Tuesday, October 27, 2026
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Maintenance case: अगर पैसे नहीं दे सकते, तो पत्नी को साथ रखो…सुप्रीम कोर्ट ने कहा- आज के समय 9 हजार रुपये प्रति महीने वेतन पर कौन नौकरी करता है

Maintenance case: सुप्रीम कोर्ट में गुजारा भत्ता (Maintenance) के एक मामले की सुनवाई के दौरान तब अजीब स्थिति पैदा हो गई जब एक पति ने अपनी आय बहुत कम होने का हवाला दिया।

कोर्ट ने इस पर तंज कसते हुए और कानून की मर्यादा याद दिलाते हुए पति को स्पष्ट विकल्प दिए। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल अपना आदेश सुरक्षित (Reserved) रख लिया है। यह मामला स्पष्ट करता है कि अदालतें गुजारा भत्ता के मामलों में ‘कम आय’ या ‘बेरोजगारी’ के तर्कों को आसानी से स्वीकार नहीं करतीं, खासकर जब पति शारीरिक रूप से काम करने के योग्य हो।

सुनवाई की मुख्य बातें:

  • ₹10,000 का आदेश: सुप्रीम कोर्ट ने परिस्थितियों को देखते हुए पति को अपनी पत्नी को प्रति माह ₹10,000 गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया।
  • पति की दलील: पति ने कोर्ट को बताया कि वह केवल ₹325 प्रति दिन कमाता है। इस हिसाब से उसकी मासिक आय ₹10,000 से भी कम बैठती है, इसलिए वह इतना भुगतान करने में असमर्थ है। उसने कहा कि उसके सहकर्मी इस बात का हलफनामा (Affidavit) देने को तैयार हैं। इस पर कोर्ट ने कहा- कौन कहता है कि प्रति माह 9 हजार रुपये वेतन मिलता है। आप इस बात को हमें मत समझाएं।
  • कोर्ट का ‘समाधान’: जब पति ने कहा कि वह पैसे नहीं दे सकता, तो कोर्ट ने कहा— “तो फिर अपनी पत्नी को साथ रखो। वह तुम्हारे और तुम्हारे बच्चों के लिए खाना बनाएगी।” कोर्ट ने सुझाव दिया कि मतभेदों को सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझाना ही बेहतर है।

विवाद का मोड़

  • तनावपूर्ण रिश्ता: पति ने साथ रहने से इनकार करते हुए कहा कि पत्नी ने उसके और उसके माता-पिता के खिलाफ कई शिकायतें दर्ज कराई हैं, जिससे शादी के बचने की गुंजाइश खत्म हो गई है।
  • कंपनी पर नकेल: पति की कम आय वाली दलील पर संदेह जताते हुए कोर्ट ने कहा कि वे उस कंपनी से संपर्क करेंगे जहाँ पति काम करता है और पूछेंगे कि वे इतना कम वेतन क्यों दे रहे हैं। कोर्ट ने कंपनी के अन्य कर्मचारियों से भी हलफनामा मांगने की बात कही।

कानूनी सिद्धांत: “सक्षम शरीर वाला पति”

  • यह मामला पिछले साल इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक फैसले की याद दिलाता है, जिसका जिक्र इस सुनवाई के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
  • शारीरिक श्रम की बाध्यता: कानून यह मानता है कि यदि पति स्वस्थ और सक्षम (Able-bodied) है, तो वह अपनी पत्नी का भरण-पोषण करने के कर्तव्य से भाग नहीं सकता।
  • बेरोजगारी का बहाना नहीं: कोर्ट का मानना है कि यदि कोई आय नहीं है, तो भी पति को “शारीरिक श्रम” (Manual Labour) करके भी अपनी पत्नी की देखभाल के लिए पैसे कमाने चाहिए।
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