केस एवं प्रक्रियात्मक सारांश (Case Matrix Overview)
| विधिक/प्रशासनिक बिंदु | विवरण (अगस्त 2026) |
| माननीय पीठ | न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा (दिल्ली उच्च न्यायालय) |
| मामला नाम | सुधीर कावत्रा बनाम शामली कावत्रा (Sudhir Kawatra Vs Shamli Kawatra) |
| मुख्य विधिक सिद्धांत | पिता द्वारा बच्चे के नाम पर किया गया निवेश (PPF) बच्चे की संपत्ति है; पिता इसका उपयोग पत्नी या बच्चे के मेंटेनेंस (CrPC 125/HMA) के भुगतान के लिए नहीं कर सकता। |
| अदालत का निर्णय | पिता की अपील खारिज; जिला अदालत का आदेश बरकरार (PPF की पूरी राशि 8% ब्याज के साथ बेटी को लौटाने का निर्देश)। |
PPF Corpus: दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में व्यवस्था दी है कि पिता अपनी बेटी के नाम पर निवेश किए गए पैसे (जैसे Public Provident Fund – PPF) का इस्तेमाल पत्नी और बेटी को गुजारा भत्ता (Maintenance) देने के अपने व्यक्तिगत कानूनी दायित्व को पूरा करने के लिए नहीं कर सकता।
न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की एकल पीठ ने 3 अगस्त 2026 को फैसला सुनाते हुए जिला अदालत के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें पिता को पीपीएफ (PPF) की पूरी परिपक्वता राशि 8% ब्याज के साथ अपनी बालिग बेटी को लौटाने का निर्देश दिया गया था।
हाई कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां
- संरक्षक की भूमिका केवल ‘फिडुशियरी’ (Fiduciary Capacity) होती है:“बच्ची के नाम पर निवेश होने के कारण वह उस राशि को प्राप्त करने की हकदार थी। पिता भले ही उस पैसे का संरक्षक रहा हो, लेकिन यह स्थिति केवल एक ट्रस्टी/संरक्षक (Fiduciary Capacity) के रूप में थी। पिता इस राशि का उपयोग बच्चे के प्रति भरण-पोषण की अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी से हटने या उसे एडजस्ट करने के लिए नहीं कर सकता।”
- मेंटेनेंस और दीर्घकालिक निवेश का अंतर: अदालत ने स्पष्ट किया कि दैनिक भरण-पोषण (Day-to-Day Maintenance) और भविष्य के लिए किया गया निवेश दो अलग-अलग चीजें हैं। वैवाहिक विवाद होने मात्र से पिता बच्चे के पैसों से अपनी कानूनी जिम्मेदारी नहीं निभा सकता। यह सीधे तौर पर बच्चे के पैसे का अपने दायित्वों के निर्वहन के लिए दुरुपयोग होगा।
मामला क्या था? (Case Background)
- PPF खाता और धनराशि की निकासी
- पिता (सुधीर कावत्रा) ने वर्ष 1999 में अपनी बेटी (शामली कावत्रा) के नाम से एक पीपीएफ (PPF) खाता खोला था।
- जब बेटी 2017 में खाते की परिपक्वता (Maturity) पर बैंक पहुंची, तो उसे पता चला कि उसके पिता ने 2016 में ही ₹8 लाख से अधिक की पूरी राशि निकालकर खाता बंद कर दिया था। पिता ने बैंक को शपथ पत्र दिया था कि वह यह राशि बेटी की शिक्षा और कल्याण के लिए निकाल रहा है।
- बेटी का मुकदमा और जिला अदालत का आदेश
- माता-पिता के अलग होने के बाद से बेटी अपनी मां के साथ रह रही थी। उसने अदालत को बताया कि इस पैसे का उपयोग उसकी शिक्षा के लिए नहीं किया गया और वह कॉलेज की फीस देने में कठिनाई का सामना कर रही है।
- जिला अदालत ने बेटी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए पिता को पूरी राशि 8% वार्षिक ब्याज के साथ लौटाने का आदेश दिया। पिता ने इस फैसले को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी।
- पति/पिता की दलील
- पिता का तर्क था कि फैमिली कोर्ट के आदेश के तहत उसने अपनी बेटी के भरण-पोषण के लिए जो ₹6 लाख रुपये दिए थे, वे उसने इसी पीपीएफ फंड से दिए थे। इसलिए इसे मेंटेनेंस की राशि में एडजस्ट किया जाना चाहिए।
हाई कोर्ट का अंतिम निष्कर्ष
- मेंटेनेंस का स्वतंत्र अधिकार: हाई कोर्ट ने कहा कि बच्चे का भरण-पोषण करना पिता का स्वतंत्र और व्यक्तिगत कानूनी दायित्व है। इसे बेटी के अपने पैसों (PPF Corpus) से काटा या समायोजित (Adjust) नहीं किया जा सकता।
- पत्नी का मेंटेनेंस अलग विषय: कोर्ट ने कहा कि पत्नी को मेंटेनेंस पाने का स्वतंत्र अधिकार है और उस कानूनी बाध्यता को पूरा करने के लिए बेटी को उसके अपने पैसों से वंचित नहीं किया जा सकता।
- बेटी को पूरी राशि लौटाने का आदेश: कोर्ट ने माना कि बालिग होने के बाद बेटी उस राशि की पूर्ण हकदार है और पिता को संपूर्ण पीपीएफ राशि 8% ब्याज के साथ देनी होगी।

