Thursday, November 5, 2026
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Charging Infrastructure: सुप्रीम कोर्ट में भी चार्जिंग पॉइंट लगें ताकि जब तक हम केस खारिज करें; आपकी गाड़ी चार्ज हो जाए, चुटीली टिप्पणी को पढ़ें

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख बिंदु और टिप्पणियां

  1. न्यायमूर्ति नरसिम्हा ने साझा किया निजी अनुभव: सुनवाई के दौरान जस्टिस नरसिम्हा ने एक व्यक्तिगत बातचीत का उल्लेख करते हुए बताया:“मैंने किसी को नई गाड़ी खरीदते समय इलेक्ट्रिक कार लेने का सुझाव दिया। उनका जवाब था—’आपके लिए कहना आसान है, लेकिन मैं जहां भी जाता हूं, वहां चार्जिंग पॉइंट कहां हैं?’ यही जमीनी हकीकत है। पर्याप्त चार्जिंग स्टेशन न होने के कारण लोग ईवी खरीदने से कतरा रहे हैं।”
  2. सुप्रीम कोर्ट परिसर में भी चार्जिंग पॉइंट देने का सुझाव: जज ने मजाकिया लेकिन व्यावहारिक लहजे में कहा कि सुप्रीम कोर्ट परिसर में भी चार्जिंग सुविधाएं दी जानी चाहिए।“यदि आप सुप्रीम कोर्ट में अपनी कार पार्क करते हैं, तो जब तक हम मामले की सुनवाई पूरी कर खारिज करेंगे, तब तक आपकी कार चार्ज हो जाएगी! प्राधिकारियों को कोर्ट परिसर में भी चार्जिंग पॉइंट प्रदान करने के लिए कहना चाहिए।”
  3. EV चार्जिंग स्टेशन के लिए भूमि आवंटन को बताया ‘नीतिगत निर्णय’: यह मामला एमआईडीसी (MIDC) द्वारा एक प्लॉट ईवी चार्जिंग स्टेशन के लिए प्राथमिकता के आधार पर आवंटित करने के खिलाफ दायर किया गया था। याचिकाकर्ता (पड़ोसी उद्योगपति) का तर्क था कि उस भूमि पर उनके उद्योग के विस्तार के लिए विचार होना चाहिए था।
    • पीठ की व्यवस्था: कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि ईवी चार्जिंग सुविधाओं को बढ़ावा देना सरकार की एक स्पष्ट नीति (Policy) है और इस आधार पर किया गया भूमि आवंटन मनमाना या गैर-कानूनी नहीं माना जा सकता।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने देश में स्वच्छ ऊर्जा, सतत विकास, जीवाश्म ईंधन (पेट्रोल/डीजल) से इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) की ओर स्थानांतरण और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की भारी कमी पर व्यावहारिक व महत्वपूर्ण मौखिक टिप्पणियां की हैं।

न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने महाराष्ट्र औद्योगिक विकास निगम (MIDC) द्वारा एक भूखंड को इलेक्ट्रिक वाहन चार्जिंग स्टेशन के लिए प्राथमिकता के आधार पर आवंटित करने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणियां कीं। शीर्ष अदालत ने रेखांकित किया कि देश में इलेक्ट्रिक कारों की खरीद में सबसे बड़ा रोड़ा पर्याप्त चार्जिंग स्टेशनों का न होना है। जब तक सरकार और संबंधित एजेंसियां व्यापक स्तर पर जरूरी सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराएंगी, तब तक यह राष्ट्रीय स्तर का बदलाव धरातल पर नहीं उतर सकता।

शीर्ष अदालत की प्रमुख मौखिक टिप्पणियां

1. चार्जिंग प्वाइंट्स की कमी सबसे बड़ी रुकावट: न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा

न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा ने एक व्यक्तिगत बातचीत का उदाहरण साझा करते हुए बुनियादी ढांचे की जमीनी हकीकत को रेखांकित किया: “मैं किसी ऐसे व्यक्ति को सलाह दे रहा था जो नई कार खरीदना चाहता था। मैंने उनसे कहा कि अब बेहतर होगा कि आप इलेक्ट्रिक कार (EV) खरीदें। उन्होंने जवाब दिया—’आपका यह कहना बहुत अच्छा और आसान है, लेकिन मैं जहां रहता हूं या जहां भी जाता हूं, वहां चार्जिंग पॉइंट कहां है? कहीं भी चार्जिंग स्टेशन उपलब्ध नहीं हैं।’ चार्जिंग पॉइंट्स न होने के कारण ही लोग इलेक्ट्रिक कार खरीदने से पीछे हट रहे हैं। यदि लोग इलेक्ट्रिक कारें खरीदते हैं और जीवाश्म ईंधन से हरित ऊर्जा की ओर बढ़ते हैं, तो यह हमारे पूरे देश के लिए क्रांतिकारी बदलाव साबित होगा। लेकिन जब तक आप आवश्यक बुनियादी सुविधाएं प्रदान नहीं करेंगे, यह बदलाव वास्तव में संभव नहीं हो सकता।”

2. ‘सुप्रीम कोर्ट में भी लगे चार्जिंग पॉइंट’: न्यायाधीश की चुटीली टिप्पणी

  • वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्री नायडू से बातचीत के दौरान न्यायमूर्ति नरसिम्हा ने हल्के-फुल्के अंदाज में सुप्रीम कोर्ट परिसर में ही चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने का सुझाव दिया:“यदि आप अपनी गाड़ी को यहां सुप्रीम कोर्ट में पार्क करते हैं, तो जितनी देर में हम मामले का निस्तारण या उसे खारिज (Dismiss) करेंगे, उतनी देर में आपकी कार पूरी तरह चार्ज हो जाएगी। यह वकीलों और वादियों के लिए बहुत फायदेमंद रहेगा। प्रशासन से कहिए कि वे यहां भी चार्जिंग की सुविधा उपलब्ध कराएं।”

3. ईवी चार्जिंग स्टेशन के लिए भूमि आवंटन ‘मनमाना’ नहीं, बल्कि ‘नीतिगत’

  • याचिकाकर्ता के इस तर्क पर कि निकटवर्ती औद्योगिक भूखंड का विस्तार रोका गया है, पीठ ने स्पष्ट किया कि ईवी नीति को बढ़ावा देने के लिए जमीन का आवंटन कोई मनमाना फैसला नहीं है:“हम आपको केवल इतना बता रहे हैं कि उस पक्षकार को ईवी चार्जिंग सुविधा के लिए जमीन आवंटित करने का निर्णय कोई मनमाना (Arbitrary) निर्णय नहीं है। यह सरकार का एक सुविचारित नीतिगत (Policy) फैसला है।”

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (MIDC भूखंड आवंटन विवाद)

  • विवाद की पृष्ठभूमि: याचिकाकर्ता कंपनी (श्री स्वामी समर्थ एजेंसीज फार्मास्युटिकल एंड कंज्यूमर डिस्ट्रीब्यूटर्स) का MIDC क्षेत्र में पहले से एक उद्योग स्थापित था। उसने अपने व्यवसाय के विस्तार (Expansion) के लिए से सटे हुए एक अतिरिक्त भूखंड के आवंटन की मांग की थी।
  • प्राथमिकता आवंटन: एमआईडीसी (MIDC) ने उक्त भूखंड को इलेक्ट्रिक वाहन चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने के उद्देश्य से एक अन्य कंपनी को प्राथमिकता (Priority basis) के आधार पर आवंटित कर दिया।
  • याचिकाकर्ता की दलील (वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्री नायडू): * अधिवक्ता ने तर्क दिया कि एमआईडीसी दोनों पक्षों की जरूरतों को समायोजित कर सकती थी और उपलब्ध जमीन को विभाजित करके एक हिस्सा विस्तार के लिए दिया जा सकता था।
    • प्राथमिकता के आधार पर दूसरे पक्ष को पूरा प्लॉट देना भेदभावपूर्ण था।
  • अदालत का रुख: * शीर्ष अदालत ने एमआईडीसी के नीतिगत फैसले में दखल देने से इनकार कर दिया।
    • हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ता को छूट दी कि वह प्राधिकरण के साथ बातचीत कर शेष बची हुई जमीन या पहुंच मार्ग (Access) के संबंध में अपनी समस्याओं का समाधान तलाश सकता है।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: श्री स्वामी समर्थ एजेंसीज फार्मास्युटिकल एंड कंज्यूमर डिस्ट्रीब्यूटर्स बनाम एम.आई.डी.सी. एवं अन्य [विशेष अनुमति याचिका / सिविल अपील – सर्वोच्च न्यायालय]
  • प्रासंगिक कानून एवं नीतियां: राष्ट्रीय इलेक्ट्रिक मोबिलिटी मिशन योजना (NEMMP); विद्युत मंत्रालय (Ministry of Power) के ईवी चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर स्थापना दिशानिर्देश; महाराष्ट्र औद्योगिक विकास अधिनियम, 1961; भारत का संविधान – अनुच्छेद 14 (समानता व गैर-मनमानापन) एवं अनुच्छेद 21 (स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार)
  • संबद्ध प्रशासनिक सिद्धांत: नीतिगत निर्णयों में न्यायिक संयम (Judicial Restraint in Policy Matters) — ‘जब तक कोई आवंटन दुर्भावनापूर्ण या स्पष्ट रूप से गैर-कानूनी न हो, तब तक राज्य की व्यापक सार्वजनिक नीतियों (जैसे हरित ऊर्जा संवर्धन) के क्रियान्वयन में संवैधानिक अदालतें हस्तक्षेप नहीं करतीं।’
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • याचिकाकर्ता की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्री नायडू
  • पीठ: न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे (सर्वोच्च न्यायालय)

Charging Infrastructure:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतसर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठासीन पीठजस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस अलोक अराधे
मूल मुद्दाMIDC (महाराष्ट्र औद्योगिक विकास निगम) द्वारा EV चार्जिंग स्टेशन हेतु भूमि आवंटन पर विवाद
अदालत का फैसलानीतिगत निर्णय (Policy Decision) के तहत EV स्टेशन के लिए भूमि आवंटन को सही ठहराया।
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