इस्तीफे में उठाए गए 3 मुख्य मुद्दे
- सार्थक विचार-विमर्श की उपेक्षा और प्रश्नावली में जल्दबाजी: जस्टिस चव्हाण ने बताया कि समिति की बैठक में तीन सदस्यों ने सुझाव दिया था कि सार्वजनिक फीडबैक की प्रश्नावली को कानूनी और अकादमिक विशेषज्ञों से जांच कराया जाए। हालांकि, इन सुझावों को दरकिनार कर दिया गया क्योंकि अध्यक्ष ने पहले से ही अपनी ओर से तैयार प्रश्नावली को अंतिम रूप दे दिया था।
- सार्वजनिक राय को ‘हाँ या ना’ तक सीमित करना: पूर्व जज ने निराशा व्यक्त करते हुए लिखा कि उनका मानना था कि समिति का उद्देश्य महाराष्ट्र की जनता से विचार मांगना और देर से शादी, तलाक, वैवाहिक विवादों के त्वरित समाधान जैसे मुद्दों पर सर्वसम्मति बनाना था।“लेकिन मुझे अहसास हुआ कि अब समिति का एकमात्र उद्देश्य केवल ‘हाँ या ना’ वाले उत्तर एकत्र करना है ताकि डेटा का विश्लेषण आसान हो सके, न कि जनता के वास्तविक विचारों को समझना।”
- गैर-सदस्य का हस्तक्षेप (Interference of Non-Member): जस्टिस चव्हाण ने समिति की वेबसाइट और बैठकों में पूर्व आईएएस अधिकारी शत्रुघ्न सिंह की सक्रिय भागीदारी और निर्देशों पर भी सवाल उठाए, जो कि समिति के आधिकारिक सदस्य भी नहीं हैं।
मुंबई: महाराष्ट्र में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code – UCC) का मसौदा तैयार करने के लिए गठित उच्च स्तरीय समिति की कार्यप्रणाली, जनता से सुझाव लेने के तौर-तरीकों, आंतरिक लोकतांत्रिक विमर्श के अभाव और गैर-सदस्यों के अनधिकृत दखल पर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है।
सर्वोच्च न्यायालय की सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाली सात सदस्यीय समिति की हाल ही में आयोजित दूसरी ऑनलाइन बैठक के बाद जस्टिस चव्हाण ने समिति की अध्यक्ष, अन्य सदस्यों और विधि एवं न्याय विभाग के प्रधान सचिव को एक विस्तृत व तीखा इस्तीफा ईमेल भेजा, जिसमें समिति की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। बॉम्बे उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर.सी. चव्हाण ने समिति की निर्णय प्रक्रिया को दरकिनार किए जाने का आरोप लगाते हुए समिति की सदस्यता से तत्काल प्रभाव से इस्तीफा दे दिया है। महाराष्ट्र सरकार ने उनका इस्तीफा औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया है।
जस्टिस आर.सी. चव्हाण द्वारा इस्तीफे में उठाए गए 3 प्रमुख मुद्दे
1. फीडबैक प्रक्रिया को ‘हाँ या ना’ (Yes/No) में समेटना और औपचारिकता बनाना जस्टिस चव्हाण ने जनता की राय जुटाने के सतही दृष्टिकोण पर गहरी निराशा व्यक्त करते हुए लिखा: “अपने विचार रखने का मेरा प्रयास मेरी इस गलतफहमी के कारण था कि हमारी इस कवायद का उद्देश्य महाराष्ट्र की जनता के विचार एकत्र करना और देर से होने वाले विवाह, विकृतियों, बांझपन, अस्थिर वैवाहिक संबंधों और अत्यधिक समय लेने वाले विवाद समाधान तंत्र जैसी गंभीर सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए एक व्यापक जन-सहमति (Consensus) बनाना था। परंतु मुझे बाद में यह समझ आया कि समिति का पूरा ध्यान केवल ‘हाँ या ना’ (Yes or No) में जवाब जुटाने तक सीमित रह गया है, ताकि केवल डेटा का सतही विश्लेषण करना आसान हो सके।”
2. सदस्यों के सुझावों को दरकिनार कर पहले से तैयार प्रश्नावली थोपना
- जस्टिस चव्हाण ने खुलासा किया कि समिति की दूसरी बैठक के दौरान तीन सदस्यों ने अपने सुझाव प्रस्तुत करने का प्रयास किया था, जिसमें यह महत्वपूर्ण प्रस्ताव भी शामिल था कि जनता से पूछे जाने वाले प्रश्नों के प्रारूप (Questionnaire) का किसी प्रतिष्ठित अकादमिक विशेषज्ञ या संस्थान से पेशेवर मूल्यांकन कराया जाए।
- हालांकि, इन सभी सुझावों को निरर्थक (Moot) बना दिया गया क्योंकि समिति की अध्यक्ष जस्टिस रंजना देसाई ने बैठक से पहले ही अपने स्तर पर एक प्रश्नावली को अंतिम रूप दे दिया था और स्पष्ट कर दिया कि वेबसाइट तैयार होते ही इसे सीधे अपलोड कर दिया जाएगा।
3. गैर-नियुक्त बाहरी व्यक्ति (Outsider) का अनधिकृत हस्तक्षेप
- जस्टिस चव्हाण ने समिति की वेबसाइट और तकनीकी संशोधनों के संबंध में एक पूर्व आईएएस अधिकारी शत्रुघ्न सिंह (Shatrughna Singh) की सक्रिय भागीदारी और उनके द्वारा दिए जा रहे निर्देशों पर कड़ा एतराज जताया।
- उन्होंने सवाल उठाया कि एक गैर-सदस्य बाहरी व्यक्ति को समिति के मामलों को निर्देशित करने का अधिकार कैसे दिया जा सकता है, और क्या ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि राज्य के प्रशासनिक अधिकारियों को अपनी स्वयं की विधिक व तकनीकी सक्षमता पर संदेह है।
इस्तीफे का कारण और ‘एक स्वतंत्र नागरिक के रूप में विचार रखने की स्वतंत्रता’
जस्टिस चव्हाण ने अपने पत्र में स्पष्ट किया कि वे समिति में केवल रबर स्टैंप बनकर नहीं रह सकते: “इस समस्या के समाधान के लिए, मैं अभी इस्तीफा देकर समिति में अपना पद रिक्त कर रहा हूं, ताकि सरकार तुरंत इस खाली जगह को भर सके। शीघ्र अधिसूचना जारी होने से मुझे उन लोगों को स्पष्ट रूप से यह बताने में मदद मिलेगी, जो मुझसे यह उम्मीद लेकर मिल रहे थे कि मैं उनके विचारों को समिति के समक्ष रखूंगा, कि अब उन्हें स्वयं अपने स्तर पर प्रयास करना होगा। इससे मुझे जनता और मीडिया से संवाद न करने की पाबंदी (Injunction to avoid interactions) से भी मुक्ति मिल जाएगी। अब एक स्वतंत्र नागरिक (Free Citizen) के रूप में मैं अपने विचार खुलकर व्यक्त करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र रहूंगा।”
समिति की पृष्ठभूमि एवं प्रासंगिकता
- महाराष्ट्र यूसीसी समिति का गठन: उत्तराखंड द्वारा समान नागरिक संहिता विधेयक पारित किए जाने के बाद, महाराष्ट्र सरकार ने राज्य में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गुजारा भत्ता और गोद लेने से संबंधित व्यक्तिगत कानूनों के एकीकरण और अध्ययन के लिए पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई (जो उत्तराखंड यूसीसी समिति और परिसीमन आयोग की भी अध्यक्ष रह चुकी हैं) की अध्यक्षता में 7 सदस्यीय समिति का गठन किया था।
- विवाद का विधिक असर: पूर्व हाईकोर्ट जज के अचानक और सार्वजनिक रूप से सवाल उठाकर इस्तीफा देने से समिति की आंतरिक स्वायत्तता, परामर्श प्रक्रिया की निष्पक्षता और विधि निर्माण की शुचिता पर विधिक और राजनीतिक हलकों में तीखी बहस छिड़ गई है।
विधिक एवं प्रशासनिक विवरण
- समिति: महाराष्ट्र समान नागरिक संहिता (UCC) मसौदा समिति (Maharashtra UCC Drafting Committee)
- अध्यक्ष: न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) रंजना प्रकाश देसाई (पूर्व न्यायाधीश, भारत का सर्वोच्च न्यायालय)
- इस्तीफा देने वाले सदस्य: न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) आर.सी. चव्हाण (पूर्व न्यायाधीश, बॉम्बे उच्च न्यायालय)
- संबद्ध संवैधानिक प्रावधान:
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 44 (राज्य के नीति निदेशक तत्व: सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास)
- भारत का संविधान – 7वीं अनुसूची की समवर्ती सूची (List III) की प्रविष्टि 5 (विवाह, तलाक, उत्तराधिकार एवं दत्तक ग्रहण)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 14, 21 और 25 (समानता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और धार्मिक आचरण की स्वतंत्रता)
- वर्तमान स्थिति: महाराष्ट्र सरकार के विधि एवं न्याय विभाग (Law and Judiciary Department) ने जस्टिस चव्हाण का इस्तीफा औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया है।
Maharashtra UCC: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| समिति का नाम | महाराष्ट्र समान नागरिक संहिता (UCC) ड्राफ्टिंग कमेटी |
| समिति अध्यक्ष | पूर्व न्यायमूर्ति रंजना देसाई (सुप्रीम कोर्ट) |
| इस्तीफा देने वाले सदस्य | पूर्व न्यायमूर्ति आर. सी. चव्हाण (पूर्व जज, बॉम्बे हाईकोर्ट) |
| इस्तीफे का कारण | लोकतांत्रिक प्रक्रिया की उपेक्षा, केवल ‘हाँ या ना’ में राय मांगना और बाहरी हस्तक्षेप |
| महाराष्ट्र सरकार का रुख | इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया है |

