मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य कानूनी निष्कर्ष
- कानूनी प्रक्रिया का पालन अनिवार्य: पीठ ने 8 सितंबर को दिए अपने आदेश में स्पष्ट किया:“कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन याचिकाकर्ता और हर नागरिक को करना होगा… केवल मुख्यमंत्री सेल को पत्र जारी करना और फिर जनहित याचिका दायर करना याचिकाकर्ता के मकसद को आगे नहीं बढ़ा सकता।”
- अपराध दर्ज कराने का सही क्रम (Procedure under BNSS): अदालत ने रेखांकित किया कि यदि कोई व्यक्ति किसी अपराध का आरोप लगाता है:
- उसे सबसे पहले संबंधित जांच एजेंसी के समक्ष एक उचित शिकायत दर्ज करानी चाहिए।
- यदि कोई कार्रवाई नहीं होती है, तो शिकायतकर्ता भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) के तहत संबंधित मजिस्ट्रेट या सक्षम अदालत का रुख कर सकता है।
चेन्नई: मद्रास हाईकोर्ट की खंडपीठ ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) के तहत विहित आपराधिक न्याय प्रक्रिया (Criminal Procedure), जनहित याचिकाओं (PIL) के दुरुपयोग और जांच को केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंपने के विधिक मानकों पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
न्यायमूर्ति सी.वी. कार्तिकेयन और न्यायमूर्ति आर. शक्तिवेल की खंडपीठ ने डिंडीगुल के अरुलमिघु कालाथीश्वरर अभिरामी मंदिर (अभिरामी अम्मन मंदिर) से दो मूर्तियों के गायब होने के आरोप में सीबीआई जांच की मांग वाली जनहित याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी भी संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया (Procedure established by law) का पालन करना अनिवार्य है। केवल मुख्यमंत्री के विशेष प्रकोष्ठ (Chief Minister’s Special Cell) में शिकायत पत्र भेज देना और बाद में सीधे उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर देना सक्षम पुलिस एजेंसी या मजिस्ट्रेट के समक्ष आपराधिक शिकायत दर्ज कराने का विकल्प नहीं बन सकता [राजा एसएम बनाम तमिलनाडु राज्य एवं अन्य]।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं टिप्पणियां
1. कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया का पालन सभी के लिए अनिवार्य आपराधिक न्याय प्रणाली के मूलभूत सिद्धांतों को दोहराते हुए खंडपीठ ने कहा: “कानून द्वारा मान्य और विहित प्रक्रिया का पालन याचिकाकर्ता सहित प्रत्येक नागरिक को करना होगा। केवल मुख्यमंत्री सेल को एक पत्र जारी कर देना और फिर जनहित याचिका (PIL) दाखिल कर देना याचिकाकर्ता के उद्देश्य को आगे नहीं बढ़ा सकता। जब किसी अपराध का आरोप लगाया जाता है, तो कानून पीड़ित या शिकायतकर्ता को सीधे उच्च न्यायालय आने के बजाय पुलिस स्टेशन और सक्षम न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास जाने का वैधानिक मार्ग प्रदान करता है।”
2. आपराधिक शिकायत का वैधानिक मार्ग (BNSS का ढांचा)
- अदालत ने रेखांकित किया कि यदि किसी व्यक्ति को अपराध घटित होने की जानकारी है, तो उसे सबसे पहले उचित क्षेत्राधिकार वाली जांच एजेंसी/थाने में औपचारिक प्राथमिकी (FIR) या शिकायत दर्ज करानी चाहिए।
- यदि पुलिस प्राथमिकी दर्ज नहीं करती है या कार्रवाई में विफल रहती है, तो शिकायतकर्ता को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 175(3) [पूर्ववर्ती 156(3) CrPC] या धारा 223 [पूर्ववर्ती 200 CrPC] के तहत संबंधित क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट या सक्षम अदालत का दरवाजा खटखटाना चाहिए।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (डिंडीगुल मंदिर मूर्ति विवाद)
- विवाद की पृष्ठभूमि: याचिकाकर्ता राजा एसएम ने मद्रास उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर आरोप लगाया कि डिंडीगुल के प्रसिद्ध अभिरामी अम्मन मंदिर के खंभों पर स्थापित दो प्राचीन मूर्तियां—’करुदलवार’ मूर्ति और ‘बाला दुर्गई अम्मन’ मूर्ति—गायब हो गई हैं। याचिकाकर्ता ने इन मूर्तियों की तस्वीरें भी अदालत के समक्ष प्रस्तुत की थीं।
- याचिका में मांगी गई राहतें: * मूर्ति तस्करी रोकथाम प्रभाग (Idol Smuggling Prevention Division) के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (ADGP) द्वारा 22 जनवरी 2026 को जारी संचार को निरस्त किया जाए।
- याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए प्रतिवेदन को निष्पक्ष और उचित जांच के लिए केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को स्थानांतरित किया जाए।
- राज्य सरकार का स्पष्टीकरण: * सुनवाई के दौरान तमिलनाडु सरकार की ओर से पेश वकील ने अदालत को सूचित किया कि दोनों मूर्तियां वास्तव में कहीं गायब नहीं हुई हैं, बल्कि वे मंदिर परिसर में ही सुरक्षित रखी हैं।
- मूर्तियां आंशिक रूप से खंडित/क्षतिग्रस्त (Damaged) हो गई थीं, जिसके कारण धार्मिक मान्यताओं के अनुसार उनकी नियमित पूजा बंद कर दी गई थी।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
- सीबीआई जांच की PIL खारिज: उच्च न्यायालय ने जनहित याचिका के माध्यम से सीधे असाधारण रिट क्षेत्राधिकार का उपयोग कर जांच एजेंसी तय कराने के प्रयास को अस्वीकार कर दिया।
- उचित कानूनी प्रक्रिया अपनाने की स्वतंत्रता: अदालत ने याचिकाकर्ता को छूट दी कि यदि वह चाहे, तो सक्षम प्राधिकारी/मजिस्ट्रेट के समक्ष कानून के अनुसार विधिवत आपराधिक शिकायत दर्ज करा सकता है।
- पूर्वाग्रह रहित निर्देश: अदालत ने स्पष्ट किया कि इस आदेश में की गई किसी भी टिप्पणी का प्रभाव भविष्य में जांच एजेंसी या किसी सक्षम अदालत के समक्ष प्रस्तुत की जाने वाली शिकायत के गुण-दोष पर नहीं पड़ेगा।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: राजा एस.एम. बनाम तमिलनाडु राज्य एवं अन्य [W.P.(MD) – जनहित याचिका – मद्रास उच्च न्यायालय (मदुरै पीठ)]
- प्रासंगिक कानून: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 173 (एफआईआर), धारा 175(3) (मजिस्ट्रेट द्वारा जांच का निर्देश), एवं धारा 223 (निजी परिवाद); भारत का संविधान – अनुच्छेद 226 (रिट अधिकारिता); तमिलनाडु हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1959 (HR&CE Act)
- संबद्ध न्यायिक नजीरें:
- सकीरी वासु बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (सुप्रीम कोर्ट) — ‘एफआईआर दर्ज न होने पर सीधे हाईकोर्ट में अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दायर करने के बजाय मजिस्ट्रेट के समक्ष उपलब्ध वैधानिक उपचारों का उपयोग किया जाना चाहिए।’
- सीबीआई बनाम राज्य (सुप्रीम कोर्ट) — ‘सीबीआई को जांच सौंपना एक असाधारण उपाय है, जिसे नियमित मामलों में या केवल शिकायतकर्ता की इच्छा पर आदेशित नहीं किया जा सकता।’
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता की ओर से: अधिवक्ता के. गोकुल
- राज्य सरकार की ओर से: सरकारी वकील एम.पी. सेंथिल (सरकारी अधिवक्ता डी. वेंकटेश की ओर से)
- सीबीआई की ओर से: अधिवक्ता एन. मोहिदीन बाशा
- पीठ: न्यायमूर्ति सी.वी. कार्तिकेयन और न्यायमूर्ति आर. शक्तिवेल (मद्रास उच्च न्यायालय)
PIL & Complaint: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | मद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court) |
| पीठासीन पीठ | जस्टिस सी.वी. कार्तिकेयन और जस्टिस आर. शक्तिवेल |
| मामला | डिंडीगुल के ‘अमरावती अम्मन मंदिर’ से दो मूर्तियों के गायब होने का आरोप |
| याचिकाकर्ता की मांग | मामले की सीबीआई (CBI) जांच और प्रशासनिक आदेश को रद्द करना |
| कोर्ट का आदेश | जनहित याचिका खारिज; कानून के अनुसार विधिवत आपराधिक शिकायत दर्ज कराने की छूट। |

