हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी तर्क
1. प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत (IT Rules, 2021):
अदालत ने माना कि हालांकि सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशा-निर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 के नियम 3(2) में स्पष्ट रूप से यूजर को सूचित करने का उल्लेख नहीं है, लेकिन: “यह आवश्यकता प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों में समाहित एक आवश्यक दायित्व है और इसे नियम के भीतर पढ़ा जाना चाहिए। जब मध्यस्थ को सूचना भेजी जाती है, तो उसकी एक प्रति यूजर को भी दी जानी चाहिए, ताकि प्रक्रिया संवैधानिक रूप से वैध बनी रहे।”
2. केवल DIGP या उससे ऊपर के अधिकारी को ही अधिकार:
- हाईकोर्ट ने कहा कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को टेकडाउन सूचना जारी करने के लिए अधिकृत अधिकारी पुलिस उप-महानिरीक्षक (DIGP/DIG) के पद से नीचे का नहीं हो सकता।
- चूंकि इस मामले में निर्देश पुलिस अधीक्षक (SP) द्वारा जारी किए गए थे, इसलिए यह वैधानिक प्रावधानों का घोर उल्लंघन और शक्तियों का मनमाना व उच्च हस्ततापूर्ण प्रयोग (Highhandedness and Arbitrary exercise of power) है।
3. शिकायत निवारण प्रणाली (Grievance Redressal):
- राज्य के इस तर्क को खारिज कर दिया गया कि यूजर को मध्यस्थ की शिकायत निवारण प्रणाली के पास जाना चाहिए था। कोर्ट ने कहा कि जब यूजर को टेकडाउन आदेश की प्रति ही नहीं दी गई, तो उसके लिए शिकायत निवारण प्रणाली के पास जाना एक निरर्थक अभ्यास (Futile Exercise) होता और इससे उसके बचाव के अधिकार को गंभीर नुकसान पहुंचता।
अदालत का अंतिम आदेश
- पंजाब एंड हरियाणा उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता के फेसबुक पेज को तुरंत बहाल (Restore) करने का आदेश दिया।
- कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में अधिकारियों को लगता है कि याचिकाकर्ता के पेज पर कोई अवैधता है, तो मध्यस्थ को टेकडाउन सूचना भेजने के तुरंत बाद उसकी एक प्रति याचिकाकर्ता को प्रदान की जाएगी।
- याचिकाकर्ता का पक्ष अधिवक्ता नमित खुराना और गगन बुधिराजा ने रखा, जबकि केंद्र सरकार का प्रतिनिधित्व वरिष्ठ पैनल वकील धीरज जैन व अमृता सिंह ने और राज्य का प्रतिनिधित्व अतिरिक्त अधिवक्ता महानिदेशक भूपेंद्र सिंह ने किया।
चंडीगढ़: सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 (IT Rules, 2021) के नियम 3(1)(d) (पुलिस प्राधिकारियों द्वारा सोशल मीडिया मध्यवर्तियों को नोटिस भेजने हेतु कम से कम पुलिस उपमहानिरीक्षक / DIG रैंक के अधिकारी की अनिवार्यता व अवैध प्रत्यायोजन पर रोक), नियम 3(2) (शिकायत निवारण तंत्र में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का समावेशन), सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79(3)(b) (मध्यवर्ती की कानूनी देयता व वास्तविक ज्ञान), तथा संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता व डिजिटल मीडिया का अधिकार) पर पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने प्रक्रियात्मक निष्पक्षता की सुरक्षा करते हुए एक मार्गदर्शक निर्णय सुनाया है।
न्यायमूर्ति त्रिभुवन दहिया की एकल पीठ ने डिजिटल समाचार चैनल हरियाणा 24 न्यूज नेटवर्क प्राइवेट लिमिटेड द्वारा दायर याचिका को स्वीकार करते हुए पुलिस अधीक्षक (SP), यमुनानगर द्वारा मेटा (Meta/Facebook) को 21 अगस्त 2026 को जारी ब्लॉकिंग नोटिस को अधिकारिता-विहीन (Without Jurisdiction) करार देकर रद्द कर दिया। अदालत ने विधिक व्यवस्था दी कि भले ही नियम 3(2) में स्पष्ट रूप से यूजर को नोटिस देने का उल्लेख न हो, किंतु किसी भी नागरिक या मीडिया संस्थान को उसके पेज या सामग्री को ब्लॉक करने से पूर्व या ठीक उस समय आदेश की प्रति न देना प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) का घोर उल्लंघन है।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक व्यवस्था
1. ‘नियम 3(2) में प्राकृतिक न्याय का समावेश: यूजर को आदेश की प्रति देना आवश्यक’
न्यायमूर्ति त्रिभुवन दहिया ने आईटी नियमों के तहत सामग्री अवरुद्ध करने की प्रक्रिया में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को समाहित करते हुए स्पष्ट किया: “यद्यपि नियम 3 का उप-नियम (2) स्पष्ट रूप से यह प्रावधान नहीं करता है कि प्राधिकारी मध्यवर्ती को सूचना (Intimation) भेजते समय उस यूजर को भी सूचित करें जिसकी सामग्री या पेज को हटाने का आदेश दिया गया है, किंतु यह अनिवार्यता प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों (Principles of Natural Justice) में अंतर्निहित एक आवश्यक दायित्व (Essential Obligation) है और इसे इस नियम के भीतर पढ़ा जाना (Read into the rule) चाहिए। तदनुसार, जब भी मध्यवर्ती को कोई सूचना भेजी जाती है, उसी समय संबंधित यूजर को भी उस सूचना की एक प्रति अनिवार्य रूप से दी जानी चाहिए। इससे उप-नियम (2) की प्रक्रिया प्राकृतिक न्याय के बुनियादी सिद्धांतों के अनुरूप और संवैधानिक रूप से वैध (Constitutionally Valid) बनेगी।”
2. ‘अंधेरे में रखकर शिकायत निवारण तंत्र के पास भेजना व्यर्थ की कवायद’:
- राज्य सरकार का तर्क था कि याचिकाकर्ता को सीधे हाईकोर्ट आने के बजाय मेटा के शिकायत अधिकारी (Grievance Officer) के पास अपील करनी चाहिए थी।
- अदालत ने इसे खारिज करते हुए कहा:“जब राज्य ने 21 अगस्त की सूचना की कोई प्रति याचिकाकर्ता को दी ही नहीं, तो ऐसी स्थिति में शिकायत निवारण तंत्र (Grievance Redressal Mechanism) के पास जाना एक निरर्थक कवायद (Futile Exercise) होगी और यह उसके बचाव के विधिक अधिकार को गंभीर रूप से पंगु बना देगी।”
3. SP द्वारा DIG की शक्तियों का अतिक्रमण: ‘सत्ता का मनमाना दुरुपयोग’:
- आईटी नियमावली के नियम 3(1)(d) के तहत पुलिस की ओर से सोशल मीडिया मध्यवर्ती को सामग्री हटाने की सूचना केवल पुलिस उपमहानिरीक्षक (DIG) या उससे उच्च पद के विशेष रूप से अधिकृत अधिकारी द्वारा ही भेजी जा सकती है।
- अदालत ने राज्य के उस दावे को खारिज कर दिया कि SP को शक्तियां प्रत्यायोजित की गई थीं:“यह स्पष्ट है कि पुलिस अधीक्षक (SP) ने उस अधिकार को हड़पने का काम किया जो कानूनन उनमें निहित ही नहीं था। यह वैधानिक प्रावधानों का खुला उल्लंघन है; यह घोर मनमानी और सत्ता का निरंकुश प्रयोग (Sheer highhandedness and arbitrary exercise of power) है।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम
चरण / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों की विधिक दलीलेंयाचिकाकर्ताहरियाणा 24 न्यूज नेटवर्क प्राइवेट लिमिटेड — हरियाणा का एक डिजिटल मीडिया संस्थान, जिसका फेसबुक पर सत्यापित समाचार पेज संचालित था।प्रतिबंध की कार्रवाई21 अगस्त 2026 को बिना किसी पूर्व सूचना या कारण बताओ नोटिस के चैनल का फेसबुक पेज भारत में ब्लॉक कर दिया गया। चैनल को केवल मेटा की तरफ से कानून प्रवर्तन एजेंसी के नोटिस का एक सामान्य अलर्ट दिखा।राज्य सरकार का पक्षहरियाणा पुलिस ने बताया कि चैनल के एक निदेशक के विरुद्ध रंगदारी/जबरन वसूली मामले में FIR दर्ज थी और वह उक्त पेज का दुरुपयोग कर पीड़िता और गवाहों को धमका रहा था। राज्य ने तर्क दिया कि कानून-व्यवस्था की त्वरित सुरक्षा हेतु SP ने मेटा को IT Act की धारा 79(3)(b) में नोटिस भेजा था।याचिकाकर्ता के तर्कअधिवक्ता नमित खुराना और गगन बुधीराजा ने दलील दी कि IT Rules 2021 के नियम 3(1)(d) के तहत केवल DIG स्तर का अधिकारी ही ऐसा नोटिस दे सकता है। SP के पास यह अधिकार नहीं था और यूजर को आदेश की प्रति न देकर बचाव का अधिकार छीन लिया गया।हाईकोर्ट का अंतिम निर्देशयमुनानगर SP का ब्लॉकिंग आदेश रद्द; मेटा को चैनल का पेज तत्काल बहाल करने का निर्देश। भविष्य में यदि कोई अधिकृत प्राधिकारी नोटिस जारी करता है, तो याचिकाकर्ता को तुरंत उसकी प्रति उपलब्ध कराना अनिवार्य।
विधिक एवं सांविधिक विश्लेषण: IT Rules, 2021 और प्राकृतिक न्याय
- ‘रीड इन’ करने का सिद्धांत (Doctrine of Reading In):
- संवैधानिक अदालतों का यह स्थापित कर्तव्य है कि यदि किसी प्रशासनिक नियम में प्रक्रियात्मक निष्पक्षता का स्पष्ट उल्लेख न हो, तो वे उस नियम को असंवैधानिक घोषित करने से बचाने के लिए उसमें प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को ‘रीड इन’ (Read Into) कर सकती हैं।
- अदालत ने माना कि यदि राज्य किसी व्यक्ति या मीडिया संस्थान के ऑनलाइन मंच को बंद कराता है और उसे आदेश की प्रति तक नहीं देता, तो यह नागरिकों को ‘अंधेरे में रखने’ जैसा है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 19(1)(a) के विपरीत है।
- शक्तियों के गैर-कानूनी प्रत्यायोजन पर रोक:
- जब संसद या उसके द्वारा अधिकृत नियामक ने नियम 3(1)(d) में स्पष्ट सुरक्षा उपाय के रूप में DIG स्तर का न्यूनतम पद निर्धारित किया है, तो जिला स्तर का पुलिस अधीक्षक (SP) अपनी मर्जी से वह शक्ति ग्रहण नहीं कर सकता। ऐसा कोई भी आदेश क्षेत्राधिकार की दृष्टि से शून्य (Null and Void ab initio) होता है।
- बचाव का प्रभावी अवसर (Effective Right to Defend):
- किसी भी नागरिक के लिए किसी शिकायत मंच के समक्ष जाना तभी सार्थक हो सकता है जब उसे यह ज्ञात हो कि उस पर क्या आरोप लगाए गए हैं और किस सामग्री को गैर-कानूनी माना गया है। आदेश की प्रति के अभाव में किसी भी मंच पर अपील करना महज औपचारिकता बनकर रह जाता है।
विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता
- केस संदर्भ: हरियाणा 24 न्यूज नेटवर्क प्राइवेट लिमिटेड बनाम भारत संघ व अन्य [सिविल रिट याचिका – पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति त्रिभुवन दहिया (एकल पीठ)
- निर्णय की तिथि: 5 अक्टूबर 2026 (विस्तृत आदेश प्रति हाल ही में जारी)
- संबद्ध विषय: IT Rules, 2021 के तहत सोशल मीडिया ब्लॉकिंग आदेश की प्रति यूजर को देने की अनिवार्यता एवं DIG रैंक की वैधानिक बाध्यता
विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता की ओर से: अधिवक्ता नमित खुराना एवं अधिवक्ता गगन बुधीराजा
- भारत संघ (MeitY) की ओर से: वरिष्ठ पैनल वकील धीरज जैन सहपठित केंद्रीय सरकारी वकील अमृता सिंह
- हरियाणा राज्य की ओर से: अतिरिक्त महाधिवक्ता (Additional AG) भूपेंद्र सिंह
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act) — धारा 79(3)(b) (मध्यवर्तियों द्वारा गैर-कानूनी सामग्री को हटाना)
- सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 — नियम 3(1)(d) (प्राधिकृत अधिकारी व न्यूनतम DIG रैंक) एवं नियम 3(2) (शिकायत निवारण व प्राकृतिक न्याय)
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 14 (प्रक्रियात्मक निष्पक्षता), अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता व प्रेस की आजादी) तथा अनुच्छेद 226
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- डिजिटल निष्कासन में प्राकृतिक न्याय और विधिक अधिकारिता: ‘सोशल मीडिया मध्यवर्ती को किसी पेज या सामग्री को हटाने का निर्देश देते समय संबंधित यूजर को आदेश की प्रति उपलब्ध कराना प्राकृतिक न्याय का अनिवार्य अंग है; नियमों में स्पष्ट प्रावधान न होने पर भी इसे नियम 3(2) में पढ़ा जाना आवश्यक है। DIG से नीचे का कोई भी पुलिस अधिकारी मध्यवर्ती को ऐसा नोटिस जारी करने के लिए अधिकृत नहीं है।’
- अंतिम परिणाम: याचिका पूरी तरह स्वीकार; SP यमुनानगर द्वारा जारी 21 अगस्त 2026 का टेकडाउन नोटिस अवैध घोषित कर अपास्त; मेटा को समाचार नेटवर्क का फेसबुक पेज तत्काल बहाल करने का आदेश।
News Channel: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय (Punjab & Haryana High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति त्रिभुवन दहिया |
| याचिकाकर्ता | हरियाणा 24 न्यूज नेटवर्क प्राइवेट लिमिटेड |
| प्रतिवादी | केंद्र सरकार, हरियाणा राज्य सरकार व पुलिस प्रशासन |
| संबंधित नियम | आईटी नियम 2021 (IT Rules, 2021) का नियम 3(2) |
| मुख्य विवाद | यमुनानगर के पुलिस अधीक्षक (SP) द्वारा बिना कोई नोटिस दिए या प्रति प्रदान किए फेसबुक पेज को ब्लॉक करवाना। |
| अदालत के प्रमुख निष्कर्ष | 1. टेकडाउन सूचना की प्रति यूजर को देना अनिवार्य (प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत)। 2. मध्यस्थ को टेकडाउन सूचना जारी करने वाला अधिकारी डीआईजी (DIG) रैंक से नीचे नहीं हो सकता। |
| अदालत का अंतिम आदेश | फेसबुक पेज तुरंत बहाल करने का आदेश; एसपी के आदेश को अधिकार क्षेत्र से बाहर (Highhandedness & Arbitrary) माना। |

