Thursday, June 11, 2026
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Matrimonial Disputes: पेशेवर रूप से सक्रिय पत्नी का यात्रा न कर पाने का दावा भरोसेमंद नहीं…मात्र 5 महीने चली शादी, जानिए पूरी कहानी

Matrimonial Disputes: पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में मुकदमों के ट्रांसफर को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और व्यावहारिक फैसला सुनाया है।

अमृतसर की अदालत से होशियारपुर केस ट्रांसफर करने की मांग

हाईकोर्ट के जस्टिस निधि गुप्ता की एकल पीठ ने होशियारपुर की रहने वाली एक महिला की याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने अपने पति द्वारा अमृतसर की अदालत में दायर तलाक के मुकदमे को होशियारपुर ट्रांसफर करने की मांग की थी। कोर्ट ने पाया कि मामले में ट्रांसफर के लिए कोई वास्तविक कठिनाई (Genuine Hardship) या पुख्ता आधार मौजूद नहीं है। अदालत ने साफ किया है कि यदि पत्नी पेशेवर रूप से सक्रिय (Professionally Active) है और काम के सिलसिले में यात्राएं करती है, तो केवल दूरी या अकेले यात्रा करने में असमर्थता का बहाना बनाकर पति द्वारा दायर तलाक के मामले को अपने शहर में ट्रांसफर कराने का उसका दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।

यह रही अदालत की टिप्पणी

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस निधि गुप्ता ने टिप्पणी की, “रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों, जिसमें पति द्वारा संलग्न की गई तस्वीरें भी शामिल हैं, से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि आवेदक-पत्नी पेशेवर रूप से (Professionally) सक्रिय है। इसलिए, प्रथम दृष्टया (Prima Facie) उसका यह तर्क कि वह अमृतसर की यात्रा करने में पूरी तरह असमर्थ है, अदालत में बिल्कुल भी भरोसा नहीं जगाता।”

मामला क्या था? (मात्र 5 महीने चली शादी और मॉडल पत्नी का दावा)

पत्नी की दलीलें (आवेदक): यह कानूनी विवाद अमृतसर के एक युवक और होशियारपुर की एक युवती के बीच का है, जिनकी शादी महज पांच महीने ही टिक सकी थी। पत्नी ने कोर्ट में दावा किया कि वह होशियारपुर में अपने माता-पिता के साथ रह रही है, बेरोजगार है और उसके पास आय का कोई स्वतंत्र जरिया नहीं है। उसने यह भी कहा कि अमृतसर और होशियारपुर के बीच 150 किलोमीटर की दूरी है। उसके माता-पिता बुजुर्ग और बीमार हैं, इसलिए उसके साथ अमृतसर कोर्ट जाने के लिए परिवार में कोई पुरुष सदस्य उपलब्ध नहीं है। इसके अलावा, उसने पति के खिलाफ घरेलू हिंसा (498-A) और भरण-पोषण (125 CrPC) का केस पहले ही होशियारपुर में दर्ज कराया हुआ है।

पति के पलटवार (प्रतिवादी): पति ने अदालत में खुद (In Person) पेश होकर पत्नी के दावों की हवा निकाल दी। उसने कोर्ट में तस्वीरें और सबूत पेश करते हुए बताया कि उसकी पत्नी कोई असहाय या बेरोजगार महिला नहीं है, बल्कि वह पेशेवर रूप से एक ‘फैशन मॉडल’ (Fashion Model) है और आर्थिक रूप से पूरी तरह आत्मनिर्भर है। वह अपने मॉडलिंग असाइनमेंट के लिए नियमित रूप से अलग-अलग शहरों की यात्रा करती है।

वकील भाई का प्रभाव: पति ने एक और अहम बिंदु उठाते हुए कहा कि पत्नी का सगा भाई पिछले दो दशकों (20 साल) से होशियारपुर की अदालत में वकालत (Advocate) कर रहा है। ऐसे में अगर केस होशियारपुर ट्रांसफर हुआ, तो वहां के स्थानीय कानूनी प्रभाव के कारण उसके साथ पूर्वाग्रह (Prejudice) हो सकता है और उसे निष्पक्ष न्याय नहीं मिलेगा।

सहानुभूति का नियम मशीनी तरीके से लागू नहीं हो सकता: हाई कोर्ट

पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद यह माना कि आमतौर पर वैवाहिक मामलों में अदालतों का झुकाव पत्नी की सुविधा (Convenience of Wife) की तरफ होता है, लेकिन इस सिद्धांत को आंख बंद करके या मशीनी रूप से (Mechanically) लागू नहीं किया जा सकता।

अदालत ने याचिका खारिज करने के पीछे 4 मुख्य कारण बताए

कोई संतान नहीं: कोर्ट ने नोट किया कि इस शादी से दोनों का कोई बच्चा नहीं है, जिसकी देखभाल या जिम्मेदारी के कारण महिला को यात्रा करने में परेशानी हो।

शारीरिक रूप से सक्षम: महिला ने ऐसा कोई मेडिकल या अन्य दस्तावेज पेश नहीं किया जिससे यह साबित हो सके कि वह शारीरिक रूप से अमृतसर जाने में असमर्थ है।

दूरी बहुत ज्यादा नहीं: कोर्ट ने कहा कि होशियारपुर से अमृतसर के बीच की 150 किलोमीटर की दूरी को आज के समय में 2 से 3 घंटे में आसानी से तय किया जा सकता है। वैसे भी, फैमिली कोर्ट में किसी भी पक्ष को रोज-रोज (Daily Basis) पेश होने की आवश्यकता नहीं होती।

सुप्रीम कोर्ट की नजीर: हाई कोर्ट ने उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले ‘अनिंदिता दास बनाम श्रीजीत दास (2006)’ का हवाला देते हुए दोहराया कि जब तक कोई वास्तविक और बेहद गंभीर कठिनाई न हो, तब तक अदालतों को केवल मांगने मात्र से मुकदमों को ट्रांसफर करने का आदेश नहीं देना चाहिए।

विश्लेषण: आधुनिक अदालतों का ‘वर्किंग वुमन’ पर बदलता नजरिया

कानूनी बिंदुकोर्ट की व्याख्या और इसके दूरगामी प्रभाव
काल्पनिक लाचारी बनाम वास्तविकतायह फैसला दिखाता है कि अदालतें अब केवल ‘महिला कार्ड’ या ‘काल्पनिक लाचारी’ के दावों को स्वीकार नहीं करतीं। यदि महिला कामकाजी है और समाज में सक्रिय है, तो उसे कानूनी प्रक्रिया का सामना सामान्य नागरिक की तरह करना होगा।
पुरुषों के अधिकारों की रक्षाअक्सर वैवाहिक विवादों में पति को आर्थिक और मानसिक रूप से परेशान करने के लिए मामलों को दूरदराज के शहरों में ट्रांसफर करा दिया जाता है। यह आदेश पुरुषों को ऐसे ‘ह्रासमेंट’ (Harassment) से बचाता है।
वकील रिश्तेदारों का प्रभावकोर्ट ने पति की इस चिंता को भी अप्रत्यक्ष रूप से समझा कि स्थानीय बार (Bar) में प्रभाव रखने वाले रिश्तेदारों के कारण दूसरे शहर के व्यक्ति के लिए मुकदमा लड़ना कठिन हो जाता है।
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