Wednesday, November 4, 2026
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Alimony Reduce: स्थायी गुजारा भत्ता का उद्देश्य संपत्ति का समानीकरण करना नहीं: पत्नी का 2 करोड़ का एलिमनी घटाकर 50 लाख रुपये क्यों किया?

हाईकोर्ट के मुख्य कानूनी निष्कर्ष

  • अलिमनी का सिद्धांत (Principle of Alimony): हाईकोर्ट ने माना कि केवल पति की उच्च आय होने से पत्नी को असंगत या अत्यधिक मुआवजा नहीं दिया जा सकता:“स्थायी गुजारा भत्ता (Permanent Alimony) का उद्देश्य पक्षों की परिसंपत्तियों या संपत्ति को बराबर करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि पत्नी सम्मानपूर्वक जीवन यापन कर सके। चूंकि पत्नी खुद एक योग्य डॉक्टर है और उसकी अपनी स्वतंत्र आय है, इसलिए ₹2 करोड़ का एलिमनी अत्यधिक है।” — कर्नाटक हाईकोर्ट
  • विवाह का पुनरुद्धार असंभव: अदालत ने कहा कि मंगलुरु से शुरू होकर यूके तक पहुंची मुकदमेबाजी और लंबे अलगाव ने रिश्ते को इस मोड़ पर पहुंचा दिया है जहां से सुलह संभव नहीं है।

बेंगलुरु: कर्नाटक हाईकोर्ट की खंडपीठ ने वैवाहिक विवादों, क्रूरता के आधार पर विवाह विच्छेद और हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (HMA) की धारा 25 के तहत स्थायी गुजारा भत्ता (Permanent Alimony) के निर्धारण पर एक अत्यंत संतुलित और नजीर पेश करने वाला फैसला सुनाया है।

न्यायमूर्ति डी.के. सिंह और न्यायमूर्ति एच. शांति भूषण की खंडपीठ ने पति द्वारा फैमिली कोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर अपील का निस्तारण करते हुए तलाक की डिक्री को बरकरार रखा, लेकिन फैमिली कोर्ट द्वारा तय किए गए ₹2 करोड़ के स्थायी गुजारे भत्ते को घटाकर ₹50 लाख कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया है कि गुजारा भत्ते का उद्देश्य पति और पत्नी की कुल संपत्ति या संपत्ति के स्तर को बराबर करना नहीं है, बल्कि यह देखना है कि पत्नी उचित गरिमा और परिस्थितियों के अनुसार अपना भरण-पोषण कर सके। कोर्ट ने माना कि यदि पत्नी स्वयं एक उच्च शिक्षित मेडिकल पेशेवर है और उसकी स्वतंत्र आय व संपत्ति है, तो पति की अधिक आय मात्र अत्यधिक एकमुश्त भत्ते का आधार नहीं बन सकती।

उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां

1. स्थायी गुजारा भत्ता संपत्ति का समानीकरण नहीं खंडपीठ ने स्थायी गुजारा भत्ता तय करने के सिद्धांतों की व्याख्या करते हुए कहा: “स्थायी गुजारा भत्ता (Permanent Alimony) का उद्देश्य दोनों पक्षों की संपत्ति या धन का समानीकरण (Equalise Wealth) करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि पत्नी उचित गरिमा के साथ और मामले की परिस्थितियों के अनुसार अपना भरण-पोषण करने में सक्षम हो सके। याचिकाकर्ता एक योग्य मेडिकल पेशेवर (डॉक्टर) है, कार्यरत है और उसके पास आय का एक स्वतंत्र स्रोत तथा अपनी वित्तीय संपत्ति है। स्थायी गुजारा भत्ते की मात्रा निर्धारित करते समय ये परिस्थितियां अत्यंत प्रासंगिक हैं।”

2. पति की आय अधिक होने मात्र से असंगत एकमुश्त राशि नहीं थोपी जा सकती

  • अदालत ने रेखांकित किया कि पति की आय अधिक होने से स्वतः ही अत्यधिक बड़ी राशि का अवार्ड न्यायसंगत नहीं हो जाता।
  • गुजारा भत्ता पत्नी की वास्तविक जरूरतों और पति की देनदारियों/भुगतान क्षमता के बीच उचित संतुलन पर आधारित होना चाहिए, जिससे पति पर अनुचित वित्तीय बोझ न पड़े।
  • कोर्ट ने संज्ञान लिया कि पति ने यूके (UK) में चले मुकदमों में लगभग ₹84 लाख खर्च किए हैं और उस पर बुजुर्ग माता-पिता व दो बेटियों के भविष्य का वित्तीय दायित्व भी है।

3. क्रूरता और वैवाहिक रिश्ते का समग्र मूल्यांकन

  • कोर्ट ने कहा कि साक्ष्यों का मूल्यांकन किसी एक घटना को अलग करके नहीं, बल्कि वैवाहिक संबंधों के संचयी प्रभाव (Cumulative Effect) के रूप में किया जाना चाहिए:“मंगलुरु के वैवाहिक घर से शुरू हुआ यह विवाद यूके तक पहुंचा, देश की सीमाओं को पार कर अंततः हमारे समक्ष आया। मुकदमों का यह लंबा सफर, लंबी अलहदगी और दोनों के बीच पनपी कड़वाहट यह दर्शाती है कि संबंध किस हद तक टूट चुके हैं। विवाह से साहचर्य, विश्वास और भावनात्मक सुरक्षा की अपेक्षा की जाती है; इसे मुकदमों और आरोपों-प्रत्यारोपों का अंतहीन स्रोत नहीं बनाया जा सकता।”

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (डॉक्टर दंपत्ति का विवाद)

  • विवाह व पृष्ठभूमि: दोनों कॉलेज के सहपाठी थे और उनका विवाह वर्ष 2011 में हुआ था। बाद में दोनों यूनाइटेड किंगडम (UK) शिफ्ट हो गए, जहां उनके दो बेटियां हुईं।
  • आरोप-प्रत्यारोप: संबंधों में खटास आने के बाद पत्नी ने मंगलुरु फैमिली कोर्ट में क्रूरता के आधार पर तलाक और ₹5 करोड़ के स्थायी गुजारा भत्ते की मांग की। पति ने दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना (Section 9 HMA) का दावा पेश किया।
  • पारिवारिक न्यायालय (Family Court) का आदेश: मंगलुरु की फैमिली कोर्ट ने पति के दावे को खारिज करते हुए विवाह विच्छेद की डिक्री दी और पत्नी को ₹2 करोड़ का स्थायी गुजारा भत्ता तथा दोनों बेटियों के लिए ₹25,000 प्रति माह (हर 2 साल में ₹5,000 की वृद्धि सहित) का आदेश दिया था।
  • वित्तीय स्थिति:
    • पति की वार्षिक आय लगभग ₹70 लाख थी।
    • डॉक्टर-पत्नी की शुद्ध मासिक आय लगभग ₹1.22 लाख थी।

हाईकोर्ट का अंतिम आदेश और निर्देश

  1. गुजारा भत्ते में संशोधन: पत्नी को देय स्थायी गुजारा भत्ता ₹2 करोड़ से घटाकर ₹50,00,000 (पचास लाख रुपये) कर दिया गया, जिसका भुगतान पति को 3 महीने के भीतर करना होगा।
  2. बच्चों का मासिक भरण-पोषण: पति दोनों बेटियों में से प्रत्येक को ₹25,000 प्रति माह (कुल ₹50,000 प्रति माह) उनके बालिग होने तक भरण-पोषण, शिक्षा और चिकित्सा आवश्यकताओं के लिए देगा। इसके अलावा, वह बेटियों के विवाह के समय भी उचित वित्तीय योगदान देगा।
  3. कस्टडी एवं रीलोकेशन की शर्तें:
    • बेटियों की भौतिक अभिरक्षा (Physical Custody) पत्नी के पास रहेगी, जबकि पिता को मिलने का अधिकार (Visitation Rights) प्राप्त होगा।
    • पत्नी बच्चों को पति की पूर्व सूचना और अदालत के उचित आदेश के बिना भारत से बाहर स्थायी या अस्थायी रूप से स्थानांतरित (Relocate) नहीं करेगी।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: वैवाहिक अपील [2026 LiveLaw (Kar) 348]
  • प्रासंगिक कानून: हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (HMA) की धारा 13(1)(ia) (क्रूरता के आधार पर तलाक) एवं धारा 25 (स्थायी गुजारा भत्ता व भरण-पोषण)
  • पीठ: न्यायमूर्ति डी.के. सिंह और न्यायमूर्ति एच. शांति भूषण (कर्नाटक उच्च न्यायालय)

Alimony Reduce: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतकर्नाटक उच्च न्यायालय (Karnataka High Court)
पीठासीन न्यायाधीशन्यायमूर्ति डी.के. सिंह व न्यायमूर्ति एच. शांति भूषण
विवाह वर्ष2011 (दोनों कॉलेज सहपाठी थे, दो बेटियां हैं)
फैमिली कोर्ट का आदेशतलाक मंजूर; ₹2 करोड़ का एलिमनी और ₹25,000/माह प्रति बच्चा भरण-पोषण
हाईकोर्ट का संशोधनस्थायी एलिमनी घटाकर ₹50 लाख किया; बच्चों के लिए कुल ₹50,000/माह का आदेश

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