Wednesday, September 30, 2026
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Live-in Relationship: शादीशुदा पुरुष का लिव-इन में रहना अपराध नहीं…कानून और सामाजिक नैतिकता अलग रखें

Live-in Relationship: इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Liberty) और सामाजिक नैतिकता (Social Morality) के बीच के अंतर को स्पष्ट करने वाला एक बड़ा कानूनी मोड़ है।

जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की डिवीजन बेंच ने एक लिव-इन कपल को सुरक्षा प्रदान करते हुए कहा कि कानून और सामाजिक नैतिकता (Social Morality) को अलग-अलग रखा जाना चाहिए। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि किसी बालिग (Adult) की पसंद और उसके अधिकारों की रक्षा करना अदालत का प्राथमिक कर्तव्य है, चाहे समाज की नजर में वह अनैतिक ही क्यों न हो।

मामला क्या था? (The Case)

  • याचिका: शाहजहांपुर के एक जोड़े (अनामिका और नेत्रपाल) ने सुरक्षा की मांग करते हुए याचिका दायर की थी। महिला के परिवार वाले उन्हें जान से मारने की धमकी दे रहे थे और उन्हें ‘ऑनर किलिंग’ (Honour Killing) का डर था।
  • विरोध: महिला के परिवार के वकील ने तर्क दिया कि चूंकि पुरुष (नेत्रपाल) पहले से शादीशुदा है, इसलिए उसका दूसरी महिला के साथ रहना एक अपराध है।

कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां: कानून बनाम नैतिकता

  • बेंच ने परिवार के तर्कों को खारिज करते हुए कुछ बहुत ही स्पष्ट बातें कहीं।
  • अपराध नहीं: “ऐसा कोई अपराध नहीं है जहां एक शादीशुदा पुरुष, किसी वयस्क (Adult) के साथ उसकी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रहे और उसे इसके लिए सजा दी जा सके।”
  • नैतिकता का दायरा: कोर्ट ने कहा कि अगर कानून के तहत कोई अपराध नहीं बनता है, तो सामाजिक राय या नैतिकता नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने के कोर्ट के कर्तव्य में बाधा नहीं बन सकती।
  • पुलिस की जिम्मेदारी: कोर्ट ने ‘शक्ति वाहिनी बनाम भारत संघ’ (2018) मामले का हवाला देते हुए कहा कि दो वयस्कों की सुरक्षा करना पुलिस का कर्तव्य है।

युगल जोड़े को मिली बड़ी राहत

  • कोर्ट ने इस मामले में तत्काल प्रभाव से निम्नलिखित निर्देश जारी किए।
  • गिरफ्तारी पर रोक: याचिकाकर्ताओं (अनामिका और नेत्रपाल) को भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 87 के तहत दर्ज किडनैपिंग के मामले में गिरफ्तार नहीं किया जाएगा।
  • परिवार पर पाबंदी: महिला के परिवार को कपल को किसी भी तरह का नुकसान पहुँचाने, उनके घर में घुसने या उनसे संपर्क करने (सीधे या परोक्ष रूप से) से रोक दिया गया है।
  • SP की जिम्मेदारी: शाहजहाँपुर के पुलिस अधीक्षक (SP) को व्यक्तिगत रूप से कपल की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है।

कानून की नजर में सहमति सर्वोपरि

यह फैसला एक बार फिर स्थापित करता है कि भारत में अनुच्छेद 21 (Right to Life and Liberty) के तहत दो बालिग लोग अपनी मर्जी से साथ रहने के लिए स्वतंत्र हैं। भले ही एक पक्ष शादीशुदा हो, उनका साथ रहना ‘सिविल गलत’ (जैसे तलाक का आधार) तो हो सकता है, लेकिन यह कोई आपराधिक कृत्य नहीं है जिसके लिए उन्हें पुलिस या समाज द्वारा प्रताड़ित किया जाए।

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