माना कि आरोपी नंबर 8 के मामले में नाबालिग होने की संभावना है।

जांच का आदेश

कोर्ट ने सिवान की जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड को 18 अगस्त 2025 से आरोपी की उम्र की जांच शुरू करने और तीन महीने में रिपोर्ट देने का निर्देश दिया है।

यह रहे रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु

  1. जुवेनाइल होने का दावा किसी भी स्टेज पर किया जा सकता है कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नाबालिग होने का दावा ट्रायल, अपील या अंतिम फैसले के बाद भी किया जा सकता है।
  2. पुराने मामलों पर भी लागू होता है नया कानून 2000 का जुवेनाइल जस्टिस एक्ट और उसका 2006 का संशोधन सभी लंबित मामलों पर लागू होता है, भले ही अपराध पुराने कानून के तहत हुआ हो।
  3. दस्तावेजों से उम्र साबित हो तो आरोपी को संदेह का लाभ मैट्रिक सर्टिफिकेट जैसे दस्तावेज अगर उम्र 18 साल से कम साबित करते हैं, तो आरोपी को जुवेनाइल माना जा सकता है।
  4. दोषी पाए जाने पर सजा का कोई असर नहीं अगर जांच में आरोपी को अपराध के समय नाबालिग पाया गया, तो पहले दी गई सजा का कोई प्रभाव नहीं रहेगा और उसे जुवेनाइल बोर्ड के पास भेजा जाएगा।
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Patna
overcast clouds
37 ° C
37 °
37 °
35 %
3.6kmh
86 %
Fri
37 °
Sat
44 °
Sun
44 °
Mon
44 °
Tue
45 °

Recent Comments