हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी सिद्धांत
- अलग मेमोरेंडम की कोई वैधानिक आवश्यकता नहीं (NALSA Regulation 17):पीठ ने विनियम 15 और 17 का विश्लेषण करते हुए कहा कि कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो लोक अदालत के समक्ष जाने से पहले या अवॉर्ड के साथ अलग से समझौता ज्ञापन प्रस्तुत करने को अनिवार्य बनाता हो।“लोक अदालत अवॉर्ड स्वयं पक्षों के बीच हुए समझौते को औपचारिक रूप देने का कार्य कर सकता है। समझौता होना, पक्षों द्वारा हस्ताक्षर किया जाना और सदस्यों द्वारा काउंटर-साइन किया जाना—बिना समय के अंतर के एक ही समय में (simultaneous single event) संपन्न हो सकता है।”
- मुआवजा/राशि प्राप्त कर धोखाधड़ी का दावा नहीं:सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों (K. Srinivasappa v. Mallanna एवं Bhakti Vinaykumar Khatu v. Jayanti Bhaskar Shirsat) का हवाला देते हुए पीठ ने माना कि जो पक्षकार समझौते के तहत दी गई राशि/प्रतिफल स्वीकार कर लेते हैं और अपने पास रखते हैं, वे बाद में धोखाधड़ी का आरोप लगाकर लोक अदालत के अवॉर्ड को चुनौती नहीं दे सकते।
- धारा 19 बनाम धारा 22C (Pecuniary Jurisdiction):अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 22C के तहत लागू आर्थिक सीमाएं स्थायी लोक अदालत (Permanent Lok Adalat) पर लागू होती हैं, न कि धारा 19 के तहत आयोजित सामान्य लोक अदालत (Lok Adalat) पर। कैनरा बैंक बनाम जी.एस. जयराम (2022) मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि धारा 19 की लोक अदालतें विवादों का निपटारा पक्षों की सहमति व समझौते से कराती हैं, न कि न्यायिक अधिनिर्णय (Adjudication) के जरिए।
हैदराबाद: विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 (Legal Services Authorities Act, 1987 – LSA Act) की धारा 20 एवं धारा 21 (लोक अदालत अवॉर्ड की वैधानिकता व डिक्री का दर्जा), राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (लोक अदालत) विनियम, 2009 (NALSA Regulations, 2009) के विनियम 15 व 17 के तहत अवॉर्ड तैयार करने की प्रक्रिया, धारा 19 के तहत गठित सामान्य लोक अदालत बनाम धारा 22B/22C के तहत गठित स्थायी लोक अदालत (Permanent Lok Adalat – PLA) की आर्थिक क्षेत्राधिकार (Pecuniary Jurisdiction) सीमाएं, तथा समझौते के तहत प्रतिफल राशि प्राप्त कर लेने के बाद ‘धोखाधड़ी’ के आधार पर अवॉर्ड को चुनौती देने पर विधिक रोक (Doctrine of Estoppel) पर तेलंगाना हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं नजीरपरक निर्णय सुनाया है।
न्यायमूर्ति मौसमी भट्टाचार्य और न्यायमूर्ति रेणुका यारा की खंडपीठ ने वर्ष 2013 में एक पंजीकृत विक्रय विलेख (Registered Sale Deed) के निष्पादन को लेकर पारित लोक अदालत अवॉर्ड को चुनौती देने वाली रिट याचिका को खारिज करते हुए यह ऐतिहासिक विधिक व्यवस्था दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि अधिनियम और 2009 के विनियमों के तहत लोक अदालत के समक्ष प्रस्तुत होने से पहले किसी पृथक समझौता ज्ञापन (Memorandum of Settlement) का होना जरूरी नहीं है; पक्षों द्वारा लोक अदालत के समक्ष समझौता करना, उस पर पक्षों द्वारा हस्ताक्षर करना और सदस्यों द्वारा उस पर प्रति-हस्ताक्षर (Countersigning) करना—यह सब एक ही समय में, एक साथ (Simultaneous single event all at one go) संपन्न हो सकता है।
उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायिक निष्कर्ष एवं विधिक व्यवस्था
1. ‘अलग से समझौता ज्ञापन संलग्न करने की कोई सांविधिक अनिवार्यता नहीं’
खंडपीठ ने 1987 के अधिनियम और 2009 के विनियमों की विस्तृत व्याख्या करते हुए व्यवस्था दी: “लोक अदालत अवॉर्ड के लिए यह कोई सांविधिक अनिवार्यता नहीं है कि उसमें समझौते का कोई पृथक ज्ञापन (Memorandum of Settlement of Compromise) शामिल हो, जो लोक अदालत आने से पहले पक्षों के बीच निष्पादित किया गया हो, या लोक अदालत अवॉर्ड के साथ ऐसा कोई ज्ञापन संलग्न हो। अधिनियम और विनियम यह स्पष्ट करते हैं कि लोक अदालत अवॉर्ड स्वयं पक्षों द्वारा लोक अदालत के समक्ष किए गए समझौते/सुलह को औपचारिक रूप देने (Act of formalising the Settlement) का एक दस्तावेज हो सकता है; जहाँ पक्षकार लोक अदालत की उपस्थिति में हस्ताक्षर करते हैं और लोक अदालत के सदस्य उस पर प्रति-हस्ताक्षर करते हैं।”
2. ‘समझौता, हस्ताक्षर और प्रति-हस्ताक्षर: एक ही समय में एकल प्रक्रिया’:
अदालत ने प्रक्रियात्मक सहजता को स्पष्ट करते हुए कहा: “पक्षों के बीच विवादों का समझौता/सुलह, पक्षकारों द्वारा उस पर हस्ताक्षर किया जाना और लोक अदालत के सदस्यों द्वारा समझौते पर प्रति-हस्ताक्षर किया जाना—ये सभी कार्य बिना किसी समयांतराल के एक ही समय में एक साथ (Simultaneous single event all at one go) संपन्न किए जा सकते हैं।”
3. धारा 20(4) का पूर्ण अनुपालन:
- अदालत ने पाया कि आक्षेपित अवॉर्ड के प्रारंभिक भाग में ही स्पष्ट रूप से दर्ज था कि पक्षों ने विवाद को सुलझा लिया है और यह अवॉर्ड उसी समझौते की शर्तों के अनुसार पारित किया जा रहा है।
- विनियम 17(2) के तहत समझौता तब अवॉर्ड का रूप ले लेता है जब पक्षकार उस पर हस्ताक्षर या अंगूठे का निशान लगाते हैं और लोक अदालत के सदस्य उस पर प्रति-हस्ताक्षर कर अपनी अंतिम मुहर लगा देते हैं।
4. प्रतिफल रखकर धोखाधड़ी का आरोप लगाना अस्वीकार्य:
- शीर्ष अदालत के निर्णयों (के. श्रीनिवासप्पा बनाम मल्लन्ना, 2022 और भक्ति विनयकुमार खातू बनाम जयंती भास्कर शिरसाट, 2026) का हवाला देते हुए खंडपीठ ने कहा कि जो पक्षकार किसी समझौते के तहत प्रतिफल (Consideration) प्राप्त कर लेते हैं और उसे अपने पास बनाए रखते हैं, वे बाद में कपट या धोखाधड़ी का आरोप लगाकर लोक अदालत अवॉर्ड को चुनौती नहीं दे सकते।
- वर्तमान मामले में, याचिकाकर्ताओं के पूर्वज (GPA धारक) ने ₹85 लाख का अग्रिम प्रतिफल स्वीकार किया था, जिसे याचिकाकर्ताओं ने अपने पास रखा हुआ था और अपने पूर्वज के हस्ताक्षरों को भी स्वीकार किया था।
5. आर्थिक क्षेत्राधिकार (Pecuniary Jurisdiction) की आपत्ति निरस्त:
- याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि ₹1 करोड़ के विवाद में लोक अदालत के पास आर्थिक क्षेत्राधिकार नहीं था।
- खंडपीठ ने केनरा बैंक बनाम जी.एस. जयरामा (2022, SC) का हवाला देते हुए स्पष्ट किया:
- धारा 22C की आर्थिक सीमा केवल ‘स्थायी लोक अदालत’ (Permanent Lok Adalat) पर लागू होती है, जो जनोपयोगी सेवाओं के विवादों का न्यायनिर्णयन (Adjudication) करती है।
- धारा 19 के तहत आयोजित होने वाली सामान्य लोक अदालतें सुलह और समझौते (Compromise, not Adjudication) के आधार पर काम करती हैं; उन पर ऐसी कोई आर्थिक क्षेत्राधिकार की बंदिश लागू नहीं होती।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं विधिक घटनाक्रम
| चरण / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं दलीलें |
| विवाद का विषय | ₹1 करोड़ के कुल प्रतिफल के लिए भूमि विक्रय का एक पंजीकृत समझौता। क्रेता ने ₹85 लाख का भुगतान कर दिया था, जबकि ₹15 लाख की शेष राशि बैनामे के समय देय थी। |
| 2013 का लोक अदालत अवॉर्ड | विवाद लोक अदालत में पहुंचा। दोनों पक्षों ने समझौता किया जिसके तहत विक्रेताओं के सामान्य मुख्तारनामा (GPA) धारक ने दो महीने में रजिस्ट्री करने की सहमति दी और क्रेता ने शेष ₹15 लाख का भुगतान व पंजीकरण शुल्क वहन करने का वचन दिया। |
| याचिकाकर्ताओं की चुनौती | विक्रेताओं के प्रतिनिधि (GPA धारक) की पत्नी और पुत्री (जो मूल कार्यवाही में पक्षकार नहीं थीं) ने रिट याचिका दायर कर अवॉर्ड को चुनौती दी। उनका दावा था: (1) कोई अलग से हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापन नहीं था, (2) अवॉर्ड धोखाधड़ी से प्राप्त किया गया, और (3) लोक अदालत के पास ₹1 करोड़ के मामले का क्षेत्राधिकार नहीं था। |
| क्रेता का पक्ष | क्रेता ने दलील दी कि अवॉर्ड दोनों पक्षों की भौतिक उपस्थिति में हस्ताक्षरित हुआ था, विक्रेताओं के वैध अधिकृत GPA ने हस्ताक्षर किए थे और याचिकाकर्ताओं ने प्राप्त ₹85 लाख की राशि को अपने पास रखा हुआ था। |
| हाईकोर्ट का निष्कर्ष | रिट याचिका पूरी तरह खारिज। अवॉर्ड सांविधिक मानकों और विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम के अनुरूप पाया गया। |
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: नालसा विनियम, 2009 और LSA एक्ट, 1987
- नालसा (लोक अदालत) विनियम, 2009 के विनियम 15, 17(2) व 17(6):
- विनियम 17(2): स्पष्ट करता है कि जैसे ही पक्षकार अपनी सहमत शर्तों पर हस्ताक्षर करते हैं या अंगूठे का निशान लगाते हैं और लोक अदालत के पीठासीन सदस्य उस पर प्रति-हस्ताक्षर करते हैं, वह दस्तावेज स्वतः एक विधिक ‘अवॉर्ड’ (Award) बन जाता है।
- विनियम 17(6): सदस्यों को केवल उसी समझौते पर हस्ताक्षर करने का निर्देश देता है जो उनकी उपस्थिति में हुआ हो। अलग से पूर्व-लिखित दस्तावेज लाने की कोई अनिवार्यता नहीं है।
- धारा 19 (सामान्य लोक अदालत) बनाम धारा 22B/22C (स्थायी लोक अदालत):
- कई वादी दोनों निकायों के क्षेत्राधिकार को लेकर भ्रमित होते हैं।
- धारा 19 के तहत गठित लोक अदालतें सिविल कोर्ट, क्रिमिनल कंपाउंडेबल मामलों और पूर्व-मुकदमेबाजी (Pre-litigation) के विवादों को पक्षों की सहमति से सुलझाती हैं। यहाँ कोई आर्थिक सीमा नहीं होती।
- धारा 22C के तहत स्थायी लोक अदालत केवल जनोपयोगी सेवाओं (बिजली, पानी, परिवहन, डाक) के लिए होती है, जहाँ समझौता न होने पर अदालत गुण-दोष के आधार पर फैसला (Adjudication) सुना सकती है, इसलिए वहाँ ₹1 करोड़ (अधिसूचना के अनुसार) की सीमा लागू होती है।
- सिविल कोर्ट डिक्री का दर्जा (धारा 21 LSA Act):
- धारा 21(1) के अनुसार, लोक अदालत का अवॉर्ड सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के तहत एक सक्षम सिविल कोर्ट की डिक्री माना जाता है।
- धारा 21(2) के तहत ऐसे अवॉर्ड के विरुद्ध कोई अपील नहीं होती। इसे केवल असाधारण परिस्थितियों में अनुच्छेद 226 के तहत स्पष्ट और अकाट्य धोखाधड़ी (Patent Fraud) साबित होने पर ही चुनौती दी जा सकती है, जो वर्तमान मामले में अनुपस्थित थी।
विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता
- केस संदर्भ: श्रीमती व अन्य बनाम मंडल विधिक सेवा समिति व अन्य [रिट याचिका – तेलंगाना उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति मौसमी भट्टाचार्य और न्यायमूर्ति रेणुका यारा (खंडपीठ)
- निर्णय की तिथि: 17 अक्टूबर 2026
- संबद्ध मूल विषय: 2013 का लोक अदालत समझौता अवॉर्ड (पंजीकृत विक्रय विलेख का निष्पादन)
विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ताओं की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता बी. मयूर रेड्डी
- मंडल विधिक सेवा समिति की ओर से: स्टैंडिंग काउंसिल पुसुलुरी शशि किरण
- प्रतिवादी संख्या 2 (क्रेता) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक रेड्डी
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 (LSA Act) — धारा 19 (लोक अदालत का गठन), धारा 20 (अदालतों द्वारा संज्ञान व प्रक्रिया), धारा 21 (अवॉर्ड को सिविल डिक्री का दर्जा) एवं धारा 22C (स्थायी लोक अदालत की सीमाएं)
- राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (लोक अदालत) विनियम, 2009 (NALSA Regulations) — विनियम 15 (समझौते का प्रस्ताव) एवं विनियम 17 (अवॉर्ड का प्रारूप व हस्ताक्षर प्रक्रिया)
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 226 (अवॉर्ड के विरुद्ध रिट क्षेत्राधिकार की संकीर्ण सीमा)
- संबद्ध न्यायिक नजीरें:
- के. श्रीनिवासप्पा बनाम मल्लन्ना [(2022) 12 SCC 81] — ‘समझौते के तहत वित्तीय लाभ और प्रतिफल प्राप्त कर लेने वाले पक्षकार बाद में कपट के आरोप लगाकर लोक अदालत अवॉर्ड को चुनौती नहीं दे सकते।’
- भक्ति विनयकुमार खातू बनाम जयंती भास्कर शिरसाट (2026) — ‘प्रतिफल बनाए रखकर समझौते को अमान्य ठहराने की याचिका विधिक रूप से अस्वीकार्य है।’
- केनरा बैंक बनाम जी.एस. जयरामा [(2022) 7 SCC 776] — ‘धारा 19 की लोक अदालत केवल सहमति से समझौता कराती है, अतः उस पर धारा 22C की आर्थिक सीमा लागू नहीं होती।’
- अंतिम परिणाम: रिट याचिका और सभी संबद्ध अंतरिम आवेदन बिना किसी हर्जाने के पूरी तरह खारिज; 2013 का लोक अदालत समझौता अवॉर्ड पूर्णतः वैध, अंतिम और बाध्यकारी घोषित।
Lok Adalat:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | तेलंगाना उच्च न्यायालय (Telangana High Court) |
| पीठ | न्यायमूर्ति मौसमी भट्टाचार्य एवं न्यायमूर्ति रेणुका यारा |
| संबंधित कानून | कानूनी सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 (धारा 19, 20 व 22C) और NALSA विनियम, 2009 (विनियम 15 व 17) |
| मुख्य कानूनी प्रश्न | क्या लोक अदालत द्वारा जारी अवॉर्ड के लिए अलग से हस्ताक्षरित समझौता पत्र/मेमोरेंडम होना कानूनी रूप से अनिवार्य है? |
| अदालत का अंतिम निर्णय | याचिका खारिज; लोक अदालत के समक्ष पक्षों द्वारा समझौता करना, हस्ताक्षर करना और लोक अदालत सदस्यों द्वारा प्रति-हस्ताक्षर (Countersign) करना एक साथ single event के रूप में हो सकता है। |

