Tuesday, September 8, 2026
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Overcrowded prisons: जेल व्यवस्था पर सुप्रीम टिप्पणी, कहा– सजा का उद्देश्य केवल कैद नहीं, सुधार और पुनर्वास भी

Overcrowded prisons: जेलों में बंद कैदियों की परिस्थितियों को लेकर दायर एक रिट याचिका की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने देश की कारागार व्यवस्था पर महत्वपूर्ण टिप्पणियाो की हैं।

दोषसिद्ध बंदियों के साथ व्यवहार मानव गरिमा में हों: अदालत

सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय खंडपीठ न्यायमूर्ति विक्रम नाथ व न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने कहा, मौजूदा जेल प्रणाली में बंदीकरण की स्थितियां दंड की प्रकृति और उद्देश्य पर गहन पुनर्विचार की मांग करती हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मामला केवल कुछ व्यक्तिगत शिकायतों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राज्य के उस संवैधानिक दायित्व से जुड़ा है जिसके तहत कैदियों, विशेषकर दोषसिद्ध बंदियों के साथ व्यवहार मानव गरिमा और न्यायसंगतता के विकसित मानकों के अनुरूप होना चाहिए।

जेलों में भीड़भाड़ की समस्या पर तत्काल उपाय हो

कोर्ट ने यह भी कहा कि सुधार के उद्देश्य से बनाई गई जेल व्यवस्था को यह सुनिश्चित करना होगा कि वह वास्तव में सुधार, पुनर्वास और समाज में पुनः एकीकरण के मूल्यों को आगे बढ़ाए, न कि केवल दंड और बहिष्कार का माध्यम बनकर रह जाए। सुनवाई के दौरान अदालत ने जेलों में भीड़भाड़ की समस्या पर तत्काल उपायों की आवश्यकता पर बल दिया। साथ ही यह भी कहा कि दीर्घकालिक समाधान के लिए संरचनात्मक और प्रणालीगत सुधार आवश्यक हैं, जिससे कैदियों के पुनर्वास, सामाजिक पुनःएकीकरण और न्याय तक सार्थक पहुंच सुनिश्चित हो सके। सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि वह इस मामले में व्यापक संवैधानिक और संस्थागत दृष्टिकोण अपनाते हुए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कारागार प्रशासन में जवाबदेही और एकरूपता सुनिश्चित करने के पहलुओं पर भी विचार करेगा।

बिंदुवार समझें अदालती निर्देश

  1. संवैधानिक जनादेश और दर्शन

अदालत ने स्पष्ट किया कि ये निर्देश इसलिए जारी किए गए हैं ताकि संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), 15 (भेदभाव का निषेध) और 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) जेल की दीवारों के भीतर भी वास्तविक रूप में लागू हों।

लक्ष्य: जेलों को केवल सजा देने का स्थान नहीं, बल्कि पुनर्वास (Rehabilitation) और सुधार (Reformation) का प्रभावी साधन बनाना।

  1. कैदियों के अधिकार और राज्य की जिम्मेदारी

कोर्ट ने एक बहुत बड़ी बात दोहराई कि कैदी जेल जाने के बाद अपने संवैधानिक अधिकारों को नहीं खो देते। जब किसी की आजादी कानूनन छीनी जाती है, तो राज्य की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि वह उनके साथ मानवता, निष्पक्षता और करुणा से व्यवहार करे। अदालत के अनुसार, लोकतंत्र की ताकत सजा की कठोरता में नहीं, बल्कि उन लोगों को गरिमा, आशा और अवसर वापस देने में है जिन्होंने कानून तोड़ा है।

  1. ‘ओपन जेल’ (OCI) का महत्व

ओपन करेक्शनल इंस्टीट्यूशंस (OCIs) इस संवैधानिक वादे का प्रतीक हैं। यह स्वीकार करता है कि सुधार के लिए भरोसा, जिम्मेदारी और क्रमिक स्वतंत्रता (Graded Liberty) अनिवार्य तत्व हैं।

  1. भविष्य की रूपरेखा और कार्यान्वयन

अदालत ने चेतावनी दी कि पुनर्वास का यह विजन केवल कागजों पर नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे जेलों की वास्तविक स्थितियों में दिखना चाहिए। इसके लिए निम्नलिखित कदम उठाए गए हैं। इस फैसले की प्रति सभी हाई कोर्ट, राज्य सरकारों, गृह मंत्रालय, और राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण (NALSA) सहित सभी प्रमुख हितधारकों को भेजी जाएगी।

विशेष उल्लेख

मामले की अगली सुनवाई 1 सितंबर, 2026 को होगी। उस समय हाई-पावर्ड कमेटी द्वारा प्रस्तुत ‘कॉमन मिनिमम स्टैंडर्ड्स’ (न्यूनतम मानक) के मसौदे पर विचार किया जाएगा। साथ ही 31 मार्च, 2027 को राज्यों द्वारा किए गए अनुपालन और प्रगति की वार्षिक रिपोर्ट पर विचार किया जाएगा।अदालत ने वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर और विजय हंसारिया (एमिकस क्यूरी) के साथ-साथ NALSA की वकील रश्मि नंदाकुमार की उनके गहन शोध और सहायता के लिए सराहना की।

वाद का विवरण

IN THE SUPREME COURT OF INDIA
CIVIL ORIGINAL JURISDICTION
WRIT PETITION (C) NO(S). 1082 OF 2020
SUHAS CHAKMA VERSUS UNION OF INDIA AND ORS.

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