Maintenance Case: घरेलू हिंसा और भरण-पोषण (Maintenance) से जुड़े एक मामले में दिल्ली की एक अदालत ने पतियों के ‘बेरोजगार होने’ के बहानों पर सख्त रुख अपनाया है।
दिल्ली की एक अदालत के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (Additional Sessions Judge) शीतल चौधरी प्रधान ने एक पीड़ित महिला की अपील को स्वीकार करते हुए पति को आदेश दिया कि वह अपने नाबालिग बेटे के पालन-पोषण के लिए हर महीने 6,000 रुपये की अंतरिम भरण-पोषण राशि का भुगतान करे। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि एक पति केवल बेरोजगार होने का दावा करके अपनी पत्नी और नाबालिग बच्चे के प्रति अपनी कानूनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता।
निचली अदालत (Trial Court) का फैसला पलटा
यह मामला ‘घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम’ (PWDV Act) के तहत दायर किया गया था।
ट्रायल कोर्ट का पिछला रुख: सितंबर 2025 में, निचली अदालत ने महिला की शिकायत को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि वह घरेलू हिंसा और आर्थिक शोषण के आरोपों को पूरी तरह साबित करने में नाकाम रही।
हाईकोर्ट/सत्र अदालत का नया आदेश: सत्र अदालत ने 2 जून को दिए अपने फैसले में निचली अदालत के आदेश में संशोधन किया। कोर्ट ने माना कि भले ही शारीरिक क्रूरता के पुख्ता मेडिकल सबूत न मिले हों, लेकिन यह सच है कि पिता ने 2015 से अपने बच्चे को कोई आर्थिक मदद (Financial Support) नहीं दी है।
कमा सकने की क्षमता और असल कमाई में फर्क है: कोर्ट की सख्त टिप्पणियां
अदालत ने पति की उन दलीलों को पूरी तरह से खारिज कर दिया जिसमें उसने खुद को बेरोजगार और पत्नी को शिक्षित बताया था। न्यायाधीश ने अपने आदेश में कई महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत तय किए।
सक्षम शरीर (Able-bodied) होना ही काफी: कोर्ट ने कहा कि पति एक स्वस्थ और सक्षम शरीर वाला व्यक्ति है। वह कमाने की पूरी क्षमता रखता है। अपने खर्चों का प्रबंधन करना उसका काम है, लेकिन वह यह बहाना नहीं बना सकता कि उसके पास नौकरी नहीं है या अन्य जिम्मेदारियां हैं।
पढ़े-लिखे होने का मतलब कमाई नहीं: पति ने दलील दी थी कि पत्नी शिक्षित है, इसलिए वह राहत की हकदार नहीं है। इस पर जज ने कहा, “कमाने की क्षमता रखना और वास्तव में कमाना, दो अलग-अलग बातें हैं।” पति ऐसा कोई पुख्ता दस्तावेज या सबूत कोर्ट में नहीं दे पाया जिससे साबित हो कि पत्नी खुद और बच्चे का पेट भरने के लिए पर्याप्त कमा रही है।
हलफनामा न देना पड़ा भारी: कोर्ट ने नोट किया कि बार-बार मौका दिए जाने के बावजूद पति ने निचली अदालत के सामने अपनी आय का हलफनामा (Income Affidavit) दाखिल नहीं किया था, जो उसकी मंशा पर सवाल उठाता है।
फरवरी 2013 से शुरू हुआ था विवाद
अदालती दस्तावेजों के अनुसार, इस जोड़े की शादी फरवरी 2013 में हुई थी। महिला का आरोप था कि शादी के बाद से ही उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया, मारपीट की गई और मानसिक क्रूरता का शिकार बनाया गया। महिला ने दावा किया कि उसे गर्भावस्था (Pregnancy) के दौरान ही ससुराल से निकाल दिया गया था। साल 2015 में एक फैमिली कोर्ट में समझौते के बाद दोनों कुछ महीने किराए के मकान में साथ रहे, लेकिन विवाद के चलते फिर अलग हो गए। तब से (पिछले 11 सालों से) बेटा अपनी मां के साथ रह रहा था और पिता ने उसकी परवरिश में एक रुपया भी नहीं दिया।
विश्लेषण: भरण-पोषण (Maintenance) पर कोर्ट के फैसले के मायने
| कानूनी पहलू | कोर्ट का स्टैंड और इसका प्रभाव |
| बच्चे की जिम्मेदारी बराबर | कोर्ट ने साफ किया कि बच्चे को जन्म देने के बाद पिता कानूनी और नैतिक रूप से उसकी हर जरूरत (शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन) को पूरा करने के लिए उतना ही जिम्मेदार है जितनी मां। |
| नाबालिग होने तक मिलेगी राशि | कोर्ट ने निर्देश दिया है कि पति को यह 6,000 रुपये प्रति माह की राशि तब तक देनी होगी, जब तक कि उसका बेटा वयस्क (Age of Majority – 18 वर्ष) नहीं हो जाता। |
| बेरोजगारी का बहाना खत्म | यह आदेश उन पतियों के लिए एक कड़ा कानूनी सबक है जो कोर्ट में केवल इसलिए खुद को बेरोजगार या ‘जीरो इनकम’ वाला घोषित कर देते हैं ताकि उन्हें पत्नी या बच्चे को गुजारा भत्ता न देना पड़े। |
बॉटमलाइन (The Bottom Line)
दिल्ली की अदालत का यह फैसला एक बेहद मानवीय और व्यावहारिक दृष्टिकोण को दर्शाता है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि कानूनी तौर पर ब्याही गई पत्नी और पैदा हुए बच्चे की जिम्मेदारी से भागने के लिए ‘नो जॉब’ (No Job) का बहाना कानून स्वीकार नहीं करेगा। एक सक्षम पुरुष को मेहनत मजदूरी करके भी अपने बच्चे का पेट पालना ही होगा। इस फैसले से उस अकेली मां को बड़ी राहत मिली है जो सालों से बिना किसी वित्तीय सहायता के अपने बच्चे का भविष्य संवारने के लिए संघर्ष कर रही थी।

