Thursday, September 24, 2026
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Flat Possession: कब्जे में देरी पर बिल्डर को उतना ही ब्याज देना होगा जितना वह खरीदने वालों से वसूलता है…खरीदारों के हित में फैसला जरूर पढ़ें

केस एवं प्रक्रियात्मक सारांश (Case Matrix Overview)

विधिक/प्रशासनिक बिंदुविवरण (2026)
माननीय पीठन्यायमूर्ति प्रशांत कुमार (इलाहाबाद उच्च न्यायालय – लखनऊ पीठ)
मामला/प्रोजेक्ट‘गोल्फ सिटी’ सेक्टर-75 (बिल्डर अपील बनाम ऑलॉटी)
संबंधित कानूनReal Estate (Regulation and Development) Act, 2016 (RERA) – Section 2(za) [ब्याज की परिभाषा], Section 18 [कब्जे में देरी का मुआवजा] & Section 58
मुख्य कानूनी सिद्धांतधारा 2(za) के तहत बिल्डर द्वारा देरी पर दिया जाने वाला ब्याज, डिफॉल्ट करने पर खरीदार से वसूली जाने वाली ब्याज दर के बराबर होना चाहिए।
अदालत का निर्णयअपील खारिज; 24% ब्याज दर बरकरार और बिल्डर पर ₹2.5 लाख का हर्जाना आयद।

Flat Possession: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने रियल एस्टेट (RERA) अधिनियम, 2016 के तहत घर खरीदारों के हित में एक बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई बिल्डर तय समय पर फ्लैट का कब्जा (Possession) देने में विफल रहता है, तो उसे खरीदार (Allottee) को उसी दर से ब्याज का भुगतान करना होगा जिस दर से वह खरीदार द्वारा किश्त न चुकाने (Default) पर ब्याज वसूलता है।

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार की पीठ ने बिल्डर की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उसने केवल MCLR+1% की दर से ब्याज देने का तर्क दिया था। हाई कोर्ट ने बिल्डर-बायर एग्रीमेंट की शर्तों के आधार पर 24% वार्षिक ब्याज (24% per annum interest) के आदेश को पूरी तरह जायज ठहराया और खरीदार को 11 राउंड की मुकदमेबाजी में घसीटने के लिए बिल्डर पर ₹2,50,000 (2.5 लाख रुपये) का जुर्माना भी लगाया।

हाई कोर्ट की मुख्य व महत्वपूर्ण टिप्पणियां

  • ब्याज दरों में समानता (Parity under Section 2(za)):“रेरा अधिनियम, 2016 के प्रावधान, विशेष रूप से धारा 2(za), यह स्पष्ट करते हैं कि ब्याज का अर्थ बिल्डर द्वारा ऑलॉटी को दी जाने वाली ब्याज दर है, जो डिफॉल्ट की स्थिति में ऑलॉटी से ली जाने वाली ब्याज दर के बराबर होगी। इस मामले में, समझौते के क्लॉज-19 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि खरीदार द्वारा चूक करने पर उससे 24% ब्याज लिया जाएगा।”
  • पूर्व-मुआवजा और पूर्वव्यापी प्रभाव (Compensatory Interest): ‘न्यूटेक प्रमोटर्स एंड डेवलपर्स (P) लिमिटेड बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने माना कि धारा 18 के तहत दिया जाने वाला ब्याज ‘क्षतिपूर्ति/मुआवजे’ (Compensatory) की प्रकृति का है। इसलिए, यदि कब्ज़ा देने की वादा की गई तारीख 2016 के कानून से पहले (30 जून 2013) की भी थी, तब भी उस तारीख से 24% ब्याज लगाना गैर-कानूनी या मनमाना नहीं है।
  • बिल्डर की मुकदमेबाजी पर कड़ी टिप्पणी: अदालत ने पाया कि बिल्डर ने खरीदार को परेशान करने के लिए 7 दौर की निष्फल और परेशान करने वाली मुकदमेबाजी (Frivolous Litigation) की, जबकि खरीदार को अपने पक्ष में आए आदेश को लागू कराने के लिए 4 बार अदालतों के चक्कर काटने पड़े।

मामला क्या था? (Case Background)

  1. फ्लैट बुकिंग और प्रोजेक्ट में देरी (2011)
    • खरीदार ने सेक्टर-75 स्थित ‘गोल्फ सिटी’ (Golf City) प्रोजेक्ट (प्लाट नं. 7) में ₹34,44,250 के कुल मूल्य पर एक फ्लैट बुक किया था और 9 अप्रैल 2011 को बिल्डर-बायर एग्रीमेंट निष्पादित किया गया था।
    • जून 2013 तक कब्जा देने का वादा किया गया था। खरीदार ने ₹35,90,252 (पूरी राशि से भी अधिक) का भुगतान कर दिया, लेकिन बिल्डर ने तय समय पर फ्लैट का कब्जा नहीं दिया।
  2. यूपी रेरा और ट्रिब्यूनल का आदेश (2018-2022)
    • यू.पी. रेरा (RERA), गौतम बुद्ध नगर ने 26 जुलाई 2018 को बिल्डर को तुरंत कब्जा सौंपने और 30 जून 2013 की तारीख से 24% वार्षिक ब्याज देने का निर्देश दिया।
    • बिल्डर द्वारा आदेश का पालन न करने पर रेरा ने रिकवरी सर्टिफिकेट (Recovery Certificate) जारी किया। इसके बाद बिल्डर ने ट्रिब्यूनल और हाई कोर्ट में अपीलों की झड़ी लगा दी। ट्रिब्यूनल ने देरी और धाराओं के उल्लंघन के कारण बिल्डर की बहाली अर्जियां खारिज कर दीं।
    • अपने बैंक खाते कुर्क होने के बाद बिल्डर ने दिसंबर 2022 में ₹67.77 लाख जमा किए और रेरा अधिनियम की धारा 58 के तहत हाई कोर्ट में अपील दायर की।
  3. देरी की माफी (Condonation of Delay) का बहाना खारिज
    • हाई कोर्ट ने पाया कि ट्रिब्यूनल के आदेश को चुनौती देने में बिल्डर ने 721 दिनों की अत्यधिक देरी की। कोविड महामारी के दौरान सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई छूट की अवधि (15.03.2020 से 28.02.2022) को हटाने के बावजूद, बिल्डर देरी का कोई उचित कारण साबित नहीं कर सका।

⚖️ हाई कोर्ट का अंतिम फैसला

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रियल एस्टेट अपीलीय ट्रिब्यूनल (REAT) के आदेश में कोई अवैधता न पाते हुए बिल्डर की अपील पूरी तरह खारिज कर दी और निम्नलिखित आदेश दिए।

  1. 24% ब्याज की दर बरकरार: 30 जून 2013 से कब्जा मिलने तक 24% प्रति वर्ष की दर से ब्याज भुगतान का आदेश पूरी तरह सही और बाध्यकारी माना गया।
  2. 2.5 लाख रुपये का हर्जाना (Cost): खरीदार को बेवजह मुकदमों में उलझाकर प्रताड़ित करने के लिए बिल्डर पर ₹2,50,000 का जुर्माना लगाया गया, जो 4 हफ्तों के भीतर पीड़ित खरीदार को चुकाना होगा।

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