POCSO CASE: सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद पेचीदा और असाधारण मामले में अपनी विशेषाधिकार शक्तियों (Article 142) का इस्तेमाल करते हुए पोक्सो एक्ट के तहत एक दोषी को दी गई 10 साल की सजा को रद्द कर दिया है।
परिस्थितियों को देखते हुए आरोपी को राहत दी जा सकती है: अदालत
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की खंडपीठ ने इस मानवीय और सामाजिक परिस्थिति को देखते हुए आदेश दिया। कहा, इस मामले की अनूठी और बाद की परिस्थितियों (Subsequent Events) के आधार पर सेशंस कोर्ट द्वारा दी गई और हाई कोर्ट द्वारा बरकरार रखी गई सजा को निरस्त किया जाता है। अपीलकर्ता (आरोपी) और पीड़िता को समाज में पति-पत्नी के रूप में शांतिपूर्वक अपना जीवन जीने के लिए स्वतंत्र छोड़ा जाता है।
दोषी पीड़िता के साथ शादी करके 4 वर्ष से रहने लगा
सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला तब सुनाया जब पीड़ित लड़की ने बालिग होने के बाद दोषी से शादी कर ली, दोनों पिछले 4 साल से साथ रह रहे थे और आरोपी ने सुरक्षा के तौर पर उसे 10 लाख रुपये का मुआवजा भी दे दिया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह पूरी तरह साफ कर दिया है कि इस आदेश को भविष्य के लिए कोई नजीर (Precedent) नहीं माना जाएगा, क्योंकि पोक्सो जैसे गंभीर मामलों में सामान्यतः समझौते की अनुमति नहीं होती है।
मामले की पेचीदा पृष्ठभूमि (जेल, शादी, तलाक और फिर दोबारा शादी)
यह मामला अदालती तारीखों और दोनों पक्षों के निजी जीवन के बीच उतार-चढ़ाव से भरा रहा है।
शुरुआती सजा (2019): वर्ष 2019 में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को पोक्सो एक्ट की धारा 5(1) और 6 (गंभीर मर्मभेदी यौन हमला) के तहत दोषी पाते हुए 10 साल की कड़ी कैद की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ आरोपी ने मद्रास हाई कोर्ट का रुख किया, जिसने उसकी जेल की सजा को निलंबित (Suspend) कर दिया था।
पीड़िता का यू-टर्न (2021): वर्ष 2021 में पीड़िता ने खुद हाई कोर्ट में हलफनामा देकर गुहार लगाई कि वे दोनों पिछले ४ साल से साथ रह रहे हैं, इसलिए वह इस विवाद को हमेशा के लिए खत्म करना चाहती है और आरोपी की सजा रद्द की जाए। हालांकि, मद्रास हाई कोर्ट ने कानूनन पोक्सो में समझौते की गुंजाइश न होने के कारण इसे खारिज कर दिया था। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट की पड़ताल और ₹10 लाख का सुरक्षा कवच
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की तह तक जाने के लिए मजिस्ट्रेट के सामने पीड़िता के बयानों को दोबारा दर्ज कराने के आदेश दिए, जिसमें एक बेहद भावुक और सामाजिक हकीकत सामने आई।
बयानों का सच (Sec 164 CrPC): पीड़िता ने बताया कि आरोपी ने शुरुआत में शादी का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाए थे और बाद में मुकर गया था, जिसके कारण पुलिस केस हुआ। इसके बाद लड़की की शादी किसी दूसरे व्यक्ति से हुई। लेकिन जब उस व्यक्ति को लड़की के अतीत और इस केस के बारे में पता चला, तो उसने लड़की को छोड़ दिया।
पारिवारिक सुलह (2024): इसके बाद आरोपी के परिवार ने लड़की से संपर्क किया और अंततः वर्ष 2024 में (लड़की के बालिग होने के बाद) दोनों ने आधिकारिक रूप से शादी कर ली।
जीवन की सुरक्षा का हर्जाना: अप्रैल 2026 में सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि यदि पीड़िता को उसके भविष्य की सुरक्षा के लिए 10,00,000 रुपये (दस लाख रुपये) दिए जाते हैं, तो वह इस कानूनी लड़ाई को आगे नहीं बढ़ाना चाहती। आरोपी ने यह राशि चुका दी, जिसे सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार (न्यायिक) ने रिकॉर्ड पर दर्ज किया।
विश्लेषण: सुप्रीम कोर्ट का आर्टिकल 142 और पोक्सो कानून
भारतीय कानून के तहत पोक्सो (POCSO) और रेप (IPC 376 / BNS) जैसे अपराध ‘गैर-शमनीय’ (Non-Compoundable) होते हैं, यानी इनमें पार्टियां आपस में समझौता नहीं कर सकतीं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के पास एक विशेष संवैधानिक शक्ति है।
| कानूनी ढांचा और पक्ष | सुप्रीम कोर्ट का रुख और वैधानिक स्थिति |
| संविधान का अनुच्छेद 142 (Article 142) | यह सुप्रीम कोर्ट को पूर्ण न्याय (Complete Justice) करने के लिए ‘विशेषाधिकार’ देता है। जब कोर्ट को लगता है कि कानून की तकनीकी कड़ियों से किसी का घर टूट सकता है, तो वह इसका इस्तेमाल करता है। |
| राज्य सरकार का रुख | इस मामले में राज्य सरकार ने भी सकारात्मक रुख अपनाया। सरकार ने कहा कि यदि इस फैसले को भविष्य के लिए मिसाल (Precedent) न बनाया जाए, तो उन्हें आरोपी को बरी करने और सजा रद्द करने पर कोई आपत्ति नहीं है। |
| अंतिम अदालती निष्कर्ष | कोर्ट ने माना कि चूंकि लड़की बालिग हो चुकी है, दोनों का घर बस चुका है और आरोपी ने अपनी गलती के एवज में ₹10 लाख का हर्जाना भी दे दिया है, इसलिए परिवार को जेल भेजने के बजाय उन्हें साथ रहने देना न्यायसंगत है। |
सुप्रीम कोर्ट में पॉक्सो केसों पर अनुच्छेद 142 का कब-कब हुआ प्रयोग, यहां पढ़ें
सुप्रीम कोर्ट का अनुच्छेद 142 (Article 142) और पोक्सो (POCSO) एक्ट के तहत ‘शादी के वादे पर यौन संबंध’ (Sex on false promise of marriage) व आपसी सहमति से बने किशोर संबंधों (Adolescent Relationships) का टकराव इस समय भारतीय न्यायशास्त्र (Jurisprudence) के सबसे संवेदनशील और चर्चा में रहने वाले विषयों में से एक है। इन दोनों के अंतर्संबंधों और इस पर सुप्रीम कोर्ट के हालिया ऐतिहासिक (Landmark) रुख को नीचे विस्तार से समझाया गया है।
अनुच्छेद 142: ‘पूर्ण न्याय’ की असाधारण शक्ति (Plenary Power)
भारत के संविधान का अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को यह विशेष और विशिष्ट शक्ति देता है कि वह किसी भी लंबित मामले में “पूर्ण न्याय” (Complete Justice) करने के लिए कोई भी डिक्री या आदेश पारित कर सकता है।
असाधारण प्रकृति: इस शक्ति का उपयोग तब किया जाता है जब मौजूदा कानून के कड़े दायरे में किसी विशेष परिस्थिति का न्यायपूर्ण समाधान नहीं निकल पा रहा हो।
पोक्सो (POCSO) मामलों में सीमा: पोक्सो एक गैर-शमनीय (Non-Compoundable) और गंभीर कानून है, जिसका मतलब है कि इसमें पीड़ित और आरोपी के बीच ‘समझौते’ के आधार पर केस खत्म नहीं किया जा सकता। हाई कोर्ट (अनुच्छेद 482 के तहत) भी आमतौर पर पोक्सो केस को समझौते पर रद्द नहीं करते। लेकिन सुप्रीम कोर्ट अपने अनुच्छेद 142 का उपयोग करके विशेष परिस्थितियों में ऐसा कर सकता है।
शादी के वादे पर संबंध और पोक्सो में अनुच्छेद 142 का उपयोग (हालिया लैंडमार्क फैसले)
हाल के वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने उन मामलों में अनुच्छेद 142 का खुलकर उपयोग किया है जहाँ घटना के समय लड़की नाबालिग (16-17 साल) थी, संबंध आपसी सहमति या शादी के वादे पर बने थे, लेकिन बाद में दोनों ने शादी कर ली।
मरुथुपांडी बनाम राज्य (Maruthupandi v. State, मई 2026)
मामला: आरोपी पर आरोप था कि उसने कक्षा 12वीं में पढ़ रही एक नाबालिग लड़की से शादी का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाए और बाद में मुकर गया। निचली अदालत ने उसे पोक्सो के तहत 10 साल की सख्त सजा सुनाई थी। अपीलीय प्रक्रिया के दौरान, लड़की के बालिग होने पर दोनों पक्षों में सुलह हो गई और उन्होंने दिसंबर 2024 में विवाह कर लिया।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय: सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की बेंच ने अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल करते हुए आरोपी की 10 साल की सजा और दोषसिद्धि (Conviction) को पूरी तरह से रद्द (Set Aside) कर दिया।
कोर्ट की टिप्पणी: अदालत ने कहा कि आरोपी को जेल भेजने से अब इस जोड़े का हंसता-खेलता वैवाहिक जीवन पूरी तरह तबाह हो जाएगा। सामाजिक ताने-बाने और वैवाहिक शांति को बनाए रखने के लिए पूर्ण न्याय यही होगा कि उन्हें पति-पत्नी के रूप में रहने दिया जाए। (हालांकि कोर्ट ने साफ किया कि इस केस को एक सामान्य मिसाल/Precedent के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाएगा)।
दसारी श्रीकांत बनाम तेलंगाना राज्य (Dasari Srikanth v. State of Telangana)
मामला: इस मामले में भी किशोर उम्र के प्रेम संबंधों के बाद आपराधिक मामला दर्ज हुआ था, लेकिन बाद में दोनों ने कानूनी रूप से विवाह कर लिया।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विवाह एक ऐसा बड़ा बदलाव है जो दोनों पक्षों के बीच के पुराने विवाद और कड़वाहट को समाप्त कर देता है। यदि सजा को बरकरार रखा गया, तो यह उस लड़की के वैवाहिक जीवन और भविष्य को ही संकट में डाल देगा। कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत मामले को पूरी तरह क्वैश (Quash) कर दिया।
पोक्सो और ‘शादी के वादे पर यौन संबंध’ पर सुप्रीम कोर्ट का सामान्य कानूनी सिद्धांत
अनुच्छेद 142 के विशेष मामलों से इतर, सुप्रीम कोर्ट ने इस विषय पर कुछ बहुत ही स्पष्ट मार्गदर्शक सिद्धांत (Guidelines) तय किए हैं, जो सामान्य ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट के लिए बाध्यकारी हैं।
I. ‘गलतफहमी’ (Misconception of Fact) बनाम ‘झूठा वादा’ (False Promise)
सुप्रीम कोर्ट ने प्रमोद सूर्यभान पवार बनाम महाराष्ट्र राज्य और अनुराग सोनी बनाम छत्तीसगढ़ राज्य जैसे ऐतिहासिक मामलों में साफ किया है कि हर टूटा हुआ शादी का वादा ‘बलात्कार’ या ‘पोक्सो’ नहीं होता।
शादी का झूठा वादा (Fraud फ्रॉम द बिगिनिंग): अगर आरोपी का इरादा शुरू से ही केवल शारीरिक संबंध बनाना था और उसका शादी करने का कभी कोई इरादा था ही नहीं, तो लड़की की सहमति को ‘तथ्य की गलतफहमी’ (Misconception of Fact – IPC धारा 90 / BNS) माना जाएगा और यह अपराध की श्रेणी में आएगा।
वादा पूरा न कर पाना (Breach of Promise): अगर प्रमोटर या लड़के का इरादा शुरुआत में सच्चा था, लेकिन बाद में किन्हीं अपरिहार्य पारिवारिक कारणों, जातिगत अवरोधों या नौकरियों के कारण वह शादी नहीं कर पाया, तो इसे ‘वादे का उल्लंघन’ माना जाएगा, ‘बलात्कार’ या ‘यौन उत्पीड़न’ नहीं।
II. किशोरवय के प्रेम संबंध (Consensual Adolescent Relationships) पर चिंता
सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाई कोर्ट्स (जैसे मद्रास और दिल्ली हाई कोर्ट) ने लगातार चिंता जताई है कि पोक्सो एक्ट को मूल रूप से बाल यौन शोषण के अपराधियों (Pedophiles) को पकड़ने के लिए बनाया गया था। लेकिन वर्तमान में इसका एक बड़ा हिस्सा उन मामलों से भर गया है जहाँ 16 से 18 वर्ष के किशोर आपसी सहमति से रोमांटिक संबंधों में आते हैं और बाद में माता-पिता की नाराजगी के कारण लड़के पर पोक्सो केस दर्ज हो जाता है।
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख (Suo Motu Writ Petition, 2025-2026): सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से अदालतों को आगाह किया है कि वे “रोमांटिक मामलों” की आड़ में पोक्सो के कड़े प्रावधानों को पूरी तरह कमजोर न होने दें, विशेषकर जहाँ पीड़िता की उम्र बहुत कम (जैसे 14 वर्ष या उससे कम) हो। कोर्ट ने कहा कि कानून का अक्षरशः पालन होना चाहिए और पुनर्वास (Rehabilitation) पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

