Wednesday, October 28, 2026
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Right To Choose: केरल की बेटियां का धार्मिक बंधक… काेर्ट-हम यह नहीं देखेंग कि चुनाव सही है या गलत, बल्कि स्वतंत्र इच्छा से चुनाव हो, पढ़ें केस

Right To Choose: केरल हाई कोर्ट के जस्टिस डॉ. ए.के. जयशंकरन नांबियार और जस्टिस जोबिन सेबेस्टियन की डिवीजन बेंच ने व्यक्तिगत स्वायत्तता (Individual Autonomy) पर एक बड़ा फैसला सुनाया है।

अदालत ने स्पष्ट किया है कि माता-पिता अपनी बालिग बेटी के ब्रह्मचर्य (Celibacy) अपनाने या धार्मिक समूह में शामिल होने के फैसले को ‘बंदी प्रत्यक्षीकरण’ (Habeas Corpus) याचिका के जरिए चुनौती नहीं दे सकते। दरअसल, यह मामला तीन माता-पिता द्वारा दायर एक याचिका से जुड़ा है, जिन्होंने आरोप लगाया था कि उनकी बेटियों को “मठ ऑफ होली रुआ (MHR)” नामक एक धार्मिक समूह द्वारा अवैध रूप से बंधक बनाकर रखा गया है।

मामला क्या था? (The Dispute)

  • माता-पिता का दावा: बेटियों ने तब यह समूह जॉइन किया था जब इसे चर्च की मान्यता प्राप्त थी। बाद में समूह की मान्यता खत्म होने के बावजूद बेटियाँ वहीं रह रही हैं, जो माता-पिता के अनुसार “अनुचित प्रभाव” (Undue Influence) का परिणाम है।
  • तर्क: याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि बालिग होने के बाद भी माता-पिता का मार्गदर्शन खत्म नहीं होता और यदि बच्चों के फैसले ‘तर्कहीन’ हों, तो अदालत को हस्तक्षेप करना चाहिए।

कोर्ट का संवैधानिक संदेश: मर्जी आपकी, दखल किसी का नहीं

  • कोर्ट ने माता-पिता की दलीलों को खारिज करते हुए कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं।
  • बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) की सीमा: यह एक असाधारण उपाय है जिसका उपयोग केवल तभी किया जा सकता है जब ‘अवैध हिरासत’ का ठोस सबूत हो। केवल माता-पिता की असहमति को ‘अवैध हिरासत’ नहीं माना जा सकता।
  • निर्णयात्मक स्वायत्तता: कोर्ट ने पुट्टास्वामी (निजता का अधिकार) और शफीन जहां (हादिया केस) जैसे ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि गरिमा के साथ जीने के अधिकार में अपनी पसंद का विश्वास और पहचान चुनना शामिल है।
  • सही या गलत का फैसला: अदालत का काम यह देखना नहीं है कि किसी व्यक्ति का जीवन का चुनाव सही है या गलत, बल्कि यह देखना है कि वह चुनाव अपनी स्वतंत्र इच्छा से किया गया है या नहीं।

‘पेरेंट्स पैट्रिया’ (Parens Patriae) सिद्धांत की व्याख्या

  • अदालत ने स्पष्ट किया कि ‘राज्य का अभिभावक के रूप में संरक्षण’ (Parens Patriae) देने का अधिकार मुख्य रूप से नाबालिगों या उन लोगों के लिए है जो निर्णय लेने में अक्षम हैं।
  • शिक्षित और जागरूक: इस मामले में बेटियाँ बालिग और शिक्षित थीं। पुलिस रिपोर्ट ने पुष्टि की कि वे अपनी मर्जी से मठ में रह रही हैं और उन पर कोई दबाव नहीं है।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
अदालतकेरल हाई कोर्ट (जस्टिस ए.के. जयशंकरन नांबियार और जस्टिस जोबिन सेबेस्टियन)।
मुख्य निर्णयबालिग बेटियों के धार्मिक जीवन के चुनाव में माता-पिता का हस्तक्षेप अस्वीकार्य।
संविधानअनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत सुरक्षा।
धार्मिक समूह‘मठ ऑफ होली रुआ’ (Monastery of Holy Ruah)।
निष्कर्षयाचिका खारिज; बालिगों की स्वतंत्र इच्छा का सम्मान करना अनिवार्य।

परिवार बनाम व्यक्तिगत अधिकार

केरल हाई कोर्ट का यह फैसला समाज के उस परंपरागत ढांचे को चुनौती देता है जहाँ अक्सर बालिग बच्चों (विशेषकर बेटियों) के जीवन के फैसलों को परिवार की इच्छा के अधीन माना जाता है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि एक बार नागरिक के बालिग होने के बाद, उसके जीवन की बागडोर उसके अपने हाथों में होती है, और संवैधानिक रूप से परिवार या संस्थाएँ उस पर अपनी अपेक्षाएं नहीं थोप सकते।

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