मामला सारांश (At a Glance)
| पहलू | विवरण |
| माननीय पीठ | न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर की अध्यक्षता वाली खंडपीठ (Delhi High Court) |
| याचिकाकर्ता | Indian Kanoon (वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार) |
| मूल मुद्दा | क्या अदालतें लीगल वेबसाइट्स को फैसलों में नाम हटाने (De-index) या नाम-आधारित सर्च बंद करने का निर्देश दे सकती हैं? |
| अगली तारीख | 2 सितंबर 2026 |
Legal Database: दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने लीगल डेटाबेस प्लेटफॉर्म ‘इंडियन कानून’ (IndianKanoon) की याचिका पर सुनवाई करते हुए माना कि अदालती फैसलों को केवल पार्टी के नाम से सर्च न करने देना एक मुश्किल व्यवस्था होगी, क्योंकि मुकदमों के केस नंबर या रिट नंबर किसी को याद नहीं रहते।
न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर (Justice C Hari Shankar) की अध्यक्षता वाली खंडपीठ एकल न्यायाधीश (Single Judge) के उस फैसले के खिलाफ दायर अपीलों पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें ‘भूल जाने के अधिकार’ (Right to be Forgotten) के तहत बरी या डिस्चार्ज हुए व्यक्तियों के नाम वाले फैसलों को सर्च इंजन से हटाने (De-index) और नाम-आधारित सर्च को अक्षम करने का निर्देश दिया गया था।
Legal Database: अदालत की मुख्य टिप्पणियां और चिंताएं
- पहुंच (Accessibility) पर गंभीर प्रभाव:“प्रथम दृष्टया देखने पर, यह कहना कि कोई व्यक्ति पार्टी का नाम देकर फैसला नहीं खोज सकता, एक कठिन व्यवस्था होगी। सार्वजनिक हित (Public Interest) निश्चित रूप से सूचना की पहुंच में है। किसी को नहीं पता कि केस का रिट नंबर या ब्योरा क्या है।”
- कानूनी अनुसंधान पर असर:
- जस्टिस शंकर ने टिप्पणी की कि वकीलों, शोधकर्ताओं और जजों द्वारा Manupatra, SCC Online और IndianKanoon जैसे प्लेटफार्मों का इस्तेमाल रोज़ किया जाता है। यदि केवल केस नंबर से फैसलों की खोज करनी पड़े, तो यह अत्यंत कठिन होगा और यह शब्द-आधारित खोज (Word Search) का विकल्प नहीं हो सकता।
Legal Database: सुनवाई के दौरान मुख्य दलीलें
- इंडियन कानून (याचिकाकर्ता) का तर्क
- वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने तर्क दिया कि हाई कोर्ट का फैसला अदालत का एक स्थायी रिकॉर्ड (Record of Court) होता है। इसे समाचार वेबसाइटों या सामान्य सर्च इंजन के साथ नहीं जोड़ा जा सकता।
- उन्होंने कहा कि जब तक पॉक्सो (POCSO), यौन अपराध या किशोरों से जुड़े मामले न हों, तब तक सार्वजनिक अदालती रिकॉर्ड पर गोपनीयता का अधिकार लागू नहीं होता। नाम-आधारित सर्च को रोकना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) (व्यापार की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 19(1)(a) (सूचना के अधिकार) का उल्लंघन है।
- प्रतिवादी का तर्क
- वरिष्ठ अधिवक्ता अखिल सिब्बल ने तर्क दिया कि वर्षों पहले बरी या डिस्चार्ज हो चुके व्यक्तियों के सम्मान और निजता की रक्षा के लिए एकल पीठ ने De-indexing और Masking का संतुलन बनाया है, जिसे अन्य मध्यस्थों ने स्वीकार कर लिया है।
Legal Database: मामले का अगला कदम
दिल्ली हाई कोर्ट ने अपीलों को स्वीकार करते हुए नोटिस जारी किया है और माना है कि यह मामला कानूनी सूचनाओं तक पहुंच और खुले न्याय के सिद्धांत से जुड़े गंभीर मुद्दों को उठाता है। मामले की विस्तृत सुनवाई 2 सितंबर 2026 को तय की गई है।

